संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 सितंबर : केन्द्र का एक और कानून देश के लोगों पर बड़ा भारी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 सितंबर : केन्द्र का एक और कानून देश के लोगों पर बड़ा भारी
Date : 12-Sep-2019

केन्द्र सरकार का लाया हुआ नया मोटर व्हीकल एक्ट बड़ी बुरी परेशानियों में फंसा दिख रहा है। इसके बहुत से प्रावधान लोगों की जुर्माना पटाने की ताकत से ऊपर दिख रहे हैं, और देश में कम से कम आधा दर्जन राज्य सरकारें इसे लागू करने के खिलाफ हैं, कुछ सरकारें, जिनमें भाजपा की गुजरात सरकार भी है, घटे हुए जुर्माने का अपना अलग नियम बना रही हैं, और छत्तीसगढ़ सहित कई सरकारें इसे लागू नहीं कर रही हैं। आम लोगों की समझ के लिए यह साफ कर देना जरूरी है कि देश की हर अदालत पर यह नया एक्ट लागू हो गया है, और अगर कोई मामला अदालत में जाता है तो वहां से नए जुर्माने ही लगाए जाएंगे, नई सजा ही सुनाई जाएगी। लेकिन राज्य सरकारें सड़कों पर अभी अपनी जनता के साथ रियायत बरत रही हैं, और समझौता शुल्क के एक प्रावधान के तहत कुछ सौ रूपए का जुर्माना लगाकर लोगों को छोड़ रही हैं। इस बारे में राज्यों और केन्द्र के बीच एक टकराव सामने आ गया है क्योंकि केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि राज्यों की सहमति से ही यह नया कानून बनाया गया है और राज्यों को इसमें फेरबदल का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ खुद गडकरी की पार्टी की गुजरात सरकार ने अपनी नई रियायती दरें लागू भी कर दी हैं। 

लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में जब आनन-फानन नोटबंदी लागू की, तो महीनों तक देश में अफरा-तफरी और अराजकता का माहौल रहा, अनगिनत लोग एटीएम की कतारों में या बिना इलाज अस्पतालों में मारे गए, और हर दो दिनों में रूपए जमा करने या निकालने के नियम बदले जाते रहे, और आखिर में जाकर यह पता लगा कि कालाधन रोकने के नाम पर हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए थे, और दो हजार के नए नोट शुरू किए गए थे, जो कि पूरे मकसद को ही शिकस्त देने वाले थे। न तो नकली नोट बनना बंद हुआ, न ही आतंकी हमले बंद हुए, और न ही किसी भी किस्म का कालाधन सामने आया। सारे के सारे नोट बैंकों में लौट आए और सरकार के मत्थे एक बड़ा खर्च लग गया। आज तक दुनिया के अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत नोटबंदी के वक्त चोट खाई अर्थव्यवस्था को अब तक सुधार नहीं पाया है, और उसकी वजह से जारी मंदी आज भी हिन्दुस्तान का नुकसान कर रही है। 

इसी किस्म से आधी रात की आजादी जैसा जलसा मनाते हुए मोदी ने जीएसटी लागू किया था, जो कि इतना बदहाल था और जिसकी तैयारी इतनी अधूरी थी कि अगले साल भर तक उसके नियमों और प्रावधानों में फेरबदल ही चलते रहा, और देश में उसकी वजह से छोटे-छोटे कारोबार बंद होने की नौबत आ गई, करोड़ों नौकरियों के खत्म होने का एक बड़ा कारण जीएसटी को भी माना गया, और आज तक जीएसटी में फेरबदल जारी है, और यह स्थापित हो चुका है कि बिना तैयारी, पूरी तैयारी से जीएसटी लागू करना देश को गड्ढे में डाल गया।

आम जनता को प्रभावित करने वाला यह तीसरा मामला है जिसमें नए ट्रैफिक जुर्माने और सजा को इस तरह लागू किया गया है कि खुद भाजपा के राज्य उसके खिलाफ हैं। हम ट्रैफिक को लेकर अधिक जुर्माने और सख्ती दोनों के हिमायती हैं, लेकिन जुर्माने की रकम जब पुरानी गाडिय़ों के दाम को पार कर जा रही है, तो ऐसे जुर्माने के बारे में पहले से सोचा जाना चाहिए था, और राज्यों को भरोसे में लेना चाहिए था। मोदी सरकार का यह आम बर्ताव हो गया है कि लोकसभा में अपने विशाल बहुमत की ताकत को देखते हुए, और देश में अपनी बहुत सी राज्य सरकारों को देखते हुए वह व्यापक असर वाले ऐसे कानूनों को देश पर आनन-फानन, रातोंरात थोप देती है, और उसके बाद महीनों तक, साल भर तक उसमें फेरबदल चलते रहते हैं। इस दौरान लोगों को जो तकलीफ होती है, उसका अंदाज सत्ता पर बैठे हुए लोगों को नहीं है। ट्रैफिक जुर्माने के मामले में राज्य सरकारों की असहमति की वजह से अब तक देश के बड़े हिस्से में इसे लागू नहीं किया गया है, और जहां इसे लागू किया गया है, वहां तो लोग गाडिय़ों को फेंककर चले जाने की नौबत के करीब आ रहे हैं। केन्द्र सरकार को बिना देर किए राज्यों के साथ बैठकर इसके बारे में फिर से सोचना चाहिए, और जुर्माना इतना लगाना चाहिए जिसे लोग बर्दाश्त कर सकें। कानून के कुछ जानकारों कायह भी मानना है कि कई किस्म के एक्ट नए मोटर व्हीकल एक्ट में रखी गई है जो कि नाजायज है, और लोगों ने इसे लेकर लेख भी लिखे हैं। इसलिए उस पहलू पर भी केन्द्र को राज्यों के साथ बातचीत करनी चाहिए। ऐसा लग रहा है कि इस कानून में कुछ फेरबदल की जरूरत है क्योंकि यह देश की जमीनी हकीकत को न समझकर आसमान छूते जुर्माने लगा रहा है। हम सख्त कानूनों और उससे भी सख्त अमल के हिमायती हैं, लेकिन जुर्माना कितना हो इस बारे में एक बार फिर से बात जरूरी लग रही है। 
-सुनील कुमार

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