संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 नवंबर : पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना बाकी है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 नवंबर : पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना बाकी है
Date : 21-Nov-2019

पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना बाकी है

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एक मुस्लिम प्राध्यापक के विरोध का ऐसा घटिया आंदोलन सामने आ रहा है कि हिन्दूवादी हमलावर छात्रों ने विश्वविद्यालय के इस चयन पर सवाल उठाया है कि कोई मुस्लिम संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? दूसरी तरफ विश्वविद्यालय का कहना है कि उन्होंने प्राध्यापक चयन के सारे पैमाने तय करके सबसे अच्छे उम्मीदवार को चुना है जो कि संस्कृत का विद्वान है। एक मुस्लिम से संस्कृत पढऩे पर जिनके नाजुक हिन्दुत्व पर बड़ी आंच आ रही है, वे लोग विश्वविद्यालय कैम्पस में ढोलक लेकर धार्मिक प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी तरफ उत्साही मीडिया की मेहरबानी से यह बात सामने आ रही है कि राजस्थान का यह मुस्लिम नौजवान किस तरह बचपन से ही संस्कृत पढ़ते आ रहा है, किस तरह उसका परिवार कृष्ण का भक्त रहा है, पिता जगह-जगह घूमकर कृष्ण के भजन-कीर्तन करते रहे हैं, और इसके बाद भी मुस्लिम होने की वजह से इस नौजवान का संस्कृत पढ़ाने से रोका जा रहा है। हमारा तो यह मानना है कि अगर इसका परिवार कृष्ण भक्त न भी होता, तो भी क्या उसका किसी भाषा को बढ़ाने का हक कुछ कम हो सकता है?

यह देश ऐसी गौरवशाली परंपराओं वाला देश रहा है कि यहां पर योरप से आकर बसे हुए फॉदर कामिल बुल्के न केवल हिन्दी भाषा के प्रकांड विद्वान थे, बल्कि वे रामचरित मानस पर भी एक बहुत बड़े विद्वान माने जाते थे। और वे हिन्दुस्तान में एक ईसाई मिशनरी की तरह बेल्जियम से आए थे, और महान हिन्दी प्रेमी हो गए थे। वे आजादी के वक्त रांची विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाते थे, हिन्दी साहित्य में उनकी पीएचडी थी जो कि रामकथा का विकास विषय पर की गई थी। आज अगर कामिल बुल्के इस देश में होते, तो राम का नाम लेने वाले ईसाई होने के नाते हो सकता है उन्हें रांची में भीड़त्या का शिकार होना पड़ता। यह कैसा हिन्दुस्तान हो गया है कि किसी धर्म के व्यक्ति को दूसरे धर्म की बपौती मानी जाने वाली भाषा को पढ़ाने से रोका जा रहा है। अमरीका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय दर्शन पढ़ाने वाली एक प्राध्यापक लिंडा हेस चौथाई सदी से अधिक वक्त से हिन्दुस्तान आकर कबीर का अध्ययन करती आई हैं, और वे महादेवी वर्मा से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी तक से मिलती रही हैं, बनारस के कबीर चौरा से लेकर छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा तक कबीर का अध्ययन करती रही हैं, और इन दिनों वे मध्यप्रदेश के कबीर गायक प्रहलाद टिपणिया को लेकर अमरीका में जगह-जगह कबीर गायन का आयोजन कर रही हैं। ऐसी विदुषी महिला और ऐसी महान कबीर भक्त को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ये साम्प्रदायिक छात्र वहां पढ़ाने न दें कि एक ईसाई किस तरह कबीर को पढ़ा सकती है।

और दिलचस्प बात यह है कि संस्कृत का विद्वान यह मुस्लिम नौजवान धर्म भी नहीं पढ़ाने वाला था, वह महज एक भाषा पढ़ाने वाला था, और मानो संस्कृत भाषा ने जनेऊ पहनकर हिन्दू धर्म की दीक्षा ले ली है, हिन्दू छात्रों ने इस व्याख्याता की नियुक्ति का उग्र विरोध किया। यह पूरा सिलसिला सिर्फ नफरत से उपजा हुआ है, नफरत पर फलाफूला है, और अब उसके नुकसान दे रहा है, किसी भी धर्म या भाषा के लिए यह गौरव की बात होनी चाहिए कि दूसरे धर्म के लोग, या दूसरी भाषा के लोग भी उनमें दिलचस्पी लेते हैं। सिर्फ परले दर्जे के मूर्ख ही ऐसी बात पर विरोध कर सकते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की हालत आज इस कदर खराब हो चुकी है कि पूरे देश में धार्मिक सद्भाव को बढ़ाने वाले जेएनयू को देश का गद्दार करार दिया जा रहा है, और जो बीएचयू के छात्र इस तरह की साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे हैं उन्हें देशभक्त करार दिया जा रहा है। नेहरू के हिन्दुस्तान की धार्मिक सद्भाव की सोच, जनता के कम से कम एक तबके की वैज्ञानिक सोच, यह सब इस कदर तबाह कर दी गई है कि आज बीएचयू जैसे ऐतिहासिक विश्वविद्यालय की यह घोर साम्प्रदायिक घटना भी राज्य या केन्द्र सरकार का मुंह नहीं खुलवा पा रही है। पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना अभी बाकी है।


-सुनील कुमार

 

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