संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 नवंबर : कैशलेस को बढ़ावा रोककर खुफिया-सुरक्षातंत्र खड़ा करें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 15 नवंबर : कैशलेस को बढ़ावा रोककर खुफिया-सुरक्षातंत्र खड़ा करें
Date : 15-Nov-2019

दो-तीन अलग-अलग खबरें बहुत फिक्र खड़ी करती हैं। एक तो खबर बैंक की है कि किस तरह खाते की कुछ जानकारी पाकर ठगों ने किसी के एफडी की रकम भी निकाल ली। अभी तक फिक्स्ड डिपॉजिट के बारे में तो ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती थी कि उसे भी लूटा जा सकता है, लेकिन अब वह भी हो गया है। एक दूसरी खबर भारत सरकार से ही संबंधित है, कई ऐसी फर्जी वेबसाईटें चल रही हैं जो कि अपने आपको पासपोर्ट दफ्तर बताती हैं, और वहां फीस जमा करवाकर पासपोर्ट के लिए इंटरव्यू का समय भी दे देती हैं, जब लोग पहुंचते हैं तो पता लगता है कि उनका संपर्क किसी फर्जी वेबसाईट से हुआ था। खुद भारत सरकार ने ऐसी आधा दर्जन वेबसाईटों को बताया है कि लोग उनसे संपर्क न करें, वे फर्जी हैं। इसके साथ-साथ कई अलग-अलग खबरें हर कुछ हफ्तों में आती हैं जिनमें कहीं पर सरकारी नौकरी लगाने के नाम पर लोगों से कुछ रकम जमा करवाई जाती है, या दूसरे तरह की ऑनलाईन ठगी होती है। एक खबर में यह भी है कि बैंक खातों में इतनी बड़ी संख्या में ठगी इसलिए हो पा रही है कि ठग बड़ी आसानी से खाते खोल रहे हैं, ठगी की रकम उसमें जमा करके निकालकर गायब हो जाते हैं, और फिर उनका कोई सुराग नहीं लगता। 

देश में चल रही ऐसी तमाम बैंक और साइबर ठगी को देखें, तो लगता है कि सरकार का निगरानीतंत्र और सरकार का साइबर सुरक्षातंत्र ऐसे छेदों से भरा हुआ है जिनसे होकर ठग और जालसाज आसानी से आवाजाही करते रहते हैं, और जनता लुटती चली जा रही है। अब अगर लोगों के एफडी की रकम भी गायब हो जा रही है, तो ऐसे कितने लोग हैं जो कि रोज अपनी एफडी की रकम जांचते हों? बहुत से लोग तो हर महीने या हर साल एफडी का ब्याज निकलवाने से परे अपने इन खातों की कोई जानकारी नहीं लेते हैं। देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, का हाल यह है कि वह खाते में जमा या उसमें से रकम की निकासी का कोई एसएमएस भेजता है, और कोई एसएमएस नहीं भेजता। मतलब यह कि सबसे बड़े बैंक में भी हिफाजत का इंतजाम ऐसा कमजोर है। हमारे खुद के देखने में आया है कि एसबीआई से ऑनलाईन ट्रांसफर करते हुए फोन पर जो ओटीपी आता है, उसे डाले बिना ही कभी-कभी खाते से रकम चली जाती है। चूंकि यह हमारा खुद का देखा हुआ है, तो ऐसे भी बहुत से लोग होंगे जो उतनी बारीकी से अपने खाते पर नजर नहीं रखते होंगे या नहीं रख पाते होंगे, और जिन्हें बरसों तक रकम कम होने का पता भी नहीं चलता होगा। 

हम पहले भी इस जगह पर कई बार लिख चुके हैं कि भारत सरकार जिस आक्रामक अंदाज में डिजिटल बैंकिंग और भुगतान-ट्रांसफर को बढ़ावा दे रही है, उसके लायक सरकार और बैंकों का अपना हिफाजत-इंतजाम नहीं है। सरकार देश में कैशलेस इकॉनॉमी बढ़ाना चाहती है, लेकिन सबसे जानकार और संपन्न तबका पहले से उसका इस्तेमाल कर रहा है, अब धीरे-धीरे नीचे के लोग उसमें आते जा रहे हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम कम आयवर्ग की तरफ बढ़ते हैं वहां पर तकनीकी जानकारी घटती जाती है, लोगों को फोन या कम्प्यूटर, या बिना नगदी भुगतान के कई औजारों की जानकारी और समझ कम है। हालांकि अभी जो खबरें आती हैं, उनमें बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए सरकारी कर्मचारी भी ठगी और जालसाजी का शिकार हो रहे हैं, तो ऐसे में कम पढ़े-लिखे लोगों के तो भगवान ही मालिक होंगे। 

फिलहाल भारत सरकार, उसकी बैंकों, और उसके दूसरे संस्थानों को चाहिए कि देश में एक बहुत तगड़ा साइबर निगरानी और सुरक्षातंत्र विकसित करें, क्योंकि एक बार जनता या सरकार की रकम निकल गई, तो फिर उसके वापिस हाथ लगने की गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं रहती है। जैसे-जैसे बैंक खाते बढ़ रहे हैं, लोग मोबाइल बैंकिंग, या ऑनलाईन बैंकिंग की तरफ बढ़ रहे हैं, कार्ड से पेमेंट कर रहे हैं, वैसे-वैसे ठगों के पास उनके धंधे के लिए आबादी भी बढ़ रही है। सरकार को कैशलेस को बढ़ावा देना रोककर, खुफिया निगरानी, और सुरक्षा के इंतजाम विकसित करने चाहिए। इसके बिना लोगों का भरोसा भी कैशलेस पर से कम होता जाएगा, बैंकों पर से लोगों का भरोसा पहले ही घट चुका है, नोटों पर से भी लोगों का भरोसा कम हो गया है क्योंकि सारे बड़े दाम के नोट नकली आ चुके हैं, और किसी भी दिन सरकार बड़े नोटों को बंद कर देगी, ऐसा अंदेशा लोगों को है। देश के लोग वैसे भी बहुत बुरे हाल से गुजर रहे हैं, नौकरियां जा रही हैं, जिंदा रहने को कमाई कम पड़ रही है, और ऐसे में अगर उनके पास की थोड़ी-बहुत रकम कोई ठग लेते हैं, तो इस देश की जनता उसे बर्दाश्त करने की हालत में बिल्कुल नहीं है।
-सुनील कुमार

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