संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 नवंबर : पंच-सरपंचों की अनिवार्य शिक्षा खत्म करना, शहरी और शिक्षित अहंकार का खात्मा भी है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 24 नवंबर : पंच-सरपंचों की अनिवार्य शिक्षा खत्म करना, शहरी और शिक्षित अहंकार का खात्मा भी है...
Date : 24-Nov-2019

छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने कल यह तय किया कि पंचायत चुनावों में पंच बनने के लिए पांचवीं और उससे ऊपर के पद के लिए आठवीं पास होने की जो अनिवार्यता चली आ रही थी, उसे खत्म किया जाए। यह बंदिश पिछली भाजपा सरकार ने अपने एक कार्यकाल में लगाई थी, जो कल छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने हटा दी। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से इस बात के लिए लिखते आ रहे थे, और अपने तर्क के समर्थन में हमने मिसालें भी गिनाई थीं कि किस तरह तमिलनाडू के एक सबसे महत्वपूर्ण कामराज नाडर बचपन में पिता के गुजर जाने के बाद मां का साथ देने के लिए 11 बरस की उम्र में ही स्कूल छोड़ चुके थे। छत्तीसगढ़ सरकार के अब तक के पैमाने के मुताबिक वे यहां सरपंच भी नहीं बन सकते थे लेकिन तमिलनाडू में उन्होंने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को ग्यारहवीं तक लागू करके साक्षरता और शिक्षा को बढ़ाने का महान काम किया था, और गरीब स्कूली बच्चों के लिए दोपहर के भोजन की योजना लागू की थी। उन्होंने यह सब काम 1954 से 1963 के बीच किया था जब देश में साक्षरता और शिक्षा इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं थीं। इस छत्तीसगढ़ राज्य में पहली कांग्रेस सरकार में गृहमंत्री रहे नंदकुमार पटेल राज्य बनने के पहले से अविभाजित मध्यप्रदेश की दिग्विजय सरकार में भी मंत्री थे, और वे अपने पूरे कार्यकाल में सबसे अच्छे और काबिल मंत्रियों में से एक थे, और अभी उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वे आठवीं भी पास नहीं थे, और जब उन्होंने अर्जुन सिंह के लिए खरसिया विधानसभा सीट खाली की थी, तब वे वहां के सरपंच ही थे। अभी कल तक लागू नियम उनके वक्त भी लागू रहता, तो शायद वे सरपंच का चुनाव भी नहीं लड़ पाते, और राज्य को एक काबिल मंत्री मिलने की संभावना भी शुरू ही नहीं हो पाती। 

दरअसल राज्य के लिए कानून बनाने की विधानसभा की ताकत, और देश के लिए कानून बनाने की संसद की ताकत ने कई किस्म की तानाशाही भी दिखाई है। जब इस देश में पंचायत के स्तर पर, पंचायत के भीतर के पंच के लिए भी अनुसूचित जाति, जनजाति, और ओबीसी की महिलाओं तक का आरक्षण लागू है, शहर के मेयर के लिए, या किसी वार्ड मेम्बर के लिए भी इनमें से हर तबके की महिला के लिए आरक्षण लागू है, तब विधानसभा सीट और लोकसभा सीट के लिए आरक्षण लागू नहीं है। महिला आरक्षण का मुद्दा जाने अनंतकाल से संसद में चले आ रहा है, और तमाम पार्टियां उससे मुंह चुराते आ रही हैं। ऐसे में इन सांसदों और विधायकों ने अपने सदनों से वार्ड स्तर तक तो अलग-अलग जातियों की और तबकों की महिलाओं के लिए भी आरक्षण कर दिया, लेकिन अपने सदनों को इससे इंस अंदाज में परे रखा है कि मानो इनमें महिलाएं बढ़ जाने पर ये सदन उसी तरह अपवित्र हो जाएंगे जिस तरह कुछ ईश्वरों के घर हो जाते हैं। 

इससे परे एक और शहरी, शिक्षित, और बाहुबलि अहंकार पंचायत चुनावों पर लादी गई थी कि दो से अधिक बच्चे होने पर निर्वाचित पंच-सरपंच की पात्रता भी खत्म हो जाएगी, छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से मामले हुए भी थे, और एक सामाजिक तनाव ऐसा भी खड़ा हो गया था कि दो से अधिक बच्चे होने पर पंच-सरपंच परिवार उन्हें छुपाने भी लगे थे। लेकिन 9 बच्चों के साथ लालू यादव सांसद बने हुए थे, और इतने ही बच्चों के साथ देश भर में बहुत से दूसरे सांसद और विधायक थे, लेकिन छत्तीसगढ़ में पंच-सरपंच पर दो बच्चों की शर्त थोप दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में बनाई गई त्रिस्तरीय शासन प्रणाली में स्थानीय संस्थाओं में पंचायतों और म्युनिसिपलों को तो एक साथ रखा गया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह शर्त सिर्फ पंच-सरपंचों पर लगी थी, शहरी वार्ड मेम्बरों और मेयरों पर नहीं। बाद में इस राज्य में पिछली भाजपा सरकार ने इस रोक को खत्म किया था, और सत्ता के इस लादे गए शहरी पूर्वाग्रह के खिलाफ हम लंबे समय से यह मांग कर रहे थे जो शर्तें सांसद और विधायकों पर नहीं लादी गई हैं, वे पंच-सरपंच पर भी नहीं लादी जानी चाहिए। और दिलचस्प बात यह है कि पंच-सरपंच के लिए जिस महिला आरक्षण की व्यवस्था की गई, उस व्यवस्था को संसद और विधानसभाओं में भी लागू करने में पुरूष प्रधान संसदीय राजनीति ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय पंचायतों में महिला आरक्षण जब लागू किया गया, तो देश के सर्वाधिक राजनीतिक चेतना वाले केरल जैसे राज्यों के पंचायत मंत्री और सचिव इन प्रावधानों के अध्ययन के लिए राजधानी भोपाल पहुंचे थे। 

कल भूपेश मंत्रिमंडल ने शिक्षा की यह पूरी तरह से अनैतिक अनिवार्यता खत्म करके एक अच्छा काम किया है। जो अनिवार्यता विधायक और सांसद बनने के लिए भी नहीं है, उसे गांव के लोगों पर लादना एक शहरी अहंकार है, और इसे खत्म किया ही जाना चाहिए था। छत्तीसगढ़ को एक और काम करना चाहिए कि विधानसभा में संसद-विधानसभा के महिला आरक्षण के लिए एक शासकीय संकल्प लाया जाए कि संसद जल्द से जल्द महिला आरक्षण विधेयक को पास करे और लागू करे। इस बात का और कोई महत्व हो या न हो, कम से कम एक प्रतीकात्मक महत्व रहेगा और महिला आरक्षण का इतिहास इसे दर्ज करेगा। यह विधेयक संसद में 2008 से चले आ रहा है जो कि महिलाओं को आबादी के अनुपात में आधी सीटों पर आरक्षण भी नहीं देने वाला है, महज एक तिहाई सीटों पर आरक्षण देगा, लेकिन इसे भी लोकसभा आज तक पास नहीं कर रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा को एक पहल करके यह प्रतीकात्मक संदेश बाकी देश को देना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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