संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 सितंबर : गांधी का डीएनए आखिर कैसे धरती के उस पार पहुंच गया?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 सितंबर : गांधी का डीएनए आखिर कैसे धरती के उस पार पहुंच गया?
Date : 30-Sep-2019

गांधी के जन्म को डेढ़ सौ बरस हो रहे हैं, और भारत सरकार ने इस मौके पर बड़े खास जलसे का ऐलान भी किया है। यह एक अलग बात है कि देश में कदम-कदम पर गांधी की सोच, गांधी की नसीहतों, और गांधी के बर्दाश्त के खिलाफ माहौल बढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिर भी सरकार है तो जलसा करना उसका हक तो है ही। लेकिन इस मौके पर एक दूसरी वजह से भी गांधी की चर्चा हो रही है। धरती के दूसरी तरफ संपन्न और विकसित योरप के एक सबसे संपन्न और विकसित देश स्वीडन में एक संपन्न परिवार की स्कूल जाती सोलह बरस की ग्रेटा थनबर्ग ने पिछले बरस धरती के जलवायु परिवर्तन के खतरों के खिलाफ एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया जिसने एक बरस के भीतर पूरी दुनिया में जोर पकड़ लिया है, और यह हाल के दशकों में किसी एक बच्ची का शुरू किया हुआ सबसे बड़ा आंदोलन भी बन गया है जिसने कि संयुक्त राष्ट्र में जुटे पौने दो सौ से अधिक देशों के नेताओं को भी इस बच्ची को सुनने पर मजबूर कर दिया। 

इन दो बातों में एक रिश्ता जाहिर तौर पर दिखता है जो कि हो सकता है कि मौजूद न हो। गांधी ने अपनी पूरी जिंदगी सादगी और किफायत से एक ऐसी जीवनशैली को सामने रखा था, और बढ़ावा दिया था जिससे कि धरती पर सबकी जरूरतें पूरी हो सकती हैं, चाहे आबादी जितनी भी हो। अब स्वीडन की इस छात्रा ने अपने मन से इसी बात को आगे बढ़ाया है जो कि सौ बरस पहले गांधी ने शुरू की थी, और दिलचस्प बात यह है कि अभी तक की खबरों में ऐसा कहीं पढऩे नहीं मिला है कि इसने गांधी को पढ़कर इस रास्ते पर चलना तय किया, अपने पूरे परिवार को एक बहुत किफायती जिंदगी जीने पर सहमत कराया, और एक अहिंसक आंदोलन शुरू किया। आज जब इस किशोरी की इस पहल और इस ऐतिहासिक कामयाबी की खबरें आती हैं, तो जाहिर तौर पर गांधी भी याद आते हैं। ऐसे में कुछ लोगों को यह बात नाजायज लग रही है कि हम गांधी को याद करने के लिए पश्चिम की एक छात्रा के रास्ते यह काम कर रहे हैं। लेकिन जैसा कि दुष्यंत कुमार ने लिखा था, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए, अगर गांधी की सोच को कोई गांधी को जाने बिना भी आगे बढ़ा रही है, तो वह तो सचमुच ही गांधी की बेटी है, और गांधी के हिन्दुस्तानी नामलेवा, और जानलेवा, लोगों के मुकाबले गांधीवाद की असली वारिस है, फिर चाहे उसने गांधी को पढ़ा भी न हो। दरअसल किसी को जानने के लिए उस सरीखी सोच भी काफी हो सकती है, उसे जानना जरूरी नहीं होता, और स्वीडन की इस बच्ची ने यही किया है। 

आज गांधी के जन्म के देश हिन्दुस्तान में जहां कि हर बच्चे को स्कूल के शुरू के कुछ बरसों में ही कई बार गांधी को पढऩा होता है, और साल में कम से कम चार बार स्कूल के जलसों में गांधी के बारे में सुनना होता है, उन बच्चों में से भी स्कूल में रहते-रहते एक ने भी गांधीवाद के बारे में कोई असल पहल अपनी जमीनी जिंदगी में नहीं की है, तो फिर एक स्वीडिश लड़की को बिना रक्तसंबंध के भी गांधी की वारिस मानने में क्या दिक्कत है जिसने कि सचमुच ही गांधी की सोच को आगे बढ़ाया है, बिना गांधी को पढ़े, बिना गांधी को जाने, और बिना गांधी को राष्ट्रपिता पाए। दरअसल पश्चिम से ऐसा परहेज भी किसी काम का नहीं है कि गांधी की सच्ची वारिस को देखते हुए भी हम उसकी पहल के रास्ते गांधी को देखने में हीनभावना महसूस करते हैं। गांधी के लिए स्कूलों में गांधी पढऩे वाले, या सालाना उनकी याद करने वाले लोग जरा भी अहमियत नहीं रखते हैं, उनके लिए तो वे लोग मायने रखते हैं जो उनकी राह पर चलते हुए धरती को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, और धरती के साधनों पर सारे लोगों के बराबरी के हक की ओर बढ़ रहे हैं। अपनी खपत को कम करके, खुद किफायत की जिंदगी जीकर, अपनी खुद की तकलीफ से हासिल की गई मिसाल को दूसरों के सामने रखकर जो लोग गांधी को याद दिलाते हैं, वे उन लोगों से बेहतर हैं जो गांधी को सालाना जलसों में राष्ट्रपिता मानते हैं, और इन दिनों तो गांधी के कातिल की पूजा भी करने में लगे हुए हैं। 

दरअसल हिन्दुस्तान के लोगों को स्वीडन की इस छात्रा के बारे में सोचना चाहिए कि उसने गांधी से हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए, गांधी को जाने-पहचाने बिना किस तरह गांधी की सोच का डीएनए हासिल किया? यह कामयाबी छोटी नहीं है, और गांधी के नामलेवा लोगों को सोचना चाहिए कि यह पारस पत्थर उन्हें छूकर भी क्यों नहीं बदल पाया? क्यों हिन्दुस्तान नाम का यह मुल्क गांधी नाम की वल्दियत पाकर भी आज इस हालत में पहुंचा हुआ है कि कदम-कदम पर, सड़क-चौराहे पर गांधी की सोच को घेरकर उसकी भीड़त्या की जा रही है? क्या ऐसे हिन्दुस्तानियों को भी इस बात पर आपत्ति करने का कोई हक है कि किसी फिरंगी गोरी लड़की की पहल की वजह से, उसका जिक्र करते हुए हम गांधी को क्यों याद कर रहे हैं? आज शायद गांधी दूसरे देशों से होते हुए ही हिन्दुस्तान को यह याद दिला सकेंगे कि वे थे, और आज उनकी सोच को जिंदा रहने देना चाहिए, अगर इस देश को जिंदा रखना है। स्वीडन की ग्रेटा ने न सिर्फ दुनिया को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा दिखाया है, बल्कि अनजाने ही उसने हिन्दुस्तानियों को एक आईना भी दिखा दिया है जिसमें अपना चेहरा बड़ा बदशक्ल पाकर हिन्दुस्तानी इस पश्चिमी आईने को तोडऩा चाहते हैं। 
-सुनील कुमार

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