संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 सितंबर : कामयाब इंसान और बेहतर इंसान का फर्क
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 28 सितंबर : कामयाब इंसान और बेहतर इंसान का फर्क
Date : 28-Sep-2019

आज दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी गूगल के मुखिया, हिन्दुस्तानी मूल के सुंदर पिचाई की बचपन से अब तक की कहानी आज खबरों में आई है जिसके मुताबिक जब वे आईआईटी से पढ़ाई पूरी करके आगे पढऩे अमरीका गए तब तक उनके पास अपना खुद का कम्प्यूटर भी नहीं था। परिवार मध्यमवर्गीय था, और मामूली मकान में सारे लोग जमीन पर ही सोते थे। घर में फ्रिज भी नहीं था, और फ्रिज आना, टेलीफोन लगना बहुत बड़ी बात रही। आईआईटी के दिनों की अपनी दोस्त से मोहब्बत के बाद भी वे उससे महीनों बात नहीं कर पाते थे क्योंकि विदेश की टेलीफोन कॉल बहुत महंगी थी। आज वे गूगल के सीईओ होने के नाते इतनी बड़ी तनख्वाह पाते हैं कि उसके शून्य गिन पाना भी कुछ मुश्किल बात है। 

इस बात पर लिखना जरूरी इसलिए है कि आज कई किस्म के इश्तहार मां-बाप को उकसाते हैं कि बच्चों की तेज रफ्तार से कद-काठी बढ़ाने के लिए, उनका दिमाग तेज करने के लिए, याददाश्त बढ़ाने के लिए दूध में घोलकर क्या-क्या दिया जाए। इसके बाद बच्चों के लिए बहुत महंगे किस्म के कुछ नए पढ़ाई के ऐसे कोर्स टीवी पर बेचे जा रहे हैं जिनमें से कोई शाहरूख खान बेचता है, तो कोई अमिताभ बच्चन। कुल मिलाकर माहौल इस तरह का है कि अगर इश्तहारों का सामान आप अपने बच्चों को खिला-पिला न सकें, टीवी पर सुझाया गया कोर्स न करवा सकें, तो वे बच्चे पीछे रह जाएंगे। कई महंगी स्कूलों की एयरकंडीशंड बसें सड़कों पर दिखती हैं, उनकी बहुत महंगी और महलनुमा इमारतें भी दिखती हैं, और अखबारों में उनके बड़े इश्तहार भी दिखते हैं। ऐसा लगता है कि महंगी कोचिंग और बाकी सारे महंगे तरीकों के बिना बच्चे दुनिया में कोई मुकाबला ही नहीं कर पाएंगे। 

लेकिन दुनिया के बहुत से सबसे कामयाब लोगों को देखें तो वे गरीबी और अभाव के बीच ही आगे बढ़े हुए हैं। जिस अमरीका की तरफ हिन्दुस्तानी मां-बाप और बच्चे टकटकी लगाकर देखते हैं, वहां तो आमतौर पर अरबपति भी अपने बच्चों को पढ़ाई के दौरान कोई न कोई काम करके खर्च जुटाने के लिए कहते हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान के संपन्न मां-बाप को एक दूसरी चीज समझना चाहिए कि कामयाबी महज पढ़ाई या औजारों से नहीं आती, एक बुनियादी मेहनत और पक्के इरादे की जरूरत भी उसके लिए पड़ती है जिन्हें खरीदा नहीं जा सकता। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि कामयाबी ही सबकुछ नहीं होती, बच्चों का बेहतर इंसान बनना कामयाब बनने से बेहतर बात होती है। बिल गेट्स आज दुनिया के सबसे कामयाब और सबसे संपन्न लोगों में से एक हैं, लेकिन उतने कामयाब और उतने संपन्न तो और भी बहुत से लोग हैं, आज उनकी चर्चा इसलिए होती है कि अपनी दौलत का एक बहुत बड़ा हिस्सा वे समाजसेवा में लगा चुके हैं, और दूसरे कारोबारियों को भी समाजसेवा के लिए अपनी दौलत दान करने के लिए प्रेरित करते हैं। 

सभी मां-बाप को यह समझना चाहिए कि कामयाबी संपन्नता के बावजूद दूर रह सकती है, विपन्नता के बावजूद आ सकती है, लेकिन इन दोनों बातों से परे बच्चों को बेहतर इंसान बनाने के लिए कोई संपन्नता नहीं लगती। आज के बहुत कामयाब लोगों को देखें, अगर वे समाज के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, तो वे हकीकत में कामयाब हैं ही नहीं। दूसरी तरफ जो बेहतर इंसान हैं, वे संपन्नता के बिना भी कामयाब हैं। इसलिए आज लोगों को महत्वपूर्ण कॉलेजों में अपने बच्चों के दाखिले की अंधी दौड़ से परे भी सोचना चाहिए कि उनको कामयाब बनाने के पहले बुनियादी रूप से अच्छा इंसान कैसे बनाया जाए।
-सुनील कुमार

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