संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 अक्टूबर : पड़ोस में कमजोर लोकतंत्र सब पर बड़ा खतरा रहता है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 25 अक्टूबर : पड़ोस में कमजोर लोकतंत्र सब पर बड़ा खतरा रहता है
Date : 25-Oct-2019

पड़ोस के देश भारत के साथ तुलना न भी की जाए, तो भी पाकिस्तान की हालत अपने आपमें बहुत ही खराब है। एक प्रधानमंत्री इमरान खान जिनके चुनकर आने के वक्त से यह चर्चा रही कि वे फौज की मदद से जीतने वाले नेता हैं, और फौज की मेहरबानी से ही प्रधानमंत्री हैं, वे कम से कम आज तो जाहिर तौर पर फौज के मोहताज दिख रहे हैं। इमरान के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों ने एक आजादी मार्च निकालने की घोषणा की, तो इस विपक्षी नेता से मिलकर पाकिस्तानी फौज के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा कि वे आजादी मार्च न निकालें। ऐसी खबरें आई हैं कि फौज ने पाकिस्तान की राजधानी तक पहुंचने वाली सड़कों को खोद दिया है ताकि प्रदर्शन के लिए आने वाली गाडिय़ां न पहुंच पाएं। फौज ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है कि इमरान के खिलाफ कोई जंगी प्रदर्शन न हो पाए। और दिलचस्प बात यह भी है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा है कि उनके खिलाफ आजादी मार्च की योजना से भारत खुश है, और इस प्रदर्शन को विदेश से समर्थन हासिल है। इमरान ने यह भी कहा कि यह प्रदर्शन कश्मीर के मुद्दे को नुकसान पहुंचाएगा। विपक्ष के नेता फजल उर रहमान ने इमरान का इस्तीफा मांगते हुए फौज की सलाह को खारिज कर दिया है, और प्रदर्शन करने की घोषणा की है। 

पाकिस्तान के हाल पर लिखने के लिए भारत के साथ उसकी कोई तुलना करने की जरूरत नहीं है। यह समझने की जरूरत जरूर है कि उसका यह बुरा हाल क्यों हुआ है। एक ही दिन आजाद हुए ये दोनों देश आज इतने फर्क वाले क्यों हो गए हैं? पाकिस्तान शुरू से ही धर्म के आधार पर बना हुआ देश रहा, और वहां पर धर्मान्ध कट्टरपंथियों की ताकत लगातार बढ़ती रही। पाकिस्तान में लंबे समय से आजादी के बाद से ही कई बार फौजी हुकूमतें आईं जिन्होंने निर्वाचित नेताओं को जेल में डाला, फांसी चढ़ाया, या देश के बाहर रहने को मजबूर किया। धार्मिक कट्टरपंथियों के अलावा पाकिस्तान ने समय-समय पर अपने सरहदी मकसदों से जिस तरह हमलावर आतंकियों को बढ़ावा दिया, वह भी उसे घुन की तरह खोखला करने वाला काम साबित हुआ। मीडिया की आजादी को कुचलने का काम हुआ, सामाजिक आंदोलन खत्म कर दिए गए, और सवालों का जवाब गोलियों से देने का सिलसिला चलते रहा। इस देश में मजहब को इतनी अहमियत दी गई कि लोगों की रोटी, कपड़े, और मकान की जरूरतें किनारे धरी रह गईं, और एक वक्त ऐसा आया जब इसके नेताओं ने खुलकर कहा कि वे चाहे घास खाकर जिंदा रह लेंगे, लेकिन परमाणु बम जरूर बनाएंगे, और आज यह देश परमाणु हथियारों पर तो बैठा है, लेकिन इसके औजार खाली पड़े हैं, लोगों के रोजगार गायब हैं, फौज से लेकर कट्टरपंथियों तक, और आतंकियों तक हर कोई बेकाबू है। जो अकेली वजह इस देश के बनने से लेकर अब तक सबसे अधिक बर्बाद करने वाली दिखती है वह मजहबी कट्टरता है जो कि जाने कब अपना दायरा पार करके धर्मान्ध हमलावर आतंक में बदल गई, और फौज की सियासी हसरतें बढ़ती चली गईं। 

पाकिस्तान आज एक तरफ अमरीका और दूसरी तरफ चीन के रहमोकरम पर दो वक्त की रोटी पा रहा है, लेकिन उसका अपना हाल बड़ा फटेहाल है। इंग्लैंड में पढ़े हुए एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री भी इसका कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मुल्क की बदहाली एक कैंसर की तरह लाइलाज हो चुकी दिखती है। आज दुनिया में जगह-जगह पाकिस्तान को आतंकियों की पनाहगाह माना जा रहा है, और उस पर खुलकर चर्चा हो रही है। इस हाल को देखकर दुनिया के बाकी देशों को कई किस्म के सबक लेने की जरूरत है कि किस तरह राजनीति में धर्म का घालमेल देश को अराजक बनाता है, और बर्बाद करता है। यह भी समझने की जरूरत है कि जब देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक-एक कर कमजोर और खत्म किया जाता है, तो देश के लोगों को लोकतंत्र से परे फौज पर भरोसा होने लगता है, कानून अपने हाथ में ले लेना आसान और बेहतर लगने लगता है। यह पूरा सिलसिला पाकिस्तान की इस खतरनाक नौबत को तो बताता ही है, लेकिन कमजोर और खोखले हो चुके एक लोकतंत्र के पड़ोस के देशों पर कई किस्म के खतरे भी बताता है। दुनिया में यह उत्तर कोरिया के बाद दूसरा ऐसा देश है जहां के लोग, जिम्मेदार और ताकतवर ओहदों पर बैठे हुए लोग लापरवाही से परमाणु हथियारों की चर्चा करते हैं, उनके इस्तेमाल की चर्चा करते हैं। हाल यह है कि पाकिस्तान को अपने गंभीर बीमार लोगों को इलाज के लिए हिन्दुस्तान भेजना पड़ता है, लेकिन वह अपने परमाणु हथियारों के दंभ को छोड़ नहीं पा रहा है। किसी भी ऐसे देश में परमाणु हथियार पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है जहां पर किसी पल भी फौज हुकूमत सम्हाल सकती है, या फौजी निगरानी के बीच भी मजहबी आतंकी किसी भी हथियार तक पहुंच सकते हैं। आर्थिक रूप से दीवालिया हो चुके इस देश में निराशा इतनी बड़ी हो चुकी है कि अपने लोगों को उसके बीच फख्र की एक वजह देने के लिए देश की सरकार या फौज पड़ोसी पर हमला करके एक जंग की तरफ लोगों का ध्यान बांट सकती है। पाकिस्तान के पड़ोसी लोकतंत्रों को इस नौबत से खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि पड़ोस में कमजोर लोकतंत्र सब पर बड़ा खतरा रहता है।
-सुनील कुमार

Related Post

Comments