संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 सितंबर :  हर बात रिकॉर्ड की जाती रहे तो क्या नफा, क्या नुकसान?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 सितंबर : हर बात रिकॉर्ड की जाती रहे तो क्या नफा, क्या नुकसान?
Date : 22-Sep-2019

बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में अभी एक केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ वहां के छात्रों की एक झड़प हुई। भाजपा के इस केन्द्रीय मंत्री का विरोध इस विश्वविद्यालय के वामपंथी, या भाजपा-विरोधी तृणमूल समर्थक छात्र कर रहे थे, और इस दौरान धक्का-मुक्की, खींचतान की बहुत सी तस्वीरें सामने आई हैं, बहुत से वीडियो सामने आए हैं, और विश्वविद्यालय परिसर में इस तनाव के बाद वहां के राज्यपाल जगदीप धनकर खुद अतिरिक्त पुलिस लेकर विश्वविद्यालय गए, और वहां से केन्द्रीय मंत्री को साथ लेकर लौटे। इस घटना की रिपोर्ट मीडिया में सभी जगह आई और कोलकाता के एक प्रमुख अखबार द टेलीग्राफ में छपी खबर से नाराज केन्द्रीय मंत्री ने अखबार के संपादक को फोन किया और उसकी रिपोर्ट पर माफी मांगने को कहा। टेलीग्राफ ने बाद में छपी एक खबर के मुताबिक, संपादक के यह कहने पर कि अखबार ने कुछ भी गलत नहीं छापा है, बाबुल सुप्रियो गाली-गलौज पर उतर आए, और उन्होंने गंदी जुबान का इस्तेमाल किया जिसके बारे में टेलीग्राफ ने अपनी खबर में लिखा भी है। इसके बाद बाबुल सुप्रियो ने ट्वीट करके लिखा कि टेलीग्राफ के संपादक ने उन्हें गंदी गालियां दीं, और टेलीफोन पर इस बातचीत की उनके पास रिकॉर्डिंग मौजूद है। इस पर अखबार के संपादक ने उन्हें चुनौती दी है कि वे इस टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग जारी करें, और कार्रवाई करें। 

इस एक मामले की हकीकत की तह में जाना हमारे लिए अभी यहां मुमकिन नहीं है, और ये दोनों पक्ष एक-दूसरे पर अपने पास मौजूद सुबूतों को लेकर कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन हम एक दूसरी बात पर आज यहां लिखना चाहते हैं कि किसी बातचीत या टेलीफोन कॉल को लेकर जब दो पक्ष एक-दूसरे के ठीक खिलाफ बयान दे रहे हों, तो ऐसे में सच तक पहुंचने के लिए क्या किया जाना चाहिए? क्या आज हर मोबाइल फोन पर मौजूद रिकॉर्डिंग की सहूलियत का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपने फोन को लगातार रिकॉर्डिंग पर रखना चाहिए ताकि किसी विवाद की नौबत आने पर सच सामने रखा जा सके? या ऐसा करना गैरकानूनी या अनैतिक होगा? सवाल यह भी उठता है कि एक पेशेवर अखबारनवीस क्या बिना बताए ऐसी रिकॉर्डिंग करे जो कि बाद में सुबूत के काम तो आए लेकिन जो विश्वास तोडऩे वाली भी कहलाए? अगर भारतीय टेलीग्राफ एक्ट ऐसी रिकॉर्डिंग को गलत न भी मानता हो, तो भी क्या लोग एक-दूसरे को बताए बिना बातचीत इस तरह रिकॉर्ड करें? और अगर रिकॉर्ड न करें तो फिर तोहमतों के आने पर अपना बचाव कैसे करें? 

इस बात का एक दूसरा पहलू भी है। बीच-बीच में कई प्रदेशों से ऐसी रिकॉर्डिंग सामने आती हैं जिनमें कोई नेता किसी अफसर को धमका रहे हैं, या कोई अफसर किसी पत्रकार को धमका रहे हैं, या कोई पत्रकार ब्लैकमेलिंग के अंदाज में किसी और से वसूली या उगाही कर रहे हैं। ऐसे मामलों में आवाज की रिकॉर्डिंग एक पुख्ता सुबूत होती है, और अब तक ऐसा कोई जुर्म दर्ज हुआ नहीं है कि अपने फोन से ऐसी रिकॉर्डिंग करना कोई जुर्म है। ऐसे में अगर कोई सत्तारूढ़ मंत्री या नेता, या कोई बड़े अफसर, अपने मातहत को फोन पर कोई जायज या नाजायज निर्देश देते हैं, तो क्या वह मातहत आगे अपने बचाव के लिए उसे रिकॉर्ड करके रख सकते हैं? या रूबरू भी सरकारी काम को लेकर ऐसे निर्देश दिए जाते हैं, तो क्या उसकी रिकॉर्डिंग करने का हक सरकारी अमले को है? अभी तक ऐसा भी कोई विवाद अदालत तक पहुंचा नहीं है जिसमें सरकारी कामकाज की बातचीत की ऐसी रिकॉर्डिंग को नाजायज कहा गया हो, इसलिए यह मानना चाहिए कि यह गैरकानूनी काम नहीं है।  अब जो गैरकानूनी नहीं है, उसे सरकारी कामकाज में क्या अनिवार्य रूप से सही मान लिया जाएगा, या फिर सरकारी सेवा नियमों की कुछ बहुत धुंधली शर्तों की आड़ लेकर ऐसा करने वाले अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्रवाई की जाएगी? 

बात शुरू तो हुई थी एक केन्द्रीय मंत्री और संपादक के बीच की बातचीत को लेकर, लेकिन किसी भी किस्म की बातचीत या फोन कॉल की रिकॉर्डिंग को लेकर नैतिकता के, पेशे के, और कानून के जो सवाल सामने हैं, उनके बारे में सोचना चाहिए। किसी फोन कॉल पर बातचीत के बीच जब धमकी मिलती है, या कोई गलत बात सुनने मिलती है, उस वक्त तो रिकॉर्डिंग शुरू नहीं की जा सकती। किसी कॉल की रिकॉर्डिंग पहले से ही शुरू हो सकती है, और अगर हर कोई ऐसा करने लगे तो उससे क्या अच्छा होगा, और क्या बुरा? एक पल को तो यह लगता है कि अगर लोगों को पता हो कि उनकी कॉल दूसरे सिरे पर रिकॉर्ड हो रही है, तो वे कई किस्म की गैरकानूनी या नाजायज बातें बोलने से बच ही जाएंगे। इसी तरह रूबरू बातचीत को लेकर भी अगर यह समझबूझ या तालमेल पहले से रहे कि कोई भी पक्ष बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे होंगे, तो भी गलत बात और गलत काम घट जाएंगे। इन बातों से जुड़े हुए और पहलुओं के बारे में सोचना चाहिए कि इससे काम के रिश्तों और निजी रिश्तों पर किस तरह का फर्क पड़ेगा। 
-सुनील कुमार

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