संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 सितंबर : ...तो फिर उस ईश्वर का न रहना ही बेहतर होगा..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 सितंबर : ...तो फिर उस ईश्वर का न रहना ही बेहतर होगा..
Date : 29-Sep-2019

हिन्दुस्तान में धार्मिक रीति-रिवाज कानून को तोडऩे का एक बड़ा मुद्दा रहते हैं। जब अपने रिवाजों को गुंडागर्दी के साथ बाकी सारे समाज पर थोपने की नौबत आती है, तो लोग अदालती फैसलों और कानून को पांवोंतले कुचलने लगते हैं। भोपाल से भाजपा की सांसद बनी साध्वी प्रज्ञा ने कल ही बयान दिया है कि नवरात्रि पर शोरगुल को लेकर किसी अदालत का कोई आदेश नहीं माना जाएगा, और लाउडस्पीकर भी बजेंगे, और डीजे भी। खुला और सार्वजनिक बयान अदालत के मुंह पर एक तमाचे की तरह है कि जिस अदालत की जो औकात हो वह करके देख ले, धर्म कानून को कुचलते ही रहेगा। इधर छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट जिलों को नोटिस ही जारी कर रहा है कि धार्मिक कार्यक्रमों में शोरगुल न हो, लेकिन हाल ही में गुजरे गणेशोत्सव को देखें तो शोरगुल पिछले बरसों के मुकाबले और ज्यादा हुआ, और सरकार मानो आरती की थाली घुमाते हुए खड़ी हुई थी। एक मोहल्ले में वहां के रहने वालों ने नवरात्रि पर आधी रात के बाद तक चलने वाले गरबा के खिलाफ मोर्चा खोला है कि वे इन 9 दिनों न अपने घर तक अपनी गाड़ी ले जा पाते, और न ही रात एक बजे तक सो पाते, इसलिए गरबा कॉलोनी के बीच न होने दिया जाए। और बात महज हिन्दू धर्म की नहीं है, जब जिस धर्म को मौका मिलता है, वह अपना बाहुबल दिखाने पर आमादा हो जाता है, उतारू रहता है, और हिंसा की अपनी सीमा को हर बार खुद ही हराता चलता है। और फिर एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग अराजकता के मुकाबले में और ऊंची छलांग लगाने में लगे रहते हैं। 

धर्म जिसका असर इतना अधिक है कि उसका अगर सही इस्तेमाल होता तो वह दुनिया का बहुत कुछ भला भी कर सकता था। लेकिन आज धर्म दुनिया में सबसे अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार हो गया है, दुनिया में सबसे अधिक ऐसे प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हो गया है जिससे अर्थव्यवस्था नहीं चलती। धर्म ने लोगों को अपने बच्चों से पोलियो ड्रॉप्स को दूर रखवाकर उन्हें विकलांग होने की तरफ धकेलने की धर्मान्धता दी है, धर्म ने अड़ोस-पड़ोस के लोगों का गला काटने का हौसला दिया है, और जैसा कि हिन्दुस्तान के कुछेक दंगों में सामने आया, धर्म ने लोगों को इतना हिम्मती बना दिया कि उन्होंने विधर्मी गर्भवती महिला की कोख चीरकर अजन्मे बच्चे को भी निकाल बाहर फेंका। ऐसे असरदार धर्म को लेकर महाराष्ट्र का ताजा इतिहास बताता है कि किस तरह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की शुरुआत अंग्रेजी राज के खिलाफ जनता में एक राजनीतिक जागरूकता पैदा करने के लिए, और आजादी की चाह वाला राष्ट्रवाद पैदा करने के लिए की थी। आज वह जागरूकता और वैसा राष्ट्रवाद खत्म हो गया है, और गणेश के नाम पर बेतहाशा शोर वाली अराजकता काबिज हो गई है। सरकारों में वोटों की चाह में इतना हौसला नहीं बचा है कि वे धार्मिक गुंडागर्दी और धार्मिक हिंसा को छू भी सकें। नतीजा यह है कि हर त्यौहार जिंदगी को मुश्किल, और अधिक मुश्किल बनाते चल रहा है, जीना हराम, और अधिक हराम करते चल रहा है। 

लेकिन जिन समाजों में राजनीतिक जागरूकता रहती है, वहां पर धर्म का इस्तेमाल कुछ बेहतर कामों के लिए भी किया जाता है। अभी मुस्लिमों का दुख का एक त्यौहार आया था, मुहर्रम। इस मौके पर आमतौर पर निकलने वाले परंपरागत जुलूसों में धर्म के इतिहास की तकलीफदेह शहादत को याद करके लोग अपने को जंजीरों से, हथेलियों और चाकुओं से पीट-पीटकर लहू-लुहान करते हैं। इस बार कुछ जगहों की तस्वीरें सामने आईं कि लहू को ऐसा बहाने के बजाय उस दिन मुस्लिम समाज के बहुत से युवक-युवतियों ने जाकर रक्तदान किया ताकि उनका खून किसी के काम आ सके। आज ही ट्विटर और फेसबुक पर एक चित्र सामने आया है जिसमें, शायद बंगाल के, एक चित्रकार सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय ने असम में नागरिकता-विहीन करार दिए गए लोगों की दहशत को दिखाया है। वहां 20 लाख ऐसे लोगों पर डिटेंशन कैम्प जाने का खतरा मंडरा रहा है, और इस तस्वीर में देवी दुर्गा को अपने बच्चों, गणेश, सरस्वती वगैरह को लेकर डिटेंशन कैम्प जाते हुए दिखाया गया है। धर्म का ऐसा इस्तेमाल करने के लिए कलाकारों में एक हौसला भी होना चाहिए। धर्म महज बुरी चीज नहीं है, अगर उसके इस्तेमाल से किसी जागरूकता को लाया जा सके। अगर धर्म से जुड़े हुए संन्यासी-स्वामी, और पादरी-मौलवी बलात्कार में लगे रहने के बजाय अगर कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे को उठाते, प्लास्टिक-प्रदूषण के खिलाफ धार्मिक रीति-रिवाज खड़े करते, अगर पेड़ों को कटने से बचाते, और उनकी जगह खुद कटने के लिए खड़े हो जाते, तो उनके ईश्वर की बनाई हुई इस धरती का कुछ भला होता। लेकिन धर्म से जुड़े हुए लोग जिस बड़े पैमाने पर बलात्कारी पाए जा रहे हैं, और अभी पकड़े जाने से बचे हुए हैं, उससे धर्म की साख भी अब ऐसी नहीं रह गई है कि धार्मिक वर्दी में घूमने वाले स्वघोषित दिग्गज लोगों की बात का कोई अधिक असर हो। 

ऐसे में धार्मिक आयोजन करने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि वे धर्मान्धता को बढ़ाकर महज धर्म की साख चौपट कर रहे हैं, उसका कुछ भला कुछ नहीं कर रहे, और न ही अपने बच्चों को कोई सुरक्षित दुनिया दे रहे हैं। बेहतर यह होगा कि धर्म का इस्तेमाल आस्थावानों के ईश्वर की बनाई गई दुनिया को बेहतर करने में हो, न कि उसे बर्बाद करने में। अगर ईश्वर का नाम लोगों को जागरूक न कर सके, बेहतर इंसान न बना सके, तो फिर उस ईश्वर का न रहना ही बेहतर होगा। 
-सुनील कुमार

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