संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  20 नवंबर : आपसी लोगों द्वारा खुद किए और  करवाए कत्ल के पीछे की वजहें...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 20 नवंबर : आपसी लोगों द्वारा खुद किए और करवाए कत्ल के पीछे की वजहें...
Date : 20-Nov-2019

बीते एक दिन में ही अपने आसपास के दो-तीन अखबारों को देखने पर खबरें दिल दहलाने वाली है। एक मां ने सौतेले बेटे को मारने के लिए सुपारी दी, एक लाश मिलने के मामले की जांच में पता लगा कि पांच दोस्तों ने चाकू से हत्या की थी, एक युवती की हत्या में साथी युवक को उम्रकैद सुनाई गई, और एक फिल्म अभिनेत्री पर उसके ही प्रमोटर और साथियों ने हमला किया था, क्योंकि वह उससे एकतरफा प्रेम करता था, और अभिनेत्री उसे भाई मानती थी। 

यह फेहरिस्त बड़ी लंबी चली जाएगी अगर चार दिन के पन्ने पलटे जाएंगे, लेकिन उसके बिना भी यह बात साफ जाहिर है कि कत्ल के अधिकतर मामलों में परिवार के लोग, दोस्त, भागीदार, या प्रेमी-प्रेमिका शामिल मिल रहे हैं। ऐसे कितने ही मामले लगातार खबरों में आ रहे हैं जिसमें कोई पत्नी प्रेमिका के साथ मिलकर पति को मार रही है, या भाड़े के हत्यारों को ठेका दे रही है। अब न रिश्तों का कोई भरोसा रहा, न यारी-दोस्ती का, और न कारोबारी भागीदारी या पड़ोस के संबंधों का। निजी मामलों की वजह से होने वाले ऐसे कत्ल रोक पाना किसी भी पुलिस के लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि गले में हाथ डले हों, और जेब में छुरा हो, तो पुलिस क्या अंदाज लगा लेगी? फिर ऐसे हाल में लोगों की यह भयानक बेवकूफी भी है कि वे कत्ल करके बच जाएंगे। कत्ल की सजा तो सबको मालूम है, फांसी न भी हुई तो भी उम्रकैद तो तय है, फिर भी लोग अगर कत्ल कर और करवा रहे हैं, ठंडे दिल से साजिश करके करवा रहे हैं, तो परले दर्जे की ऐसी मूर्खता के चलते कत्ल रूकें तो कैसे रूकें? क्योंकि अखबारों में रोज जितनी खबरें कत्ल की छपती हैं, तकरीबन उतनी की उतनी खबरें कातिलों की गिरफ्तारी की भी छपती हैं, और थोड़ी-बहुत खबरें पांच-दस बरस बाद होने वाली सजा की भी छपती हैं, लेकिन इनसे सचेत होकर लोग कत्ल जैसे मामले में न फंसें, ऐसा पता नहीं कितने मामलों में होता है क्योंकि कत्ल तो बढ़ते ही चल रहे हैं। 

ऐसा लगता है कि समाज में सामाजिक, पारिवारिक, और भावनात्मक जिम्मेदारी घटती चल रही है, यह भी लगता है कि लोगों में अपने आपके कानून से बच निकलने की खुशफहमी भी बढ़ती चल रही है। यह भी लगता है कि बहुत से लोग तैश और आवेश में, नशे और नफरत में आपा खोकर कत्ल कर बैठते हैं, और हैरानी की बात यह है कि आसपास के कई करीबी लोग मिलकर भी कत्ल कर रहे हैं, जबकि उनमें से किसी एक की समझदारी को तो ऐसा जुर्म रोकना था। हो सकता है कि कई जुर्म रूकते भी हों, और न हो पाए जुर्म सामने तो आते नहीं हैं, न एफआईआर बनते हैं, न खबर बनते हैं, इसलिए पूरे के पूरे समाज की नासमझी मान लेना भी ठीक नहीं होगा, लेकिन बढ़ते हुए कत्ल बढ़ती हुई फिक्र का सामान जरूर हैं। 

चूंकि आपस के लोगों द्वारा किए और करवाए गए कत्ल पुलिस द्वारा रोक पाना मुमकिन नहीं हैं, इसलिए समाज में जब तक एक जागरूकता नहीं बढ़ेगी, लोगों के बीच रिश्तों को लेकर एक भड़काऊ भावना नहीं घटेगी, जब तक एकतरफा प्रेम अपने को पूरा हकदार मान लेने की खुशफहमी नहीं छोड़ेगा, जब तक लोग जीवन-साथी या प्रेम-संबंध में सौ फीसदी वफादारी को अनिवार्य समझ लेने की खुशफहमी नहीं छोड़ेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे, ऐसे कत्ल होते रहेंगे। लेकिन ऐसे मामलों में महज कातिलों को पकड़ लेना काफी नहीं हो सकता, किसी भी सभ्य और जिम्मेदार समाज में अपराधों को घटाते चलना, जिम्मेदारी की भावना को बढ़ाते चलना भी जरूरी है। इसलिए भारतीय समाज में लोगों की सामाजिक चेतना, और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बढ़ाना ही होगा। ये दोनों ही बातें बड़ी ही अमूर्त बातें हैं, और यह समझना आसान नहीं है कि यह कैसे होगा, लेकिन यह जरूरी इसलिए भी है कि समाज में नए-नए किस्म के खतरे बढ़ते चल रहे हैं, और ऐसे में हर किस्म के खतरों को घटाना भी जरूरी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के दो ऐसे वीडियो अभी हवा में तैर रहे हैं जिनमें एक सूने स्कूली क्लासरूम में यूनीफॉर्म पहनी हुई बच्चियां शराब की बोतल से ग्लास में शराब निकालकर पी रही हैं, और एक दूसरे वीडियो में दस बरस का दिखता एक बच्चा बुरी तरह शराब के नशे में बकवास करते हुए दिख रहा है। लेकिन इन वीडियो से परे भी देश के हर शहर में हजारों ऐसे बेघर और फुटपाथी बच्चे हैं जो कि तरह-तरह के रासायनिक नशे कर रहे हैं, और उनमें से कम से कम कुछ बच्चे तो तरह-तरह के जुर्म में शामिल भी रहते हैं। सरकारों की कोई योजना इन बच्चों को नशे से बचाने, बसाने, और उनकी जिंदगी संवारने के लिए दिखती नहीं हैं। इन दिनों लगातार ऐसे अपराध भी बढ़ते चल रहे हैं जिनमें बच्चों के सुधारगृह में रखे गए बच्चे जुर्म में शामिल हैं, और हिंसा करके सुधारगृह से फरार हो रहे हैं। कुल मिलाकर बड़ों के किए जुर्म, और बच्चों के किए जुर्म सबको देखें, तो लगता है कि समाज में जागरूकता की एक बड़ी जरूरत है, और आम लोगों में ऐसी जरूरत के पहले उन लोगों में जागरूकता की जरूरत है जो कि सरकार में हैं, संसद में हैं, विधानसभाओं में हैं, और देश के लोगों में लगातार तरह-तरह की गैरजिम्मेदारी को बढ़ा रहे हैं। राजनीतिक और साम्प्रदायिक वजहों से देश के लोगों को जब किसी एक मोर्चे पर गैरजिम्मेदार बनाया जाता है, तो देश की बाकी आबादी भी कई मोर्चों पर साथ-साथ गैरजिम्मेदार होते चलती है। इन बातों का आपस में रिश्ता सतह पर तैरता हुआ दिखता तो नहीं है, लेकिन सतह के नीचे ये मजबूत जड़ों से जुड़े हुए जुर्म हैं जो कि समाज में बढ़ती हुई, बढ़ी हुई गैरजिम्मेदारी का सुबूत हैं। 
-सुनील कुमार

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