विचार / लेख

नए धर्म, नई सभ्यता, नई नैतिकता की जरूरत
नए धर्म, नई सभ्यता, नई नैतिकता की जरूरत
Date : 08-Sep-2019

संजय श्रमण

हाल ही में मकबूल हो रहे युवाल नोवा हरारी भी कह रहे हैं कि टेक्नोलॉजी जितनी तेजी से बदल रही है उसके हिसाब से मनुष्य की मानवीय क्षमताएं, संवेदनाएं और शक्तियां नहीं बढ़ रही हैं।  जीवन के अधिकांश प्राचीन तौर-तरीके अब आउट डेटेड हुए जा रहे हैं। लेकिन इंसानों के बीच की आदिम घृणा और असुरक्षाएं कम होने की बजाए नए-नए कलेवरों में सामने आ रही हैं। टेक्नोलॉजी के साथ मनोविज्ञान और धर्म का पर्याप्त विकास नहीं हो रहा है इसीलिए अब नए टेक्नोरिलीजन मैदान संभालने वाले हैं जो अगले कुछ दशकों में नीति, नैतिकता और सौन्दर्यबोध आदि की सारी परिभाषाएं बदल डालेंगे। इस बदलाव से तीसरी दुनिया के लोग अर्थात लातिन अमरीका और दक्षिण एशिया के अधिकांश गरीब देश वैश्विक विकास और सभ्यता की दौड़ में अचानक से बहुत पीछे छूट जाएंगे।
केन विल्बर्स कृष्णमूर्ति की बात को एक-दूसरे ढंग से भी रखते हैं। वे कहते हैं कि अधिकांश समाज और संस्कृतियां सिर्फ तकनीक और विज्ञान के सहारे उन सुविधाओं का उपभोग करने लगी हैं जो कुछ सभ्य और लोकतांत्रिक (तुलनात्मक रूप से) देश उपभोग करते आए हैं। लेकिन चूँकि इन समाजों ने अपनी जमीन पर सामाजिक, राजीनीतिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक पुनर्जागरण की लड़ाई नहीं लड़ी इसलिए ऊपर से वे सभ्य नजर आते हैं लेकिन अंदर से वे एकदम बर्बर और आदिम हैं।
सीरिया का पिछले कुछ सालों का उदाहरण हमारे सामने है। सीरिया से पलायन करते लोगों को मालदार अरब मुल्क मिलकर संभाल सकते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे। वे रात भर की अय्याशी में लाखों डॉलर उड़ा देंगे, लेकिन अपने ही धर्म के लोगों को बचाने के लिए सामने नहीं आएंगे।
हालांकि ठीक यही सवाल उन तथाकथित सभ्य और लोकतान्त्रिक यूरोपीय या अमरीकी समाजों पर भी लागू होता है।  जिन्होंने पूरे अरब सहित लेबनान और सीरिया में आग लगाईं हुई है, लेकिन शरणार्थियों की दुर्दशा के संदर्भ में यूरोप की तुलना में अरब समाज की बेरुखी बहुत पीडि़त करती है।
भारत में भी इसी तरह की बर्बादी का इंतजाम कश्मीर, आसाम और बंगाल में शुरू हो गया है। मनुष्यों को एक-दूसरे की चिंताओं और तकलीफों का जऱा भी एहसास नहीं है। दो चार शब्दों के इधर उधर हो जाने से कोई राष्ट्रवादी हो जाता है कोई विदेशी हो जाता है कोई घुसपैठिया हो जाता है। इन शब्दों के खेल में मीडिया ने पूरा चिडिय़ाघर खोला हुआ है। हर तरह का मनोरंजन मौजूद है। देश के जेहन को बर्बाद करने में सरकार, कारपोरेट और धर्म तीनों ने गजब का निवेश किया हुआ है। इस निवेश की सफलता के चिन्ह भी नजर आने लगे हैं।
ऐसे में हरारी, केन विल्बर्स और कृष्णमूर्ति शेष मनुष्यता के लिए न सही तो कम से कम भारत के लिए बिलकुल सही साबित होते हैं। भारत को तत्काल नए धर्म, नई सभ्यता, और नयी नैतिकता की जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्य से नई नैतिकता की बजाए पुराने श्मशानों में से वेदान्त का भूत फिर से जि़ंदा किया जा रहा है।

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