संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 अक्टूबर :  बस्तर के दो उपचुनावों के पीछे की वजहें क्या रहीं...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 अक्टूबर : बस्तर के दो उपचुनावों के पीछे की वजहें क्या रहीं...
Date : 24-Oct-2019

एक तरफ जब महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे दो पुराने कांग्रेसी रहे हुए राज्यों में कांग्रेस सीटें बढ़ाकर भी सरकार बनाने से बहुत दूर है, उस बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर में चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत कुछ दूसरे रिकॉर्ड भी कायम कर रही है। बस्तर में इतनी जल्दी-जल्दी दो उपचुनाव हुए जिनमें पिछले दंतेवाड़ा विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के नक्सल-हिंसा शिकार विधायक की खाली हुई सीट पर कब्जा ही नहीं किया, बल्कि दंतेवाड़ा विधानसभा में जीत की लीड का एक नया रिकॉर्ड भी बनाया। वह जीत इस मायने में भी अधिक मायने रखती थी कि वहां पर भाजपा ने नक्सल-हिंसा के शिकार हुए विधायक भीमा मंडावी की पत्नी को उम्मीदवार बनाया था, और ताजा-ताजा हादसे की याद के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने वहां भाजपा को कड़ी शिकस्त दी थी। अब दो महीने के भीतर के चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की सारी कोशिश के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने जिस अंदाज में जीत हासिल की है, वह देखने लायक है। 

जैसा कि भारत के अधिकतर प्रदेशों में आमतौर पर कांग्रेस और भाजपा की सरकारें रहने पर होता है, छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का संगठन मोटेतौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पर ही चलता है। ऐसे में अगर चित्रकोट में कांग्रेस की हार हुई होती, तो इसकी तोहमत भूपेश बघेल पर ही लगती, और अगर जीत हुई है, तो उसके हकदार भी भूपेश बघेल और कांग्रेस संगठन हैं। इस नतीजे के बाद अब राज्य के दोनों बड़े आदिवासी इलाकों से भाजपा पूरी तरह खत्म हो गई है, और विधानसभा में बस्तर और सरगुजा से कोई भाजपा विधायक नहीं रहेंगे। यह एक अलग बात है कि इन दोनों ही आदिवासी इलाकों में भाजपा के एक-एक सांसद जरूर हैं। छत्तीसगढ़ के इन दोनों उपचुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुवाई में जिस दम-खम और एकता के साथ चुनाव लड़ा, उसका मुकाबला भाजपा नहीं कर पाई। लेकिन इन दोनों जीत का श्रेय सिर्फ चुनाव अभियान को देना ठीक नहीं होगा। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान अपने घोषणापत्र के वक्त से आदिवासी इलाकों के लिए जो बड़ी बातें कही थीं, और उन्हें राज्य में सरकार बनते ही जिस तरह पूरा करना शुरू किया था, उसका खासा असर हुआ था। और नतीजा यह था कि लोकसभा चुनाव के वक्त राज्य की 11 सीटों में से जो दो लोकसभा सीटें कांग्रेस को हासिल हुईं, उनमें से एक आदिवासी बस्तर सीट भी थी। कांग्रेस ने जिस तरह टाटा के लिए ली गई आदिवासी जमीन उसके मालिकों को वापिस की, वह बस्तर में एक अनोखा काम था, और उसका असर उन आदिवासियों पर भी हुआ जिनकी जमीनें नहीं गई थीं। दूसरा फर्क यह हुआ कि भूपेश बघेल की सरकार बनने के बाद बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की हिंसा बहुत कम हुई क्योंकि पुलिस और बाकी सुरक्षा बलों को यह समझ आ गया कि उनके जुर्म अब पिछले बरसों की तरह बर्दाश्त नहीं होंगे। आदिवासियों के लिए यह एक बड़ा फर्क था कि उन्हें इंसानों की तरह माना जाने लगा, और हमारा यह मानना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की इस मोर्चे पर कड़ाई से आदिवासियों के मन में कांग्रेस के लिए जगह बनी है। फिर ऐसी भी खबरें हैं कि मुख्यमंत्री हाट बाजार स्वास्थ्य योजना के तहत पूरे बस्तर में ही जगह-जगह जिस तरह मड़ई और बाजार में क्लिनिक लगाकर इलाज किया गया, दवाईयां दी गईं, उसका भी असर हुआ है। मुख्यमंत्री ने पूरे प्रदेश में सुपोषण योजना को जितने आक्रामक तरीके से लागू किया है, उसका भी असर इस उपचुनाव में देखने मिला है। एक और बड़ी चीज जिसका असर इस चुनाव पर हुआ होगा, वह है तेंदूपत्ता का दाम बढ़ाना, और उसका बोनस बढ़ाना, लघु वनोपज का दाम बढ़ाना। इन बातों का असर पूरे प्रदेश के जंगल वाले इलाकों में होना तय है, और दंतेवाड़ा-चित्रकोट की जीत में इसका भी योगदान रहा होगा। 

अब मोटेतौर पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पूरे निपट गए हैं, उपचुनाव भी फिलहाल निपट गए हैं, और भूपेश बघेल एक विजेता की तरह उभरकर सामने आए हैं। लोकसभा चुनाव में जहां पूरे देश में कांग्रेस की सीटों में बहुत मामूली बढ़ोत्तरी हुई थी, वहां पर छत्तीसगढ़ में सीटें बढ़कर एक से दो हुई थीं, जो बहुत अच्छी कामयाबी नहीं थी, तो बहुत बुरी भी नहीं थी। आने वाले महीनों में प्रदेश में म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव होंगे, और वह भूपेश बघेल सरकार, और कांग्रेस संगठन दोनों के लिए एक बड़ी कसौटी होगी। फिलहाल कांग्रेस के लिए यह खुशी मनाने का मौका है, और भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ में एक लंबे आत्ममंथन का मौका भी है, और म्युनिसिपल-पंचायत के चुनावों में अपनी वापिसी की कोशिश करने का भी। कुल मिलाकर इन दो उपचुनावों के बाद भूपेश बघेल संगठन के भीतर भी अधिक ताकतवर और कामयाब होकर उभरे दिखते हैं। 
-सुनील कुमार

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