संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 सितंबर : सड़कों पर कुसूरवारों को बढ़ावा निहायत नाजायज
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 सितंबर : सड़कों पर कुसूरवारों को बढ़ावा निहायत नाजायज
Date : 16-Sep-2019

किसी एक मुद्दे पर एक महीने में तीन-चार बार संपादकीय लिखना अच्छी बात नहीं है, लेकिन जब वह मुद्दा देश की तकरीबन पूरी आबादी को बुरी तरह प्रभावित करने वाला हो, और जिसे लेकर एक असमंजस बना हुआ हो, तो फिर ऐसा लिखने से बचा भी नहीं जा सकता। हिन्दुस्तान में ट्रैफिक का नया जुर्माना लागू हुए ठीक एक पखवाड़ा गुजरा है, और राज्यों के बगावती तेवर केन्द्र सरकार के सामने आ रहे हैं। चूंकि केन्द्र सरकार में नए मोटर व्हीकल एक्ट के साथ नितिन गडकरी का नाम विभागीय मंत्री के रूप मेें जुड़ा है, इसलिए केन्द्र सरकार का कोई भी दूसरा मंत्री, भाजपा-एनडीए के कोई भी दूसरे नेता गडकरी को खलनायक बनने से बचाने की कोशिश नहीं कर रहे। और राज्यों में तो सरकारें अपनी जनता को लुभावने अंदाज में फंसाकर डुबाने की हद तक ले जा रही हैं, और सड़कों पर उनके मरने का इंतजाम कर रही है। 

अपने आसपास छत्तीसगढ़ को देखते हुए यह लगता है कि इस एक पखवाड़े के पहले तक जब पुराना मोटर व्हीकल एक्ट लागू था जिसमें जुर्माना कम था, और कैद तकरीबन नहीं थी, तब भी सड़कों पर पुलिस उस पर अमल करवाने के लिए कुछ तो करते दिखती थी, लेकिन जब से राज्य की कांग्रेस सरकार ने केन्द्र की मोदी-गडकरी सरकार के लाए इस एक्ट को लागू न करने का फैसला लिया है, तब से राज्य की पुलिस ने मानो सत्ता का रूख देखते हुए सड़कों पर से अपनी चालानी-मौजूदगी खत्म सी कर दी है, और पखवाड़े पहले तक जो गिने-चुने हेलमेट सड़कों पर दिखते थे, वे भी अब ताक पर धर दिए गए हैं, लोग कारों के सीट बेल्ट का इस्तेमाल न करना तय कर चुके हैं, और दुपहिया-चौपहिया चलाने वाले लोग मानो मोबाइल फोन पर अपना सारा काम गाड़ी चलाते हुए ही कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि दुपहियों पर अगर दो लोगों को ही जाना है तो वे किसी तीसरे को बिठा लेते हैं, और नए मोटर व्हीकल एक्ट को तोडऩा एक नए किस्म का क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है मानो गांधी नमक कानून तोड़ रहे हों। 

अब सवाल यह है कि राजनीतिक वजहों से अगर एक राज्य सरकार केन्द्र सरकार के लाए नए कानून को लागू करने का विरोध कर रही है, तो क्या ऐसा करते हुए वह पहले से लागू चले आ रहे कानून को भी ताक पर रख दे? क्या वह लोगों को सड़कों पर मरने और मारने की खुली छूट दे दे? क्या सरकार की संविधान की शपथ सरकारी जिम्मेदारी को लेकर ऐसा ही काम करने की है? क्या केन्द्र में विरोधी विचारधारा की सरकार रहने पर उसका विरोध इस किस्म से होना चाहिए कि अपने ही प्रदेश के अपने ही लोगों को एक अराजकता सिखाई जाए, सड़कों पर कानून का सम्मान करने वाले लोगों की हिफाजत भी खत्म की जाए? यह सरकारी बर्ताव हैरान करने वाला है, और यह नाजायज इसलिए भी है कि पुराने कानून पर अमल करने, या नए कानून को लागू करने का फैसला जो मंत्री-मुख्यमंत्री ले रहे हैं, वे खुद तो बड़ी-बड़ी गाडिय़ों के लाव-लश्कर में महफूज घूम रहे हैं, और महज आम जनता सड़कों पर रोज मारी जा रही है। क्या संविधान की शपथ के बाद सरकार को अराजकता बढ़ाने का कोई हक मिल सकता है, मिलना चाहिए? 

जहां तक सड़कों पर जिंदगी का सवाल है, तो किसी सरकार को यह हक नहीं मिल सकता कि वह कानून तोडऩे वालों पर कार्रवाई न करना तय करे। जिन लोगों की बड़ी-बड़ी गाडिय़ां हैं, बड़ी महंगी मोटरसाइकिलें हैं, वे लोग नए कानून की सख्ती की दुहाई दें, यह कहां की बात है? संपन्न तबकों की गुंडागर्दी को छूट देने का अधिकार किसी सरकार को नहीं दिया जा सकता। और छत्तीसगढ़ सहित बाकी राज्यों की सरकारों को यह भी याद रखना चाहिए कि एक बरस की सख्ती के बाद सड़कों पर जो असर दिखता है, वह हफ्ते भर की घोषित-ढिलाई में ही पूरी तरह मटियामेट हो जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी में रोजाना सौ-पचास किलोमीटर सफर करते हुए यह साफ दिख रहा है कि लोग अब ऐसा मान बैठे हैं कि इस प्रदेश से ट्रैफिक का पुराना या नया, किसी किस्म का भी कानून खत्म हो चुका है। जनता के मन में नियम-कायदे के लिए इतनी मजबूत हेठी ठीक नहीं है। राज्य सरकार को अगर यह लगता है कि नया कानून जनता के भुगतान की ताकत से अधिक कड़ा है, तो उसकी सोच तभी जायज कहलाएगी जब लाख रूपए से अधिक के दुपहियों, और पांच-दस लाख रूपए से अधिक की कारों को नए कानून के तहत जुर्माने के लिए सीधे अदालत भेजा जाए। जिनकी ताकत इतने बड़े खर्च करने की है, उनकी ताकत जुर्माना पटाने की तो है ही। हर दिन किसी राज्य के अखबारों में उस राज्य की अदालतों से होने वाले पच्चीस-पचास हजार के जुर्माने की खबरें छपें, तो करोड़पति अराजक लोगों की अक्ल ठिकाने आए। ऐसी ही महंगी गाडिय़ां बहुत से हादसों के लिए जिम्मेदार भी रहती हैं, और सड़कों पर बददिमागी भी दिखाती हैं। ऐसे लोगों को नए महंगे कानून से छूट क्यों दी जा रही है? सड़कों पर आज भी पुलिस इन गाडिय़ों को कानून तोडऩे पर अदालत भेज सकती है, जहां उनसे मिलने वाली रकम जनता के काम भी आए।

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ सरकार इस नए मोटर व्हीकल एक्ट पर विचार करने के नाम पर इसे भूल गई है। कानूनी सलाह में इतना वक्त नहीं लगता है, और जब केन्द्र सरकार पूरे देश में सड़कों पर होने वाली मौतों को कम करने की एक नीयत बता रही है, तो उस नीयत को धता बताना किसी राज्य सरकार के लिए अच्छी बात नहीं है। अगर नए जुर्माने को घटाना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है, तो उसे करे, लेकिन तब तक मौजूदा नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई जारी रखी जाए ताकि लोगों के मन में कानून के लिए हेठी घर न कर जाए। और जहां तक सड़कों पर बेकसूरों की मौत की बात है तो किसी सरकार को यह हक कैसे मिल सकता कि वह कुसूरवारों को खुश करने के लिए कानून पर अमल न करने की मुनादी करे, और उस पर चले आ रहा अमल भी खत्म कर दे। यह बहुत ही गैरजिम्मेदारी का बर्ताव है, और किसी भी राज्य सरकार के लिए यह संविधान की ली गई शपथ के ठीक खिलाफ भी है। 
-सुनील कुमार

Related Post

Comments