संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 अक्टूबर : और वे लोग अपने तमगे लौटाने  के लिए भी लौट भी नहीं सकते
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 अक्टूबर : और वे लोग अपने तमगे लौटाने के लिए भी लौट भी नहीं सकते
Date : 26-Oct-2019

विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिया जाए या नहीं इस पर देश के लोग दो खेमों में बंट गए हैं। इन खेमों के आकार देश में मोदी की शोहरत वालों, और मोदी पर तोहमत वालों के आकार के हो सकते हैं, लेकिन इतिहास को गिनाने के लिए तो गिनती के दस्तावेज काफी होते हैं, और इतिहास जनमत संग्रह तो होता नहीं है। देश के इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि सावरकर ने एक वक्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था, और फिर जेल से ही उन्होंने अंग्रेजों से बार-बार माफी मांगते हुए अपनी रिहाई करवाई थी, अंग्रेज सरकार के लिए वफादारी के वायदे लिखकर दिए थे, अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था, अंग्रेज सरकार से गुजारा-भत्ता या पेंशन हासिल की थी, उसे बढ़ाने की मांग भी की थी। वे गांधी हत्या के मुकदमे में भी घिरे थे, और बाद में सुबूत न मिलने पर बरी किए गए थे। अब महाराष्ट्र चुनाव के पहले भाजपा ने महाराष्ट्र के इस बेटे को भारत रत्न देने की घोषणा की थी जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के हाथ की बात है, और एनडीए की गठबंधन सरकार के भीतर भला भाजपा या नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की घोषणा का कौन विरोध कर सकते हैं? 

अब सवाल यह उठता है कि गांधी के हत्यारों के साथ बड़े गहरे रिश्तों वाले और अंग्रेजों की वफादारी की कसमें खाने वाले, अंग्रेजों से पेंशन पाने वाले को अगर भारत रत्न दिया जाता है, तो फिर यह सरकारी सम्मान और किसी भी, कैसे को भी क्यों नहीं दिया जा सकेगा? इसलिए जब सत्ता की ताकत किसी को अच्छी तरह दर्ज इतिहास को खारिज करते हुए, लोगों के हाथ के लिखे हुए माफीनामे को अनदेखा करते हुए, सरकारी खजाने से पेंशन मिलने के खातों को अनदेखा करते हुए देश का रत्न साबित करने का हक देता है, तो क्या सचमुच ही लोकतंत्र में ऐसा कोई हक रहना चाहिए? और इस बात को हम आज पहली बार इस सिलसिले में नहीं उठा रहे हैं, बरसों से हम लगातार यह लिखते आ रहे हैं कि सरकारों को किसी भी सम्मान या पुरस्कार देने से अपने को अलग रखना चाहिए। जो सरकारें वोटों की बदौलत बनती हैं, उनके समझौतापरस्त होने की गारंटी रहती है, और ऐसे में उन सरकारों को कैसे यह हक दिया जा सकता है कि वे अपनी मर्जी से लोगों का सम्मान करें? किसी चुनाव के पहले, किसी धर्म या जाति के लोगों को खुश करने के लिए, किसी के रिश्तेदारों का समर्थन संसद या विधानसभा में पाने के लिए जो सम्मान दिए जा सकते हैं, उन सम्मानों का वैसे भी क्या महत्व रहता है? इस बात को हम पहले भी दस-दस बार लिख चुके हैं कि सरकारों को सम्मान और पुरस्कार के कारोबार से अपने को परे रखना चाहिए। सरकारी सम्मान-पुरस्कार कभी विश्वसनीय या सम्माननीय नहीं हो सकते। देश में हर बरस दर्जनों लोगों को पद्मश्री, पद्मभूषण, और पद्मविभूषण जैसे सम्मान दिए जाते हैं। और तो और प्रणब मुखर्जी जैसे पेशेवर सत्ता-नेता को भी इनमें से कोई सम्मान दिया जा चुका है जबकि वे यूपीए की दोनों सरकारों के हर उस फैसले में शामिल थे जिन्हें बाद में भ्रष्ट पाया गया था। ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रीय सम्मान देने का हक भी अगर सरकार को होता है, तो ऐसे हक को खत्म कर दिया जाना चाहिए। और अब तो बात देश के सबसे बड़े सम्मान की आ गई है, और देश के एक सबसे ही विवादास्पद आदमी को जब उसे देने की राजनीतिक घोषणा हो चुकी है, तो देश के समझदार तबके को एक बार फिर यह सोचना चाहिए कि क्या कोई भी सरकारी अलंकरण जारी रहने चाहिए? दिक्कत यह है कि देश के बड़े-बड़े लेखक और विचारक, कलाकार और फिल्मकार बीते बरसों में इन सम्मानों को खुशी-खुशी हासिल करते रहे हैं, और देश के गिने-चुने ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने इसे मना किया हो। इसलिए उम्मीद तो बिल्कुल नहीं है कि सरकारी सम्मानों को खत्म करने पर अधिक लोग बात करेंगे, लेकिन हम इस मुद्दे को उठाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं कि इसके पहले न हो पाया तो न सही, कम से कम अब तो राष्ट्रीय सम्मान-पुरस्कार बंद कर दिए जाएं ताकि इसके विरोध में लोग अपने को मिले ऐसे सम्मान-पुरस्कार लौटाने को मजबूर न हों। आज तो भारत रत्न पाने वाले अधिकतर लोग गुजर चुके हैं, और वे लोग अपने तमगे लौटाने के लिए भी लौट भी नहीं सकते। 
-सुनील कुमार

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