संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  16 अक्टूबर : म्युनिसिपल चुनाव कैसे  हों? सुधार का एक मौका
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 अक्टूबर : म्युनिसिपल चुनाव कैसे हों? सुधार का एक मौका
Date : 16-Oct-2019

छत्तीसगढ़ सरकार की एक मंत्रिमंडल उपसमिति ने तय किया है कि म्युनिसिपल के मेयर और अध्यक्षों के लिए सीधा चुनाव नहीं होगा और वे पार्षदों के बीच से चुने जाएंगे। राज्य में पिछले कुछ चुनाव मेयर के सीधे चुनाव वाले थे, और इस दौरान बहुत से शहरों ने बड़े महंगे चुनाव देखे थे। मेयर की कुर्सी के उम्मीदवारों के वार्डों में अपनी पार्टी के पार्षद प्रत्याशियों के जिताने के लिए भी खासा खर्च करना पड़ता था। जाहिर है कि इतने बड़े पूंजीनिवेश की भरपाई के लिए म्युनिसिपल की सत्ता में आते ही लोगों को बड़ी-बड़ी कारोबारी योजनाएं बनानी पड़ती थी। मेयर का चुनाव सीधे लडऩा सम्पन्नता से भी जुड़े रहता था और म्युनिसिपल दायरे में आने वाले किस्म-किस्म के कारोबारी माफिया भी मेयर-प्रत्याशी पर दांव लगाते थे। चुनाव महज पार्षदों का होने से भ्रष्टाचार का यह एक पहलू कम होगा। वैसे भी जब देश में पीएम और राज्य में सीएम विधायकों के बहुमत से चुने जाते हैं, वे स्थानीय संस्थाओं के लिए सीधे निर्वाचन की एक अधिक महंगी और अधिक भ्रष्ट व्यवस्था गैरजरूरी है।

अब चूंकि राज्य में स्थानीय संस्थाओं के चुनावों का ढांचा तय होना है इसलिए कुछ और पहलुओं पर चर्चा होना जारी है। एक विचार यह चल रहा है कि क्या पंचायतों की तरह म्युनिसिपल चुनाव भी गैरदलीय आधार पर होने चाहिए? उम्मीदवार बिना पार्टी, बिना पार्टी निशान के लड़ें जैसे कि छत्तीसगढ़ में ही पंचायतों में लड़ते आए हैं? अगर ऐसा होता है तो म्युनिसिपल चुनाव अधिक लोकतांत्रिक होंगे और पार्टी के भीतर दबदबे या चापलूसी की वजह से लोगों का पार्टी टिकट पाना खत्म होगा? अधिक लोग चुनाव लड़ सकेंगे और एक किस्म से पार्टियों के भीतर भी मुकाबला होगा। एक बात यह उठ रही है कि जब म्युनिसिपल चुनाव संसदीय प्रणाली पर हो रहे हैं, और अगर पार्टी निशान पर हो रहे हैं तो इन पर संसद या विधानसभा की तरह दलबदल विरोधी कानून लागू होना चाहिए। यह एक अच्छी सोच है कि किसी पार्टी के झंडेतले जीतकर आए लोग दलबदल न कर सकें। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तेरह भाजपा विधायकों को फोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया था और एक तिहाई से अधिक होने से वे अपात्र भी नहीं हुए। इस कानून की सबसे बड़ी हत्या यह है कि इसमें मतदाताओं के समर्थन के साथ बलात्कार पर तो सजा है, लेकिन सामूहिक बलात्कार की छूट है। पार्षदों का चुनाव अगर पार्टी निशान पर होता है तो उनके दलबदल पर अपात्रता का नियम बनना चाहिए।

यह मौका है जब छत्तीसगढ़ सरकार इन चुनावों में काले धन की माफिया-दखल भी घटा सकती है। प्रचार में होर्डिंग, बैनर, पोस्टर, पर रोक लगाकर सिर्फ छोटे पंपलेट से प्रचार करने का एक किफायती नियम लागू किया जा सकता है। इससे काले धन की दखल भी घटेगी, और पर्यावरण भी बचेगा। वार्ड का चुनाव तो घर-घर जाकर लडऩा चाहिए और इस तरीके से सही जनमत सामने आ सकेगा। इस राज्य की नई सरकार के सामने सुधार करने का एक मौका है और उसे चुनाव न्यूनतम खर्च वाला करना चाहिए।
-सुनील कुमार

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