संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 सितंबर : रेत के खिसकते टीलों सरीखे बदलते रोजगार
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 सितंबर : रेत के खिसकते टीलों सरीखे बदलते रोजगार
Date : 15-Sep-2019

हिंदुस्तान, और बाकी दुनिया में भी बढ़ती आबादी को लेकर, और रोजगार घटने को लेकर बड़ी फिक्र चल रही है। बहुत से जानकारों का यह मानना है कि धरती आबादी का और अधिक बोझ लंबे वक्त तक नहीं झेल सकती, धरती के प्राकृतिक साधन सीमित हैं और वे कुछ सदियों में खत्म हो जाएंगे, उसके बाद पानी भी नसीब नहीं होगा। दूसरी तरफ मशीनों का बढ़ता इस्तेमाल और उसकी वजह से मौजूदा रोजगारों पर मंडराते खतरे से भी बहुत लोग फिक्रमंद हैं। एक तीसरी फिक्र हिन्दुस्तान जैसे देश में यह भी है कि कारोबार की तेजी से बदलती शक्ल की वजह से छोटे कारोबारी खत्म हो रहे हैं, परंपरागत पेशों का काम अब मशीनों से होने लगा है, और इन सब पर मंदी की मार भी भारी पड़ रही है।

इन बातों पर आंकड़ों को देखकर, भविष्य को लेकर विशेषज्ञों के अंदाज को लेकर, और तजुर्बे से, सोचने की जरूरत तो है, लेकिन इन पर एक गांधीवादी नजरिए से सोचने की जरूरत भी है। गांधी का मानना था कि यह धरती जरूरत तो सभी की पूरी कर सकती है लेकिन लालच पूरा नहीं कर सकती। आज जो लोग बढ़ती आबादी की वजह से बढ़ती खपत का हिसाब लगाते हैं, उनको समझना चाहिए कि आबादी का सबसे ऊपर का दस फीसदी हिस्सा ही धरती के नब्बे फीसदी साधनों का इस्तेमाल करता है। सबसे गरीब आबादी का खपत के अनुपात में उत्पादन अधिक होता है। गरीब जितना खाते हैं, उससे कई गुना उगाते हैं, या काम करते हैं। इसलिए धरती के साधनों को अधिक खतरा, या अकेला खतरा, रईसों की हवस का है, गरीबों की भूख और जरूरत का नहीं। इसलिए गांधी की सोच के मुताबिक सादगी और किफायत की राह ही एक रास्ता है।

दूसरी बात यह कि शहरीकरण के साथ आबादी का बढऩा अपने-आप भी घट रहा है, गरीबी घटने के साथ आबादी बढऩा घट रहा है, और शिक्षा से भी परिवार छोटे हो रहे हैं, इसके साथ-साथ इलाज बेहतर होने से जब बच्चों का मरना घटता है तो लोग आशंकाओं में अधिक बच्चे पैदा करना भी बंद करते हैं। इन सबकी वजह से आबादी बढऩा आगे चलकर घटेगा, और आज के अंदाज कुछ गलत साबित होंगे। साथ ही गरीब आबादी की खपत कम ही बनी रहेगी।

जहां तक बदलते कारोबार की वजह से रोजगार घटने की बात है, तो बड़े कारोबार छोटे धंधों में उतरने, या ऑनलाईन कारोबार से, छोटे कारोबार तो घटेंगे, लेकिन रोजगार नहीं। इससे नए किस्म के रोजगार खड़े हो रहे हैं। हिन्दुस्तानी सड़कों पर खाना, और दूसरे सामान पहुंचाने वाले दुपहिया सवार बढ़ते ही चल रहे हैं, लोग कई बार बाहर से खाना बुलाने लगे हैं। रोजगार मंदी की वजह से घट रहे हैं, बदलते कारोबार की वजह से नहीं। यह जरूर है कि छोटे कारोबारों से सीधे मिलने वाले रोजगार अब जगह बदल रहे हैं। ऐसे बहते हुए वक्त में वे देश तो नुकसान पाएंगे जो बाकी दुनिया का रूख और रफ्तार नहीं भांप पाएंगे, लेकिन दूर की सोचकर कमर कसने वालों के पेट खाली नहीं रहेंगे। हकीकत तो यह है कि इस इक्कीसवीं सदी में हिन्दुस्तान में नौजवानों की बड़ी आबादी को हिंदुस्तान की ताकत माना जा रहा है, अगर सरकारें अपने लोगों को दुनिया की आने वाली जरूरतों के मुताबिक तैयार कर सकें। आज अगर हिन्दुस्तान के ऑटो सेक्टर से लाखों नौकरियां गई हैं, तो टैक्सियों की शक्ल में उससे अधिक रोजगार बढ़े हैं, और सड़कों पर निजी गाडिय़ों की भीड़ बढऩा घटा है जो कि कोई बुरी बात नहीं है। एक टैक्सी सड़क पर एक होती है, लेकिन निजी कार के मुकाबले दिन भर में सौ-पचास गुना चलती है और कारों की भीड़ घटाती है। इसलिए जिंदगी के बदलते रूख की वजह से घटते रोजगारों को बढ़ते रोजगारों के साथ मिलाकर भी देखना होगा।

अब एक बात रह जाती है मशीनों की। मशीनों की वजह से घटने वाले रोजगार हो सकता है कि आम लोगों की जिंदगी में नई संभावना भी लेकर आएं। जब स्वेटर बुनने की मशीनें आईं तो लोगों को लगा था कि उनसे हाथ की बुनाई का रोजगार छिनेगा, लेकिन ऐसी घरेलू मशीनों से पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की महिलाओं ने घर-घर में इतने स्वेटर बनाए कि बड़े कारखानों का धंधा बिगड़ा। अगर देश-प्रदेश की सरकारें समझदार हैं तो हिन्दुस्तान में रोजगार बदल सकते हैं, खत्म नहीं हो सकते। 

कुल मिलाकर दुनिया की सरकारों को इस बदलते माहौल के लिए तैयार होना पड़ेगा। रोजगार खत्म नहीं हो रहे, वे रेगिस्तान में रातों-रात खिसककर कहीं और उग जाने वाले रेत के टीलों सरीखे हो गए हैं, उनको देखते हुए हर देश को अपनी आबादी को तैयार करना होगा। रही बात बढ़ती आबादी की, तो वह बढ़ते शहरीकरण, बढ़ते रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा के साथ-साथ खुद ही बढऩा घट जाएगी।
-सुनील कुमार

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