विचार / लेख

प्रसाद और प्रेमचंद
प्रसाद और प्रेमचंद
Date : 05-Oct-2019

प्रेमचंदजी का शव पड़ा हुआ था।  उस निर्जीव शरीर को गोंद में चिपटाए भाभी शिवरानी आकाश का भी हृदय दहला देने वाला करुण क्रन्दन कर रही थी। श्मशान जाने के लिए नगर के सैकड़ों संभ्रान्त साहित्यिक उतावले हो रहे थे। कुछ अपने दुख का वेग नहीं संभाल पा रहे थे।  कुछ को और भी बहुत से काम थे।  उन्हें जल्दी थी इस काम से निबट जाने की। और कुछ ने मुझे बतलाया था कि वह रास्ते से ही अलग हो जाएंगे , श्मशान तक न जा सकेंगे।
और भाभी शिवरानी शव को किसी को छूने नही दे रही थी। सबने ‘’प्रसादजी’ से कहा- ‘आप ही समझाए।’  वे आगे बढ़े।  भाभी से बोले- ‘अब इन्हें जाने दीजिए। ’  
वे क्रोधपूर्वक चीख उठी। ‘आप कवि हो सकते है पर स्त्री का हृदय नही जान सकते।  मैने इनके लिए अपना वैधब्य खंडित किया था।  इनसे इसलिए नहीं शादी की थी कि मुझे दुबारा विधवा बना कर चले जाएं।  आप हट जाइए।’ 
प्रसादजी के कोमल हृदय को वेदना तथा नारी की पीड़ा ने जैसे दबोच लिया। उनका गला भर आया। नेत्रों में आंसू छलछला उठे।  मैं ही सामने खड़ा दिखाई पड़ा।  मुझसे भर्राई आवाज में बोल-‘परिपूर्णा , तुम्ही संभालो’ ।  भाभी चिल्लाती चीखती रही और मैंने  अब यह प्रेमचंदजी नहीं है, मिट्टी है  कहकर मुर्दा उनकी गोद से छीन लिया। 
उस घटना के बाद मैंने प्रसादजी को कभी हंसते नहीं देखा । उनके शरीर में क्षय घुस चुका था। 
जब चिता की लपट उन्हें समेटने लगी,  सब लोग इधर-उधर की बातें भी कर रहे थे।  प्रेमचन्दजी के सम्बन्ध में कलप रहे थे। पर एक व्यक्ति मौन, मूक, एकटक चिता की ओर देखता रहा।  प्रेमचंदजी का शव उठाने के समय ऐसी घटना हो गई थी उसके साथ कि उसका मन रो रहा था और शायद वह देख रहा था।  6 माह के बाद अपनी चिता भी। वह थे श्री जयशंकर ‘प्रसाद’।  (बीती य़ादे 99 परिपूर्णानन्द वर्मा )

 

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