संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 नवंबर : मां का दर्जा नुकसान छोड़ कुछ भी नहीं कर रहा है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 नवंबर : मां का दर्जा नुकसान छोड़ कुछ भी नहीं कर रहा है...
Date : 04-Nov-2019

बीते दो दिनों में उत्तर भारत में अधिकतर जगहों पर बड़ी संख्या में लोगों ने छठ का पर्व मनाया, और बाकी जगहों पर भी जहां-जहां बिहार से गए हुए लोग बसे हैं, वहां भी नदियों और तालाबों तक दो दिनों तक लोग पहुंचे और पानी में डूबे हुए पूजा-अर्चना की। लेकिन बिहार में कुछ जगहों पर ऐसा भी हुआ कि तालाब सूख जाने की वजह से गरीबों ने एक गड्ढा खोदकर उसमें कहीं से पानी जुटाकर छठ की रस्म पूरी की, और कुछ रईस लोगों ने घर की छत पर पानी की टंकी बनाकर यह काम किया। कुल मिलाकर देखें तो हिन्दुस्तान के बहुत से धार्मिक त्यौहार नदियों और तालाबों के किनारे या उनके भीतर होते हैं, गणेश-दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन होता है, ताजिया विसर्जित किए जाते हैं, पूजा सामग्री विसर्जित की जाती है। नदियों की अपने आपमें पूजा होती है, गंगा को मां माना जाता है, और उत्तर भारत के एक हाईकोर्ट ने तो गंगा को एक व्यक्ति मानते हुए उसके हक तय किए हैं जो कि भारत के किसी भी नागरिक के होते हैं। गंगा को साफ करने की कसम खाते हुए गंगा सफाई मंत्री उमा भारती ने यह काम पूरा न होने पर जल समाधि लेने की घोषणा की थी, जिसकी एक गंदी पड़ी हुई गंगा बेसब्री से राह देख रही है।

सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने ऐसी तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें उत्तर-पूर्वी भारतीय प्रदेशों की कांच की तरह साफ और पारदर्शी नदियां दिखती हैं जहां पर नदियों को न मां माना जाता, न जिनकी पूजा होती। दूसरी तरफ जिस उत्तर भारत में या पश्चिम से लेकर दक्षिण भारत तक जहां-जहां नदियों की पूजा होती है, वहां-वहां नदियां प्रदूषण के बोझ से लदी हुई हैं, और दम तोड़ रही हैं। गंगा का पानी पीना तो दूर रहा, नहाने के लायक भी नहीं हैं। अगर किसी को गंगा का साफ पानी चाहिए तो वह गंगोत्री से छोटी-छोटी बोतलों में भरकर लाकर पोस्ट ऑफिसों में बेचने वाले काऊंटर पर ही मिल सकता है। तालाब पूरे देश में एक-एक कर सिमटते जा रहे हैं, पाटकर वहां इमारतें बनती जा रही हैं, और ऐसा लगता है कि आधी सदी में एक दिन ऐसा आ जाएगा जब छठ की पूजा के लिए बड़े बर्तनों में डूबकर बारी-बारी से रस्म पूरी करनी पड़ेगी। जिस तरह एक वक्त सूखे गुजरात में लोहे के बनाए गए चबूतरों पर चढ़कर लोग नहाते थे, और नीचे उसी पानी में कपड़े धोए जाते थे, हो सकता है कि आने वाले रस्म-रिवाज इसी किस्म के होंगे। 

दरअसल नदी को नदी न मानकर मां मान लेने का नतीजा यह होता है कि उसे आसानी से वृद्धाश्रम भेजा जा सकता है, और भुलाया जा सकता है। गाय को मां मानने का नतीजा यह होता है कि साल में चार बार किसी त्यौहार पर गाय को ढूंढकर उसकी पूजा करके उसे खिलाया जाए, और बाकी पूरी जिंदगी उसे घूरों पर पॉलीथीन खाने के लिए छोड़ दिया जाए। न जीने दिया जाए, न ही कसाईखाने जाने दिया जाए, बस भूखे मरने दिया जाए। जिन देशों में गाय को जानवर मानते हैं, वहां उसे काटने के ठीक पहले तक एक आलीशान जिंदगी नसीब होती है, और जन्म से लेकर कटने तक गाय कभी घूरे नाम की चीज को देख नहीं पाती। इधर हिन्दुस्तान में गौमाता दंगे का सामान बनाकर रख दी गई है, और उसकी जिंदगी घूरे तक सीमित कर दी गई है। गाय से लेकर गंगा तक, जिसे-जिसे जानवर और नदी के दर्जे से बाहर निकालकर मां का दर्जा दिया गया है, वहां-वहां उसे बूढ़ी और बेबस मां की तरह वृद्धाश्रम में डाल दिया गया है, जहां न खाने को है, न मरने को है। हिन्दुस्तान में रीति-रिवाजों में नदी और तालाब का महत्व बहुत है, लेकिन पूजा का दिन निकल जाने के बाद इन जगहों को बर्बाद करते हुए ही पूरा साल गुजरता है। इतिहास में कहा जाता है कि किसी देश की सभ्यता उसकी नदियों के किनारे विकसित होती है। हिन्दुस्तान में जाने गंगा के किनारों का कैसा बेजा इस्तेमाल हुआ है कि ऐसी असभ्य नस्ल इस देश में विकसित हुई है जो कि गंगा को मार डालने के लिए उतनी ही उतारू है जितना कि कोई कपूत अपनी मां को मारने पर उतारू रहता है। ऐसी धार्मिक इज्जत से बेहतर तो वह पर्यावरण की इज्जत है जो नदियों का सम्मान करना सिखाती है, तालाबों का सम्मान करना सिखाती है। मां का दर्जा गाय से लेकर गंगा तक महज नुकसान ही कर रहा है। 
-सुनील कुमार

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