संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 अक्टूबर : सरकार ऐसी हो जो सबसे गरीब के सबसे करीब हो...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 अक्टूबर : सरकार ऐसी हो जो सबसे गरीब के सबसे करीब हो...
Date : 11-Oct-2019

किसी लोकतंत्र में किसी सरकार का मूल्यांकन करना हो तो लोग अर्थव्यवस्था से जुड़े दर्जन भर पैमानों का इस्तेमाल करते हैं, जिसको अब गीली मिट्टी की तरह गढ़ा जाने लगा है। लेकिन गांधी की नजर से देखें तो सरकार की हकीकत इन आंकड़ों से परे की है, और एक नजर में समझ आ जाती है। समाज के सबसे गरीब का भला करने के लिए क्या किया गया, यह एक पैमाना सरकार के मूल्यांकन की एक बड़ी बुनियाद होनी चाहिए। लेकिन इससे परे के कुछ नए पैमाने भी इन दिनों दुनिया में इस्तेमाल हो रहे हैं, जैसे हैप्पीनेस इंडेक्स। सरकारों के मूल्यांकन के कुछ और पैमाने भी होने चाहिए कि वे अपने देश-प्रदेश को किस हालत में पाकर, किस हाल में छोड़कर जाती हैं। 

कुछ ठोस शब्दों में बात करें तो समाज के सबसे गरीब लोगों की पहली जरूरत अनाज होती है, दूसरी जरूरत इलाज, तीसरी जरूरत घर और चौथी शायद बच्चों की पढ़ाई। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ की राशन व्यवस्था देश भर में सराही गई और अब नई सरकार उसे एकदम से आगे ले जा चुकी है, गरीबी की रेखा के ऊपर के लोगों को सरकारी राशन-रियायत में शामिल करके। दिल्ली की केजरीवाल सरकार के बारे में पता लगता है कि वहां के सरकारी स्कूलों का भीतरी ढांचा देश की सबसे महंगी निजी स्कूलों के क्लासरूम से टक्कर लेता है, और इम्तिहानों में भी ये स्कूल लगातार बेहतर होते चले गए हैं। दिल्ली सरकार की ही मोहल्ला क्लीनिक योजना गरीबों का बहुत बड़ा सहारा बना है और देश में अपने किस्म का सबसे कामयाब मॉडल है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें बेघरों को घर देने में लंबे समय से लगी हुई हैं और इसे कभी इंदिरा आवास, कभी अटल आवास, कभी प्रधानमंत्री आवास, तो कभी मुख्यमंत्री आवास नाम दिया गया। देश में बेघरों के पास मकान बढ़ते चले जा रहे हैं, और सस्ती या रियायती बिजली भी आती जा रही है।

लेकिन एक पैमाने पर देश में महज दिल्ली सरकार खरी उतरी है, इलाज के मामले में। बाकी देश की राज्य सरकारों के अस्पतालों का हाल देखें तो केरल बेहतर है चूंकि पढ़ी-लिखी आम जनता की जागरूकता ने वहां कई जनसुविधाओं को बेहतर रखा है। लेकिन छत्तीसगढ़ के अखबारों में सरकार के किसी एक विभाग की नाकामयाबी-बदइंतजामी, या भ्रष्टाचार की सबसे अधिक खबरें लदी रहती हैं, तो वह स्वास्थ्य विभाग है। लेकिन यहां यह समझ लेना चाहिए कि इस विभाग की ये तीन बातें राज्य बनने से अब तक की तीनों सरकारों में चलती रहीं, आज भी जारी हैं। सरकारी अस्पतालों में कुछ घंटे गुजारकर देखा जा सकता है कि सरकार का हाल कैसा है। किसी राज्य का मूल्यांकन सड़क-पुलों, बगीचों, उसके जीडीपी से करना एक निहायत ही बाजारू सोच है। इंसानी सोच तो राशन, पोषण, इलाज, पढ़ाई, बुनियादी सहूलियतों और खुशहाली से मूल्यांकन करेगी। हर राज्य के लोगों को यह देखना चाहिए कि इन पैमानों पर उनकी सरकार कहां टिकती है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने कुछ पैमाने तय कर दिए हैं जो आगे बने ही रहेंगे, चुनौती रहेंगे। पानी-बिजली के बिल आधे, स्कूल, अस्पताल सबसे बेहतर। सरकार की सोच भी देश में नफरत फैलाने वाली नहीं है, हिंसा फैलाने वाली नहीं है।

हर राज्य सरकार को चाहिए कि वे सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले जनसंगठनों की बातें सुनने का एक खुला इंतजाम करें। ईमानदार जनसंगठन सरकारों के लिए मुफ्त के ऑडिटर की तरह भी होते हैं और उनकी कोच सरकारों को बेहतर योजनाएं बनाने में, और उन पर बेहतर अमल करने में भी मदद करती है। अच्छे जनसंगठन आमतौर पर इंसानों, दूसरे प्राणियों, और धरती के भले के लिए काम करते हैं और उनका मकसद बेहतरी, खुशहाली होता है। मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के अखबार कई हफ्तों से सेक्स-जाल पर टिके एनजीओ की खबरों से भरे हुए हैं जिन्हें दोनों राज्य सरकारों ने खूब काम दिया था। लेकिन उससे परे बहुत से ईमानदार जनसंगठन हैं जो गांधी की सोच वाले पैमानों पर सरकार की मदद कर सकते हैं। जो सरकार सबसे गरीब के सबसे करीब होगी, वही सरकार बेहतर सरकार होगी।
-सुनील कुमार

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