संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 नवंबर : भारतीय राजनीति में गब्बर,  बीरू, जय, ठाकुर, सब साथ
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 नवंबर : भारतीय राजनीति में गब्बर, बीरू, जय, ठाकुर, सब साथ
Date : 13-Nov-2019

महाराष्ट्र में देश के एक सबसे पुराने चुनावी गठबंधन, भाजपा और शिवसेना के बीच रिश्ते टूट जाने के बाद अब एनसीपी और कांग्रेस पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वे इस राज्य में सरकार बनाने पर अपना क्या रूख रखते हैं, क्या करते हैं। केन्द्र सरकार ने बड़ी रफ्तार से फैसला लेकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया है, लेकिन शिवसेना के साथ अगर उसकी दो विरोधी पार्टियां सरकार के भीतर रहते हुए, या सरकार के बाहर रहते हुए अगली सरकार बनाने का रास्ता बनाती हैं, तो राष्ट्रपति शासन खत्म हो जाएगा, और राज्यपाल को चाहे-अनचाहे अगली सरकार को शपथ दिलानी पड़ेगी। लेकिन आज जितनी बड़ी दुविधा भाजपा से गठबंधन तोडऩे के बाद शिवसेना के सामने है, उससे अधिक बड़ी दुविधा एनसीपी के सामने है, और सबसे बड़ी दुविधा तो कांग्रेस के सामने है जिसके नीति-सिद्धांत शिवसेना के ठीक खिलाफ हैं। लेकिन पिछले कई बरसों से देश की राजनीति में जिस तरह फ्री स्टाईल गिरोहबंदी चल रही है, उसमें कुछ भी हैरान नहीं करेगा, और देश की तीन वंशवादी पार्टियां मिलकर देश के सबसे संपन्न प्रदेश में एक अनोखी सरकार बना सकती हैं। तीनों ही पार्टियां एक-एक परिवार पर टिकी हैं, एक-एक परिवार के काबू में हैं, और जैसा कि राजनीति के बारे में दुनिया भर में कहा और लिखा जाता है, राजनीति हैरतअंगेज हमबिस्तर पेश करती रहती है। हो सकता है कि महाराष्ट्र में बाघ गले में घड़ी बांधकर सिंहासन पर बैठे, और उसकी जंजीर एक हाथ में रहे। 

दरअसल भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति एक बाजार व्यवस्था की तरह हो गई है जिसमें डिमांड के आधार पर सप्लाई न करने वाले कारोबारी धंधे से बाहर हो जाते हैं। पिछले पांच बरस में भाजपा ने अनगिनत राज्यों में अनगिनत अनैतिक गठबंधन किए हैं, विधायकों के दलबदल न करवाकर, पूरे-पूरे दल को बदलकर रख दिया है, और ऐसी राजनीति के बीच में लोग या तो अपने नीति-सिद्धांत लेकर वामपंथियों के साथ बैठकर कॉफी और सिगरेट पियें, या फिर असल राजनीति को उसके मौजूदा तौर-तरीकों और बाजार के प्रतिद्वंद्वियों के तौर-तरीकों को देखते हुए लड़ें। कांग्रेस के सामने एक बड़ी दुविधा है, लेकिन हर बड़ी पार्टी ऐसी कई दुविधाओं से पार पाना धीरे-धीरे सीखने लगती हैं, और ऐसी मशक्कत करते हुए चमड़ी मोटी भी होने लगती है। हर अनैतिक समझौते के बाद पार्टी उस आत्मग्लानि से उबर जाती है, और उससे अधिक अनैतिक समझौता करने के लिए अपने आपको तैयार भी कर लेती है। भाजपा ने पूरे देश में कांग्रेस के लोगों को ला-लाकर, राज्यसभा, लोकसभा, और विधानसभा में भेज-भेजकर देश को कांग्रेसमुक्त करने का अभियान तो चलाया, लेकिन इस दौरान भाजपा इतनी अधिक कांग्रेसयुक्त हो गई है कि वह पहचाने पहचान नहीं आती। इसलिए अब भारतीय राजनीति में नैतिकता की दुहाई 18वीं सदी की लुगाई की तरह हो गई है, जो कि कोई हक नहीं रखती थी। 

कांग्रेस को आज की हकीकत को देखते हुए यह तय करना पड़ेगा कि वह चुनावी राजनीति के बाजार में जिंदा रहना चाहती है, या नीति-सिद्धांत पर टिके हुए घर बैठना चाहती है। यह फैसला आसान नहीं होगा, लेकिन आज हिन्दुस्तान की राजनीति में मोदी नाम की सुनामी आने के बाद बाकी लोगों के लिए कोई भी फैसला आसान नहीं है। और लोकतंत्र अच्छी और बुरी हर किस्म की संभावनाओं की पराकाष्ठा का नाम है, और जिस तरह फिल्म शोले की शूटिंग के दौरान की एक तस्वीर बीच-बीच में सामने आती है जिसमें गब्बर, बीरू, जय, और ठाकुर सभी एक साथ खड़े हॅंसते दिखते हैं, ठीक वैसा ही भारतीय राजनीति में चल रहा है। अगर कांग्रेस पार्टी ऐसे किसी गठबंधन में जुडऩा चाहती है, तो वह एक बात के लिए बेफिक्र हो सकती है कि उस पर पत्थर चलाने का नैतिक हक केवल वामपंथी ही रखेंगे, जो कि केरल में उसके लिए दिक्कत खड़ी कर सकते हैं, बाकी कोई भी पार्टी नैतिकता को रद्दी वाले को बेचने के बाद ही राजनीति में आई है, इसलिए कांग्रेस का यह कोई अनोखा गुनाह नहीं रहेगा। उसे बस यह सोचना होगा कि पांच बरस बाद अपने सबसे अधिक सांसदों वाले, और साफ-साफ वामपंथी रूझान वाले केरल में वह मतदाताओं को कौन सा हाथ दिखाएगी?
-सुनील कुमार

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