विचार / लेख

न्याय की मूर्तियों से सवाल तो बनते हैं
न्याय की मूर्तियों से सवाल तो बनते हैं
Date : 10-Sep-2019

कविता कृष्णपल्लवी

मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश विजया के. ताहिलरमानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।  वह देशभर के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की वरिष्ठता सूची में पहले स्थान पर थीं। अब उनके इस्तीफे की वजह भी जान लीजिए!
इस वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मेघालय हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पद पर तबादला कर दिया था।  बताते चलें कि मद्रास हाईकोर्ट में कुल जजों की संख्या पचहत्तर है, जबकि मेघालय हाईकोर्ट में तीन है। जस्टिस ताहिलरमानी अगस्त, 2018 से अपने पद पर थीं और अक्टूबर, 2020 में उन्हें रिटायर होना था!
 ताहिलरमानी की जगह मेघालय हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ए. के. मित्तल को मद्रास हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया है! ये दोनों तबादले कॉलेजियम ने न्याय के बेहतर प्रशासन के हित में किए हैं! इस फैसले के विरुद्ध चार दिनों पहले जस्टिस ताहिलरमानी ने कॉलेजियम के समक्ष जो रिप्रजेंटेशन दिया था, उसे कल ठुकरा दिया गया जिसके बाद उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। 
यह भी जान लेना जरूरी है कि कॉलेजियम के सदस्य कौन-कौन हैं! भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम के अन्य चार सदस्य हैं -जस्टिस एस.ए. बोबडे,  एन.वी. रमन्ना, अरुण मिश्र, और रोहिंटन नरीमन। चारों उच्चतम न्यायालय के जज हैं!  बिना किसी स्पष्ट कारण के, वरिष्ठतम हाईकोर्ट जज को मद्रास हाईकोर्ट से उठाकर कॉलेजियम ने मेघालय जैसे तीन जजों वाले हाईकोर्ट में भेज ही क्यों दिया? वह तो कॉलेजियम के सम्मानित सदस्य गण जानें, पर कुछ और भी तथ्य हैं जिन्हें हमें-आपको, सबको जानना चाहिए। 
जस्टिस ताहिलरमानी ही वह जज हैं जिन्होंने गोधरा के बाद हुए गुजरात दंगों के दौरान हुए बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार कांड के अभियुक्तों को निचली अदालत से मिली आजीवन कारावास की सज़ा को बरकऱार रखा था!
अब तक विभिन्न कारणों से ऊपरी अदालतों के कई जजों ने इस्तीफे दिए हैं, लेकिन कॉलेजियम के निर्णय से असहमति के कारण इस्तीफ़ा देने के उदाहरण दुर्लभ ही रहे हैं ! जस्टिस ताहिलरमानी के पहले 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट के दूसरे नंबर के वरिष्ठतम जज जस्टिस जयंत पटेल का जब कॉलेजियम ने इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया था तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। जस्टिस पटेल ही वह जज थे जिन्होंने गुजरात हाईकोर्ट में जज रहते समय इशरतजहां फर्जी मुठभेड़ कांड के सीबीआई जांच का आदेश दिया था !
यह भी जानना जरूरी है कि जिस जस्टिस ताहिलरमानी के साथ कॉलेजियम यह सुलूक कर रहा है, उन्होंने अपने कैरियर में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं! स्त्री बंदियों के गर्भपात के अधिकार को मान्यता देने वाला उनका फैसला ऐसे ही फैसलों में से एक है!
यह सब जो हो रहा है, उससे अब भला किसी को संदेह क्यों न हो कि न्यायपालिका नीचे से लेकर ऊपर तक सरकार की सेवा में सन्नद्ध हो चुकी है! उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था और जजों के भ्रष्टाचार बारे में शांतिभूषण, प्रशांत भूषण और जस्टिस मार्कन्डेय काटजू जैसे लोग जो कुछ भी कह चुके हैं, उसे हम यहां दुहराना नहीं चाहते!

 

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