सामान्य ज्ञान

 प्रेस नियंत्रण अधिनियम
प्रेस नियंत्रण अधिनियम
Date : 09-Nov-2019

भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान प्रारंभ में किसी भी प्रेस संबंधी कानून के अभाव में समाचार-पत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों की दया पर ही निर्भर करते थे। कंपनी के अधिकारी नहीं चाहते थे कि ऐसे समाचार-पत्र जिनमें उनके कारनामों के बारे में जिक्र होता था, किसी भी तरह लंदन न पहुंचे।  जिन संपादकों से उन्हें परेशानी होती थी, उन्हें लंदन वापस भेज दिया जाता था।  लेकिन ऐसा भारतीयों के साथ संभव नहीं था।  अंतत: वेलेस्ली ने प्रेस नियंत्रण अधिनियम द्वारा समाचार- पत्रों पर नियंत्रण लगा दिया।  इसके तहत समाचार-पत्र  पर उसके संपादक और मुद्रक का नाम प्रकाशित करना अनिवार्य हो गया। 
 लार्ड हेस्टिंग्स ने इसे कड़ाई से लागू नहीं किया और 1818 में फ्री सेंसरशिप को समाप्त कर दिया।  जॉन एडम्स के समय (1823) में भारतीय प्रेस पर फिर से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।  लायसेंस के अभाव  में समाचार-पत्र प्रकाशित करने पर जुर्माना या कारावास की सजा भुगतनी पड़ती थी। 
वर्ष 1835 में लिबरेशन ऑफ द इंडियन  प्रेस अधिनियम लागू किया गया। इसके अंतर्गत प्रकाशक को केवल  प्रकाशन स्थान की जानकारी देना अनिवार्य कर दिया गया। 1867 में पंजीकरण अधिनियम लागू करने का उद्देश्य समाचार- पत्रों को नियंत्रित करना था, जिसके तहत मुद्रक और प्रकाशक का नाम प्रकाशित करना जरूरी था।
 1878 के वर्नाकुलर प्रेस अधिनियम में देशी भाषा वाले समाचार पत्रों को नियंत्रण में लाने का प्रयास किया गया। 1908 के अधिनियम द्वारा आपत्तिजनक सामग्री छापने पर मुद्रणालय जब्त कर लिए जाते थे। 1910 के इंडियन प्रेस एक्ट के तहत प्रकाशकों से पंजीकरण जमानत जमा की जाती थी। इसके बाद 1931 और 1951 में भी प्रेस विरोधी अधिनियम लागू किए गए। 
 

 

Related Post

Comments