संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 नवम्बर : बच्चों को बेहतर इंसान बनाने का आसान नुस्खा!
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 नवम्बर : बच्चों को बेहतर इंसान बनाने का आसान नुस्खा!
Date : 11-Nov-2019

अयोध्या पर फैसले के साथ ही लोगों को बाबरी मस्जिद गिराने की याद आई और याद आए लालकृष्ण अडवानी जिन्होंने रथयात्रा निकालकर देश में हिंदू-उन्माद को बाबरी मस्जिद के गुम्बदों की ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। देश में जो सोचने वाले अब भी बचे हैं उनमें से कुछ ने याद किया कि रथयात्रा के प्रबंधक नरेन्द्र मोदी नाम के एक नौजवान थे। फिर लोगों को लगा कि चौथाई सदी हो गई, बाबरी विध्वंस का मुकदमा ही चल रहा है, उसका फैसला भी क्या मुजरिमों की जिंदगी में आएगा, या स्वर्गवासियों को सजा होगी? लोगों को वे मुख्यमंत्री और राज्यपाल याद आ रहे हैं जो बाबरी केस के कटघरे से सीधे शपथ लेने गए थे और अब फिर कटघरे में हैं। धरती की नाचीज अदालत का इंसाफ आए तब तक राम और अल्लाह का इंसाफ इन लोगों को बुला तो नहीं लेगा?

लेकिन देश की मंदिरों की घंटियों की तेज होती आवाजों के बीच सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक अधिक धार्मिक, अधिक धर्मान्ध और अधिक साम्प्रदायिक देश के रूप में हिंदुस्तान अधिक खुशहाल भी होगा? आज जब नारे हिंदुत्व के मील के पत्थर को खासा पीछे छोड़कर हिंदू राष्ट्र की ओर लपक चले हैं, तो दुनिया के सभ्य, सुखी, खुशहाल लोकतंत्रों की ओर भी देखना जरूरी है कि क्या वे खुशहाली की ओर धर्म के घोड़े पर सवार होकर पहुंचे हैं? 

दुनिया के खुशहाल देशों की फेहरिस्त में जो देश ऊपर हैं, वहां धर्म दम तोड़ रहा है। अधिकतर लोग गैरसाम्प्रदायिक और गैरनफरती हैं। धर्म का महत्व भी घटते चल रहा है और धर्म से परे जाते, नास्तिक होते लोग बढ़ते जा रहे हैं। हिंदुस्तान जैसे धर्म से लबालब, उफनते हुए, देश में जहां बेरोजगारी करोड़ों की गिनती में बढ़ रही है, वहीं सभ्य, विकसित और खुशहाल देशों में धर्म की दुकानें बंद हो रही हैं और चर्चों का बंद होकर वहां शराबखाने खुलना चल रहा है। उधर धर्म बेरोजगार हो रहा है, लोग खुशहाल हो रहे हैं, इधर धर्म खुशहाल हो रहा है, लोग बेरोजगार और बदहाल हो रहे हैं, लेकिन धर्म नाम की अफीम के नशे में उसके दर्द का अहसास नहीं हो रहा है। कभी किसी कमसमझ ने लिखा था कि भूखे भजन न होए गोपाला। अब आज के हिंदुस्तान में भोजनवंचित लोग भजनसंचित होकर बेतहाशा खुश हैं और भूखे पेट, नंगे पैर, हिंदू राष्ट्र की मंजिल की तरफ बढ़े चल रहे हैं। कार्ल मार्क्स ने धर्म को नाहक ही अफीम का दर्जा नहीं दिया था। आज वह इस देश में सिर चढ़कर बोल रहा है।

दुनिया के नास्तिक होते देशों और अमरीका के सबसे कम धार्मिक प्रदेशों को देखें तो उनमें एक बात एक सरीखी है, वे बेहतर हालत में हैं, और अधिक खुशहाल हैं। हिंदुस्तान का मॉडल यह समझाने के लिए आज एकदम सही है कि धर्म की धार को बढ़ाते चलने से उसके सामने एक काल्पनिक विधर्मी दुश्मन खड़ा कर देने से वह धर्म से बढ़कर धर्मोन्मादी हो जाता है, फिर साम्प्रदायिक हो जाता है, और फिर जानलेवा हो जाता है। वह अपने को मानने वालों के लिए भी जानलेवा हो जाता है।

आज अपने ही परिवार के किसी बच्चे को बेहतर इंसान बनाना हो तो उसे धर्म से दूर रखकर देखें, वह दुनिया का एक बेहतर नागरिक बनेगा, और बेहतर दुनिया बनाएगा।
-सुनील कुमार

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