विचार / लेख

धर्म का मनोविज्ञान और मनोवैज्ञानिक बीमारियां
धर्म का मनोविज्ञान और मनोवैज्ञानिक बीमारियां
Date : 04-Oct-2019

संजय श्रमण
मनोविज्ञान के पाठक जानते हैं कि भारत में तीन प्रकार के सिंड्रोम पाए जाते हैं। पहला धात सिंड्रोम जिसमें हर किशोर को लगता है उसे ही सबसे ज्यादा स्वप्नदोष (स्वप्न में वीर्यपात) हो रहा है।
दूसरा सिंड्रोम जननेन्द्रिय के आकार से संबंधित है हर भारतीय किशोर और पुरुष को लगता है कि उसकी जननेंद्रिय दूसरे से छोटी है।
तीसरा और सबसे भयानक सिंड्रोम है पोजेसिव सिंड्रोम जिसमें लोगों को लगता है उन्हें कोई देवी या देवता आविष्ट कर ले रहा है। इसे देवी आना भी कहते हैं। ये तीनों सिंड्रोम असल में सेक्स और सेक्स के दमन से ही जुड़े हुए हैं।
पहले दो सिंड्रोम उम्र के साथ ठीक हो जाते हैं फिर भी किशोरों और युवाओं को बहुत कुंठित कर जाते हैं। कई बरस वे हीन भावना और नीम हकीमो सहित संस्कार सिखाने योगी और बाबाओं की गुलामी में गुजारते हैं।
लेकिन तीसरा सिंड्रोम सबसे भयानक है। यह व्यक्ति को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को मूर्ख और जड़ बनाए रखता है। कभी कभी ये सामूहिक हिस्टीरिया बन जाता है। इसमें पीडि़त व्यक्ति सामाजिक सम्मान का पात्र बन जाता है और दूसरों को अंधविश्वास के दलदल में फसाए रखता/ रखती है। दुर्भाग्य से चंूकि भारतीय स्त्रीयों का सेक्स सबसे दमित स्थिति में है और वे जाति और विवाह नामक संस्थाओं में बड़ी ही असुरक्षित होती हैं इसलिए उन्हें सबसे ज्यादा देवी देवता आते हैं। ये एक तरह से भय और असुरक्षा से जन्मी मानसिक बीमारी है, यह एक तरह का सम्मोहन है जिसे अंधविश्वासी धर्म गुरू और पोंगा पण्डित महिमामण्डित करते हैं।
भारत के समाज में जहां आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म का आविष्कार लोगों को मूर्ख बनाए रखते हुए उनका शोषण करने के लिए किया गया है।  वहां इन बीमारियों और बीमारों की पूजा होती है। 
इस तीसरे सिंड्रोम को काम करते हुए आपको देखना है तो आजकल का समय बड़ा उचित समय है। गांव में या कस्बों में पूजा पंडालों में गौर से झांकिए आपको ऐसे लोग मिल जायेगे। फिर इन्हें गौर से देखते हुए इसका पूरा ढंग ढौल और काम करने का तरीका भी समझ में आ जाएगा।

 

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