संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 सितंबर : 36गढ़ में बाकी देश के मुकाबले पौने तीन गुना आत्महत्याएं क्यों?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 9 सितंबर : 36गढ़ में बाकी देश के मुकाबले पौने तीन गुना आत्महत्याएं क्यों?
Date : 09-Sep-2019

पूरे हिन्दुस्तान में आत्महत्या के औसत आंकड़े लाख लोगों पर 10.6 हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा इससे करीब पौने तीन गुना अधिक, 27.7 प्रति लाख आबादी है। यह आंकड़ा 2015 का है, और भारत सरकार के इकट्ठा किए गए आंकड़े इसके बाद के बरस में प्रकाशित नहीं हुए हैं। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ लंबे समय से किसान आत्महत्या की खबरों से चर्चा में रहता है, और हाल के बरसों में तो सरकार ने आत्महत्या के मामलों को राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के रिकॉर्ड में दर्ज करते हुए छत्तीसगढ़ की किसान-आत्महत्याओं को महज आत्महत्या लिखना शुरू कर दिया था, ताकि किसानों को दिक्कतें अधिक न दिखें, और सरकार को राजनीतिक असुविधा न हो।

10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस माना जाता है, और इस दिक्कत की तरफ ध्यान खींचने के लिए तरह-तरह से कोशिश की जाती है। हम हर बरस दो-चार बार आत्महत्याओं के खतरों पर लिखते ही हैं, और आज फिर लोगों को इस पर सोचने के लिए कुछ मुद्दे उठा रहे हैं। पूरे देश की अगर बात करें तो हिन्दुस्तान में इम्तिहान या पढ़ाई में नाकामयाबी की वजह से स्कूल-कॉलेज के बच्चों की आत्महत्या खबरों में बनी रहती है, प्रेम में असफल होने के बाद, या प्रेम के बाद शादी की इजाजत न मिलने की वजह से, किसी दूसरी जाति या धर्म में प्रेम हो जाने की वजह से भी हिन्दुस्तान में बहुत सी आत्महत्याएं हो रही हैं। यह तो गनीमत है कि इस देश के एक बड़े हिस्से में अब तक संयुक्त परिवार व्यवस्था चल रही है, और इस वजह से बेरोजगार रहते हुए भी नौजवान मां-बाप पर बोझ बनकर भी रह लेते हैं, और आमतौर पर खुदकुशी की कगार तक नहीं पहुंचते। लेकिन आत्महत्याओं से जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर निराश और हताश लोगों के सोचने के साथ-साथ परिवार और समाज के आसपास के लोगों को भी सोचना चाहिए, और ऐसे लोगों का हौसला बढ़ाना चाहिए। 

जानकार लोगों का यह मानना है कि निराश और हताश लोग शुरू में तो अपने आसपास मदद ढूंढते हैं, लेकिन उन्हें सलाह नहीं मिलती तब वे कोई खतरनाक कदम उठाते हैं। इसलिए ऐसे में स्कूल-कॉलेज, परिवार, समाज, या दफ्तर में, दोस्तों के दायरे में अगर हौसला बंधाने वाले लोग मिल जाएं, तो आत्महत्याओं में कमी आ सकती है। यह भी समझने की जरूरत है कि आसपास के लोग हर बार कारगर नहीं हो सकते क्योंकि कुछ लोगों की हताशा इतनी अधिक हो सकती है कि उन्हें पेशेवर परामर्श, या मनोचिकित्सा की जरूरत हो, जिसकी कि हिन्दुस्तान में बहुत ही कमी है। अब धीरे-धीरे सरकार और कुछ गैरसरकारी संगठन इस तरफ जागरूक हो रहे हैं, और परामर्श केन्द्र खुल रहे हैं जिससे लोगों को मदद मिल सके। लेकिन इनकी जानकारी कम है, लोग पेशेवर मदद के लिए कहां जाएं, यह बताने वाले लोग नहीं मिलते। इसलिए सरकार और समाज के ढांचे में ऐसी जानकारी आसानी से उपलब्ध करानी चाहिए। 

आत्महत्याओं के पीछे एक वजह मीडिया में ऐसी तकलीफदेह खबरों का अधिक प्रमुखता पाना भी है। इस मोर्चे पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मीडिया में काम करने वाले लोग आत्महत्याओं को महज समाचार के महत्व से प्रकाशित करते हैं, और ऐसा करते हुए वे नहीं सोच पाते कि इन खबरों और ऐसी तस्वीरों या वीडियो से उन लोगों पर क्या असर पड़ता है जो अपनी तकलीफों के चलते खुदकुशी की कगार पर पहुंचे हुए हैं। ऐसी कोई भी खबर निराश-हताश लोगों के मन में इकट्ठा बारूद के लिए चिंगारी का काम करती है। इसलिए मीडिया में फैसले लेने वाले लोग यह भी सोच सकते हैं कि आत्महत्या की हर खबर के साथ क्या उस शहर या प्रदेश में उपलब्ध परामर्श के पते और फोन नंबर जैसी जानकारी भी दी जाए ताकि उन खबरों से प्रभावित होने वाले लोग खबर के साथ-साथ यह जानकारी भी पा सकें, और उन नंबरों या पतों पर संपर्क कर सकें, मदद पा सकें। आज एक बड़ी जरूरत मीडिया में काम करने वाले लोगों को संवेदनशील बनाने की भी है, और यहां पर सामाजिक संगठन मीडिया संस्थानों-संगठनों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं, साथ ही मीडिया की कक्षाओं में छात्र-छात्राओं को अभी से ऐसे मुद्दों पर संवेदनशील बनाना चाहिए ताकि आगे जाकर वे जब काम करें, तो संवेदनशीलता के साथ करें।

कोई भी आत्महत्या उस व्यक्ति के पूरे दायरे की एक नाकामयाबी होती है। दाम्पत्य जीवन के झगड़ों को घटाने में पड़ोसी और परिवार, दोस्त और रिश्तेदार मदद कर सकते हैं, निराश छात्र-छात्राओं की मदद स्कूल-कॉलेज के शिक्षक कर सकते हैं, और प्रेम-संबंधों में निराश लोगों की मदद के लिए समाज के सकारात्मक लोग पहल कर सकते हैं। लोगों की एक सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है, और उसके तहत हर किसी को अपने आसपास की निराशा को घटाने का काम करना चाहिए। जहां तक किसानों की आत्महत्या की बात है, तो यह मामला मोटेतौर पर सरकार की कृषि नीति से जुड़ा हुआ रहता है, और सरकार पर इस बात का दबाव डालने में सबको मेहनत करनी चाहिए कि किसान को भी जिंदा रहने लायक फसल के दाम दिए जाएं। आत्महत्याओं को घटाने के लिए यह सालाना दिन महज कैलेंडर पर आकर गुजर नहीं जाना चाहिए, और हर किसी को अपनी पारिवारिक और सामाजिक, संस्थागत और मानवीय जिम्मेदारी निभाते हुए किसी भी निराश को देखने पर उसकी मदद करनी चाहिए, उससे बात करनी चाहिए, और उसे परामर्श केन्द्र या परामर्शदाता तक पहुंचाने की जहमत उठानी चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को यह सोचना चाहिए कि 2015 के ये आंकड़े बाकी देश से पौने तीन गुना क्यों हैं? और हो सकता है कि इस बरस कर्जमाफी और फसल के अधिक दाम की वजह से जब कुछ बरस बाद 2019 के आंकड़े आएंगे, तो वे इतने डरावने नहीं रहेंगे। एक आखिरी बात यह कि समाज को नौजवान पीढ़ी के प्रेम और विवाह को लेकर अपनी दकियानूसी सोच खत्म करनी चाहिए जिसके बिना सरकार आत्महत्याओं को घटा नहीं सकेगी।
-सुनील कुमार

 

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