संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अक्टूबर : प्लास्टिक-विकल्प की समस्या, और संभावनाएं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अक्टूबर : प्लास्टिक-विकल्प की समस्या, और संभावनाएं
Date : 12-Oct-2019

देश भर में प्लास्टिक की थैलियों सहित बहुत से दूसरे सामानों पर रोकथाम का माहौल बना हुआ है। छोटे-छोटे कारखाने जो ऐसे सस्ते सामान बनाते थे वे बेरोजगार सरीखे हो गए हैं, और इन सामानों के कारोबारी अपना स्टॉक खत्म करने में लगे हैं। यह तय लग रहा है कि देश में एक बार इस्तेमाल वाला प्लास्टिक सचमुच ही बंद होने जा रहा है, और ऐसा होना भी चाहिए। इसकी शुरूआत आज कारोबारियों से की जा रही है, जबकि शुरूआत कारखानों से होनी चाहिए। अभी ऐसा कानून नहीं बना है, लेकिन चूंकि माहौल बन चुका है इसलिए उसका इस्तेमाल होना चाहिए। यह मौका आगे के दस-बीस बरस की जरूरतों और संभावनाओं को देखते हुए योजना बनाने का है। 

हमने पिछले दस-पन्द्रह बरस में दर्जनों बार यह लिखा है कि राज्य सरकार को अपने प्रदेश के तीर्थस्थानों से प्लास्टिक बैग के विकल्प पेश करने की शुरूआत करनी चाहिए। वहां महिलाओं के समूहों को जूट के कपड़े और सिलाई की मशीनें मुहैय्या करानी चाहिए। कपड़े की मिलों से निकलने वाले तरह-तरह के कपड़ों के बचत टुकड़ों से भी कई आकार के थैले बनाए जा सकते हैं। राज्य सरकार अपनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार की छपाई करवाकर इन थैलों की लागत कम करवा सकती है। तीर्थयात्रा और धर्मस्थलों के छापे वाले थैले लोग धार्मिक आस्था से भी इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन बाद में हर शहरी बाजार में ऐसे थैले पहुंच सकते हैं जिनसे हर राज्य में लाखों महिलाओं को रोजगार मिल सकता है। ऐसा व्यापक विकल्प कुछ हफ्तों में ही शुरू हो सकता है जिसमें देर नहीं करनी चाहिए।

प्लास्टिक की तुरंत फेंक दी जाने वाली बोतलों की जगह कई बार इस्तेमाल लायक बोतलों से शुरूआत करनी चाहिए, और फिर स्टील या कांच की बोतलों को जगह-जगह बढ़ाना चाहिए ताकि प्लास्टिक घटे। प्लास्टिक के ग्लास, प्लेट, चम्मच की जगह पत्तल, दोने, और मिट्टी के कुल्हड़ का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए, इससे जंगलों के आसपास बसे लोगों को एक नया कुटीर उद्योग भी मिल सकेगा। भारत में पत्तों से दोना-पत्तल बनाने की छोटी-छोटी मशीनें पच्चीस बरस से प्रचलन में है लेकिन प्लास्टिक ने उसका बाजार खा लिया था, वह बड़े पैमाने पर वापिस आ सकता है। पेड़ों के पत्ते तो हमेशा उगते रहेंगे लेकिन कुल्हड़ों के लिए मिट्टी की खदानें कब तक साथ देंगी, इसका हिसाब जरूर लगा लेना चाहिए कि इससे कोई नई परेशानी तो खड़ी नहीं हो जाएगी।

कुल मिलाकर धरती पर हजारों बरस के लिए बोझ बन गए प्लास्टिक के एक बड़े हिस्से पर रोक से धरती के बचने की एक नई संभावना भी खड़ी हो रही है और नए रोजगारों के पैदा होने की भी। भारत जैसा देश दो-ढाई दर्जन राज्यों में बंटा है और केन्द्र सरकार को चाहिए कि प्लास्टिक-विकल्प की सबसे मौलिक और कारगर योजना के लिए वह हर बरस ऐसे राज्य के लिए हजार करोड़ रूपए का एक ईनाम रखे। ऐसा भी राज्यों को चाहिए कि बिना ईनाम भी वे एक मौलिक कारनामा गढऩे की कोशिश करें। जब स्वीडन की एक स्कूली छात्रा की अक्ल की कोशिशें जब विश्व इतिहास में दर्ज हो सकती हैं तो भारत के कई प्रदेश ऐसा क्यों नहीं कर सकते? आखिर गुजरात की जमीन पर शुरू अमूल ब्रांड के पीछे का सहकारिता आंदोलन दुनिया के इतिहास का एक सबसे कामयाब आंदोलन बना है। भारत का इंडियन कॉफी हाऊस ऐसी ही दूसरी मिसाल है। भारत में प्लास्टिक-विकल्प की ऐसी शुरूआत होनी चाहिए कि बाकी दुनिया भी इसकी तरफ देखे। देश के औद्योगिक डिजाइन संस्थानों को भी सामानों की ऐसी पैकिंग, डिजाइन करनी चाहिए कि हर डिब्बा, हर बोतल बाद में इस्तेमाल का सामान बना रहे। यह सब एक बड़ी चुनौती है और बड़ी संभावना भी। बाजार में प्लास्टिक के नए सामानों और दूसरे सामानों की पैकिंग में लगने वाले डिब्बों, बोतलों, ड्रमों, और बाल्टियों के बीच एक रिश्ता बनाना होगा। इस काम में भी राज्य अपने लोगों के बीच मुकाबला करवा सकते हैं। 
-सुनील कुमार

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