विचार / लेख

कांशीराम को समझने में वाजपेयी भी चूक गए
कांशीराम को समझने में वाजपेयी भी चूक गए
Date : 09-Oct-2019

-दुष्यंत कुमार

अंग्रेज़ी में एक मुहावरा है, ‘फास्र्ट अमंग दि इक्वल्स’। इसी शीर्षक से ब्रिटिश लेखक जेफऱी आर्चर ने 80 के दशक में ब्रिटेन की सियासत पर एक काल्पनिक उपन्यास भी लिखा था। इसका मतलब है किसी विशेष समूह में शामिल व्यक्तियों में किसी एक का ओहदा, प्रतिष्ठा, हैसियत आदि सबसे ऊपर होना। इसे देश की केंद्रीय सरकार में प्रधानमंत्री के पद से समझा जा सकता है। मंत्रिमंडल में सभी मंत्री ही होते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की हैसियत बाक़ी सभी मंत्रियों से ज़्यादा होती है। उसके मुताबिक़ ही मंत्रिमंडल तय होता है। वह इसका मुखिया है। दुनिया के लिए प्रधानमंत्री ही देश का चेहरा होता है। और यही वह पद है जिस पर आज़ादी के बाद दलित वर्ग का कोई व्यक्ति अभी तक नहीं पहुंचा है।

ऊपर जो छोटी सी भूमिका है, उसका कांशीराम के जीवन की एक घटना और उद्देश्य दोनों से गहरा संबंध है। कहते हैं कि एक बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कांशीराम को राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन कांशीराम ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रपति नहीं बल्कि प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा देने वाले कांशीराम सत्ता को दलित की चौखट तक लाना चाहते थे। वे राष्ट्रपति बनकर चुपचाप अलग बैठने के लिए तैयार नहीं हुए।

यह कि़स्सा पहले भी बताया जाता रहा है। लेकिन इस पर खास चर्चा नहीं हुई कि आखऱि अटल बिहारी वाजपेयी कांशीराम को राष्ट्रपति क्यों बनाना चाहते थे। कहते हैं कि राजनीति में प्रतिद्वंद्वी को प्रसन्न करना उसे कमज़ोर करने का एक प्रयास होता है। ज़ाहिर है वाजपेयी इसमें कुशल होंगे ही। लेकिन जानकारों के मुताबिक वे कांशीराम को पूरी तरह समझने में थोड़ा चूक गए। वरना वे निश्चित ही उन्हें ऐसा प्रस्ताव नहीं देते।

वाजपेयी के प्रस्ताव पर कांशीराम की इसी अस्वीकृति में उनके जीवन का लक्ष्य भी देखा जा सकता है। यह लक्ष्य था सदियों से ग़ुलाम दलित समाज को सत्ता के सबसे ऊंचे ओहदे पर बिठाना। उसे ‘फ़र्स्ट अमंग दि इक्वल्स’ बनाना। मायावती के रूप में उन्होंने एक लिहाज से ऐसा कर भी दिखाया। कांशीराम पर आरोप लगे कि इसके लिए उन्होंने किसी से गठबंधन से वफ़ादारी नहीं निभाई। उन्होंने कांग्रेस, बीजेपी और समाजवादी पार्टी से समझौता किया और फिर ख़ुद ही तोड़ भी दिया। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि कांशीराम ने इन सबसे केवल समझौता किया, गठबंधन उन्होंने अपने लक्ष्य से किया। इसके लिए कांशीराम के आलोचक उनकी आलोचना करते रहे हैं। लेकिन कांशीराम ने इन आरोपों का जवाब बहुत पहले एक इंटरव्यू में दे दिया था। उन्होंने कहा था, ‘मैं उन्हें (राजनीतिक दलों) ख़ुश करने के लिए ये सब (राजनीतिक संघर्ष) नहीं कर रहा हूं।’

अपने राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के दौरान कांशीराम ने, उनके मुताबिक़ ब्राह्मणवाद से प्रभावित या उससे जुड़ी हर चीज़ का बेहद तीखे शब्दों में विरोध किया, फिर चाहे वे महात्मा गांधी हों, राजनीतिक दल, मीडिया या फिर ख़ुद दलित समाज के वे लोग जिन्हें कांशीराम ‘चमचा’ कहते थे। उनके मुताबिक ये ‘चमचे’ वे दलित नेता थे जो दलितों के ‘स्वतंत्रता संघर्ष’ में दलित संगठनों का साथ देने के बजाय पहले कांग्रेस और बाद में भाजपा जैसे बड़े राजनीतिक दलों में मौक़े तलाशते रहे।

कांशीराम और उनकी विचारधारा को मानने वाले लोग कहते हैं कि इन जैसे नेताओं ने दलित संघर्ष को कमज़ोर करने का काम कामयाबी से किया। अपनी किताब ‘चमचा युग’ में कांशीराम ने इसके लिए महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी को जि़म्मेदार ठहराया है। उन्होंने लिखा है कि अंबेडकर की दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को गांधीजी ने दबाव की राजनीति से पूरा नहीं होने नहीं दिया और पूना पैक्ट के फलस्वरूप आगे चलकर संयुक्त निर्वाचक मंडलों में उनके ‘चमचे’ खड़े हो गए।

कांशीराम का मानना था कि जब-जब कोई दलित संघर्ष मनुवाद को अभूतपूर्व चुनौती देते हुए सामने आता है, तब-तब ब्राह्मण वर्चस्व वाले राजनीतिक दल, जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, उनके दलित नेताओं को सामने लाकर आंदोलन को कमज़ोर करने का काम करते हैं। कांशीराम ने लिखा है, ‘औज़ार, दलाल, पि_ू अथवा चमचा बनाया जाता है सच्चे, खरे योद्धा का विरोध करने के लिए। जब खरे और सच्चे योद्धा होते हैं चमचों की मांग तभी होती है। जब कोई लड़ाई, कोई संघर्ष और किसी योद्धा की तरफ से कोई ख़तरा नहीं होता तो चमचों की ज़रूरत नहीं होती, उनकी मांग नहीं होती। प्रारंभ में उनकी उपेक्षा की गई। किंतु बाद में जब दलित वर्गों का सच्चा नेतृत्व सशक्त और प्रबल हो गया तो उनकी उपेक्षा नहीं की सजा सकी। इस मुक़ाम पर आकर, ऊंची जाति के हिंदुओं को यह ज़रूरत महसूस हुई कि वे दलित वर्गों के सच्चे नेताओं के ख़िलाफ़ चमचे खड़े करें।’

1958 में ग्रेजुएशन करने के बाद कांशीराम ने पुणे स्थित डीआरडीओ में बतौर सहायक वैज्ञानिक काम किया था। इसी दौरान अंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक छुट्टी को लेकर किए गए संघर्ष से उनका मन ऐसा पलटा कि कुछ साल बाद उन्होंने नौकरी छोडक़र ख़ुद को सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष में झोंक दिया। अपने सहकर्मी डीके खरपडे के साथ मिलकर उन्होंने नौकरियों में लगे अनुसूचित जातियों -जनजातियों, पिछड़े वर्ग और धर्मांतरित अल्पसंख्यकों के साथ बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लायीज फेडरेशन (बामसेफ़) की स्थापना की। यह संगठन आज भी सक्रिय है और देशभर में दलित जागरूकता के कार्यक्रम आयोजित करता है। 1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति की शुरुआत की जिसे डीएस4 के नाम से जाना जाता है, और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का गठन किया। आगे चलकर उन्होंने मायावती को उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनाया। ऐसा देश के किसी भी सूबे में पहली बार हुआ था।

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