संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 सितंबर : पार्किंग पर गोलीबारी से सूझता एक समाधान भी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 सितंबर : पार्किंग पर गोलीबारी से सूझता एक समाधान भी
Date : 18-Sep-2019

पार्किंग पर गोलीबारी से सूझता एक समाधान भी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक रिहायशी इलाके में घर के सामने निजी कार खड़ी करने को लेकर चले आ रहे एक विवाद के बाद एक रिटायर्ड फौजी ने अपनी बंदूक से गोली चलाकर एक कार के दोनों शीशे आरपार तोड़ दिए, और गिरफ्तारी के बाद उसकी रिहाई भी हो गई। इस घटना को आपसी झगड़ा मानकर भी छोड़ा जा सकता है और एक गुस्सैल की बंदूक का लाइसेंस कैंसल किया जा सकता है। लेकिन समझदारी इसमें होगी कि इस दिक्कत की जड़ में जाकर उसका रास्ता ढूंढा जाए। 

यह बात शुरू तो एक शहर से हुई है, और एक इलाके का एक अकेला मामला दिखता है, लेकिन यह बात हिन्दुस्तान के सभी औसत शहरों में तेजी से बढ़ती हुई एक दिक्कत भी बताती है कि शहरी ढांचा इतनी निजी और दूसरी गाडिय़ों के लिए बना नहीं है। न तो इतनी गाडिय़ों के लायक सडक़ें हैं, और न ही इतनी गाडिय़ों के खड़े होने लायक जगह किसी इलाके में है। तकरीबन हर जगह लोगों की निजी गाडिय़ां उनके घरों के बाहर खड़ी रहती हैं, और बड़े शहरों के रिहायशी इलाकों में तो कुछ-कुछ इंच की दूरी पर गाडिय़ों को खड़ी करने में लोगों को महारथ हासिल करनी ही पड़ती है। जहां तक सरकार और स्थानीय संस्थाओं का सोचना है, तो हिन्दुस्तान के अधिकतर शहरों में कई मंजिलों की पार्किंग बनाने को एक समाधान समझ लिया गया है। जो सबसे व्यस्त बाजार हैं, या सरकारी इलाके हैं, वहां कई मंजिलों की पार्किंग बनाकर यह फख्र कर लिया जाता है कि वहां कितने सौ गाडिय़ों को खड़ा किया जा सकेगा। इसके अलावा शहरों में अब तक खाली बच गई गिनी-चुनी सरकारी जमीन पर लगातार बाजारू इमारतें बनाकर उनसे एक नंबर और दो नंबर की कमाई करने की बेचैनी स्थानीय संस्थाओं और सरकार दोनों में दिखती है। कांक्रीट के जंगलों के बीच अगर थोड़े से फेंफड़े बचे हैं, तो उन्हें भी बेच देने पर आमादा नेता और अफसर धरती की बची सारी उम्र के लिए उन शहरों को तबाह करने के गुनहगार बन रहे हैं, साथ-साथ दौलतमंद तो बन ही रहे हैं। 

पर्यावरण को बचाने के लिए शहरी योजना की जितनी भी बातें होती हैं, वे काली कमाई की उम्मीद दिखने पर बांधकर ताक पर धर दी जाती हैं। जिस रफ्तार से लोगों की निजी, कारोबारी, और स्कूल-कॉलेज की गाडिय़ां बढ़ रही हैं, उनके खड़े होने के लिए सिवाय सरकारी सडक़ों के और कोई जगह नहीं बचती है। ऐसे में आज यह सोचने की जरूरत है कि जो लोग गाड़ी खरीदते वक्त मोटा टैक्स देते हैं, उसका बीमा करवाने पर खर्च करते हैं, उसे चलाने के लिए महंगा डीजल-पेट्रोल खरीदते हैं, वे उसे सरकारी सडक़ पर या सरकारी जमीन पर खड़े करने के लिए एक फीस क्यों नहीं दे सकते, और स्थानीय संस्थाएं यह फीस वसूल क्यों नहीं करतीं? लोगों को कार खरीदते हुए अगर यह इत्मीनान रहता है कि उसे खड़े करने के लिए सरकारी या सार्वजनिक जगह हासिल है, तो वे बेफिक्र होकर बाकी खर्च का हिसाब लगाते हैं, और कार लाकर घर के बाहर बांध लेते हैं। जिस दिन पार्किंग का खर्च जुड़ जाएगा, उस दिन लोगों को समझ आएगा कि कार रखने पर यह बोझ भी पड़ता है, और वे उसके मुताबिक हिसाब लगाकर ही गाड़ी खरीदेंगे। 

पार्किंग को लेकर हुई यह गोलीबारी यह भी सोचने के लिए मजबूर करती है कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने की कितनी जरूरत है। पहले से व्यस्त बाजारों में कई मंजिलों की पार्किंग बनाना एक तुरंत-समाधान लग सकता है, लेकिन यह पूरी जिंदगी के लिए उस इलाके में सडक़ों पर भीड़ बढ़ाने का एक इंतजाम भी हो जाता है। शहरी विकास के हर शहर के अपने मॉडल होने चाहिए, इसलिए इस बारे में सोच की बात ही हो सकती है, उस शहर के लोगों को अलग-अलग योजनाएं अपनी जरूरत के मुताबिक बनानी होंगी। लेकिन एक बात तय है कि शहरों के बीच खाली पड़ी जमीन पर इमारतें खड़ा करना तुरंत ही बंद होना चाहिए, और सार्वजनिक परिवहन तेजी से बढ़ाना चाहिए ताकि लोग निजी गाडिय़ों के मोहताज न रहें, और ईंधन बचे, सडक़ों पर भीड़ बचे, पार्किंग को लेकर गोलीबारी बचे। हर शहर को एक पार्किंग फीस अनिवार्य रूप से लागू करनी चाहिए जिसे रजिस्ट्रेशन के वक्त लिया जाए, और उस टोकन के आधार पर ही किसी शहर में गाड़ी नियमित रूप से रखी जा सके। जिन लोगों के घरों में गाड़ी रखने का इंतजाम हो, वे भी बाकी वक्त तो शहर में अलग-अलग जगहों पर गाड़ी खड़ी करते ही हैं, इसलिए हर शहर की अपनी एक पार्किंग फीस ली जाए जो कि शहर के स्तर पर भी हो सकती है, या पूरे प्रदेश के लिए हो सकती है। निजी गाडिय़ों पर, कारोबारी गाडिय़ों पर ऐसा बोझ डालना जरूरी है क्योंकि इसके बिना लोग खरीदने की ताकत रहने तक गाडिय़ां खरीदते ही जाते हैं। 

-सुनील कुमार

 

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