संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 सितंबर : नेताओं, अफसरों के बीच न हिकारत हो, न मोहब्बत
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 सितंबर : नेताओं, अफसरों के बीच न हिकारत हो, न मोहब्बत
Date : 10-Sep-2019

देश के बहुत से प्रदेशों में नेताओं और अफसरों के बीच के रिश्ते लोकतंत्र की भावना से खासे दूर के दिखते हैं। उत्तरप्रदेश में बहुत से आईपीएस अफसर मुख्यमंत्री के पैरों पर बैठे दिखते हैं, तो बंगाल में ममता बैनर्जी के साथ उनके कुछ मुंहलगे अफसरों का ऐसा ही हाल दिखता है। और यह हाल छोटे-छोटे ओहदों वाले अफसरों का नहीं है,  अखिल भारतीय सेवा के आईएएस-आईपीएस अफसरों का ऐसा हाल देखकर तरस भी आता है कि जिन्हें केंद्र सरकार की तरफ से जिंदगी भर की एक हिफाजत मिली हुई है, वे भी इस दर्जे की चापलूसी में लग जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे नेता भी हैं जो कि अफसरों से बड़ी बदसलूकी करते हैं, उनके लिए मन में हिकारत रखते हैं, और इन दोनों तबकों के बीच परस्पर सम्मान खत्म कर बैठते हैं।

अभी कल छत्तीसगढ़ के एक बड़े सरल आदिवासी मंत्री, उद्योग और आबकारी विभाग देखने वाले नक्सल-बस्तर के कवासी लखमा का एक वीडियो तैरना शुरू हुआ जिसमें वे बहुत से बड़ों और बच्चों के बीच बैठकर किस्सागोई के अंदाज में एक बच्चे के सवाल का जवाब देते हुए कहते दिखते हैं कि बड़ा नेता बनने के लिए कलेक्टर-एसपी का कॉलर पकडऩा चाहिए। और ऐसा कहते हुए वे घूंसा चलाते हुए भी दिखते हैं जिस तरह कि कॉलर पकडऩे के बाद किसी को मुक्कों से मारा जाता है। अब कहने के लिए यह बात हँसी-मजाक कहकर टाली भी जा सकती है, लेकिन जब बच्चों के बीच यह बात कही जा रही है, तो कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदों के लिए ऐसी हिकारत की बात महज मजाक करार नहीं दी जा सकती। यह सिलसिला ठीक नहीं है। लोगों को याद होगा कि कांगे्रस सरकार बनने के तुरंत बाद एक मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने उनके जिले में कलेक्टर रहे एक अफसर के बारे में कुछ इसी किस्म की हिकारत से बात कही थी, जिसका वीडियो उनके लिए दिक्कत भी बना था।

नेताओं और अफसरों के बीच लोकतंत्र में परस्पर सम्मान और परस्पर विश्वास का एक ऐसा संबंध रहना चाहिए जिसमें अनिवार्य रूप से दूरी भी हो, और दोनों के अधिकार और जिम्मेदारियों के अलग-अलग दायरे भी हों। अगर इन दोनों तबकों के बीच नियम-कायदे और जनहित से परे एक सांठ-गांठ हो जाती है, तो रिश्तों की उतनी मधुरता सरकारी खजाने और जनता के हित, दोनों का ही खासा नुकसान भी करती है। लेकिन इसके ठीक उल्टे अगर इन दोनों के बीच टकराव ही चलते रहता है, तो उसका नुकसान भी हमने छत्तीसगढ़ में हर दौर में देखा है। इसलिए लोकतंत्र में अलग-अलग तबकों के बीच रिश्तों और दूरियों का एक संतुलन बने ही रहना चाहिए। इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की कही एक बात याद आती है जब मीडिया से जुड़े एक कार्यक्रम में संचालक ने कहा कि पटवाजी से मीडिया के बहुत ही मधुर संबंध हैं, तो अपनी बारी आने पर पटवाजी ने इसके जवाब में कहा था कि मीडिया से उनके कामकाज के ही संबंध हैं, कोई मधुर संबंध नहीं हैं, और होने भी नहीं चाहिए क्योंकि हम दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा था कि इन दोनों तबकों के बीच संबंध अगर मधुर हो जाएंगे, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसी तरह अफसरों और नेताओं के बीच संबंध औपचारिक और लोकतांत्रिक ढांचे के मुताबिक होना चाहिए, न तो एक-दूसरे के लिए कोई हिकारत होनी चाहिए, और न ही मोहब्बत। कल छत्तीसगढ़ के मंत्री ने चाहे जिस नीयत से अफसरों के बारे में ऐसी बात कही है, उसके लिए उन्हें अफसोस जाहिर करना चाहिए।
-सुनील कुमार

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