संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 सितंबर, रिटायरमेंट और बुढ़ापा गुजारने, और कोई बेहतर जरिया नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 सितंबर, रिटायरमेंट और बुढ़ापा गुजारने, और कोई बेहतर जरिया नहीं
Date : 24-Sep-2019

केंद्र सरकार में चल रहे एक विचार को लेकर देश भर के केंद्रीय कर्मचारियों के बीच खलबली मची हुई है कि क्या उन्हें साठ बरस के पहले भी रिटायर कर दिया जाएगा? सरकारी अमले के एक बड़े तबके  की यह सोच रहती है कि हिंदुस्तान में बेहतर सेहत के चलते, और औसत उम्र बढ़ जाने से लोग रिटायरमेंट के मौजूदा साठ बरस तक भी बूढ़े नहीं होते हैं, और उनमें काम करने का बहुत दमखम बचा होता है, ऐसे में वे रिटायर होकर बाकी जिंदगी क्या करें? इसलिए लोग नौकरी को लंबा करना चाहते हैं, बड़े-बड़े अफसर जिन्हें मोटी पेंशन भी मिलती है, वे भी रिटायर होने के बाद सरकार से संविदा नियुक्ति चाहते हैं, या तरह-तरह के आयोगों में कोई काम चाहते हैं ताकि ताकत का सरकारी जलवा बना रहे और कमाई भी होती रहे।

दूसरी तरफ लोगों का यह सोचना है कि जब सरकार की मोटी तनख्वाह के बाद रिटायर होने पर अच्छी खासी पेंशन भी मिलती है, और अगर एक दुर्लभ नस्ल की ईमानदारी भी पूरी जिंदगी बनी रहे, तो भी जिंदगी आसानी से गुजर जाने का पूरा इंतजाम रहता है, इसलिए लोगों को सरकारी काम से परे भी कुछ सोचना चाहिए। दुनिया में जो कामयाब देश है, उनमें जो मामूली भी कामयाब लोग हैं, वे कामकाजी जिंदगी के बीच भी अपना काम बदल लेते हैं, अपने शौक और मर्जी का काम करने लगते हैं, आधी कमाई पर भी पूरी तसल्ली पाकर खुश रहते हैं, और अपने जिंदगी के मकसद को पूरा करते हैं, एक मुर्दा नौकरी को नहीं। 

इस बारे में आज लिखना इसलिए सूझ रहा है कि कल देश के एक गांधीवादी समाजशास्त्री प्रोफेसर प्रभुदत्त खेड़ा का छत्तीसगढ़ में निधन हुआ जहां पर वे जंगलों के बीच आदिवासी समुदायों में काम करते हुए उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में जुटे हुए थे। वे चालीस बरस पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से रिटायर होने वाले थे, और उनके पास सहूलियतों से भरी दिल्ली में, या देश के किसी और शहर में बाकी जिंदगी चैन से गुजारने का पूरा मौका था। लेकिन उन्होंने अपने देखे हुए छत्तीसगढ़ के अचानकमार के जंगलों में बैगा आदिवासियों के बीच ही रहना तय किया, और वहीं से अपने साथ आए छात्रों के साथ छुट्टी की अर्जी भेज दी, अपनी पेंशन के पैसों से स्कूल बनवाया, और चार दशक से इन्हीं लोगों के बीच सेवा करते हुए कल आखिरी सांस ली।

लोग घरबार और अपने दायरे को पूरी तरह छोड़कर किसी जंगल में जाकर वहां बसे समुदाय की सेवा चाहे न कर पाएं, लेकिन अपने आसपास के दायरे में वे लोगों के बीच अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा करने का काम तो कर ही सकते हैं। वे इर्दगिर्द के जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा सकते हैं, लोगों को सफाई के लिए पे्ररित कर सकते हैं, कोई लाइब्रेरी चला सकते हैं, कोई हुनर दूसरों को सिखा सकते हैं, ऐसे सौ किस्म के योगदान वे लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए दे सकते हैं, बजाय सरकारी नौकरी से चिपके रहने के। और आबादी का एक छोटा हिस्सा ही सरकारी नौकरी में रहता है, बाकी लोग तो निजी काम करते हैं और ऐसे निजी नौकरी करते हैं जिसमें कभी भी निकाला जा सकता है। इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी का जुगाड़-पानी पा लेने के बाद अपना बाकी वक्त, अपनी बाकी क्षमता, दूसरों की भलों के लिए लगाना चाहिए। आज दुनिया में प्रोफेसर खेड़ा जैसी बहुत सी मिसालें हैं, बहुत सी मिसालें तो बड़ी कम उम्र की भी हैं, स्वीडन की सोलह बरस की एक छात्रा ने दुनिया में मौसम के बदलाव के खतरे पर एक आंदोलन ही खड़ा कर दिया है, और संयुक्त राष्ट्र में बीती रात उसने दुनिया के तमाम शासन प्रमुखों को झकझोर कर रख दिया है। इसलिए रिटायरमेंट को डरावना मानने वाले, और उसकी आशंका से ही दहशत में आ जाने वाले लोगों को अपनी जरूरतों से परे सामाजिक जरूरतों को भी देखना चाहिए और अपने सरोकार तय करने चाहिए, रिटायरमेंट और बुढ़ापा गुजारने के लिए उससे बेहतर और कोई जरिया नहीं हो सकता।
-सुनील कुमार

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