संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  4 दिसंबर : सुरक्षा बलों के तनाव में  हत्या-आत्महत्या घटाने की गंभीर कोशिश की जाए
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 दिसंबर : सुरक्षा बलों के तनाव में हत्या-आत्महत्या घटाने की गंभीर कोशिश की जाए
Date : 04-Dec-2019

बस्तर के नक्सल मोर्चे पर तैनात आईटीबीपी के एक कैम्प में एक जवान ने पांच साथियों की गोली मारकर हत्या कर दी, और खुदकुशी कर ली। उसके बारे में पहली खबर में कहा जा रहा है कि वह छुट्टी न मिलने से तनाव में चल रहा था। आगे जाकर हो सकता है कि कोई और वजह सामने आए, लेकिन छुट्टी न मिलने से हत्या की पहले भी बहुत सी वारदातें ऐसे सशस्त्र सुरक्षा बलों में होते आई हैं जो मुश्किल और विपरीत परिस्थितियों में लंबे समय तक तैनात रहते हैं। और जिन्हें वक्त जरूरत पर घर जाने नहीं मिलता। यह वजह ऐसी हिंसा और आत्महत्या के अनगिनत मामलों के पीछे रही हैं, और कई स्तरों पर इस पर विचार-विमर्श होते भी आया है। 

बस्तर जैसे स्थायी हिंसा, तनाव, और खतरे के हथियारबंद मोर्चे पर तैनात लोग वैसे भी तनाव में रहते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे देश में घर के एक प्रमुख पुरूष सदस्य के बाहर रहने पर दूर बसे उसके परिवार को बहुत किस्म की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। भारत के तकरीबन सभी प्रदेशों में सरकारी कामकाज का हाल इतना खराब है कि जिस परिवार को सरकारी कामकाज का चक्कर पड़ता है, उसका एक सदस्य इसी काम में लग जाता है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले बस्तर के नक्सल मोर्चे पर ही तैनात सीआरपीएफ के एक जवान का ऐसा वीडियो सामने आया था जिसने उत्तरप्रदेश में अपने परिवार के जमीन के एक मामले का जिक्र किया था कि अगर उसे सुलझाने में कानूनी मदद नहीं मिली तो वह नौकरी छोड़कर हथियार लेकर उतर जाएगा। इस वीडियो के खबरों में आने के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तरप्रदेश सरकार से संपर्क करके इस समस्या को सुलझाने के निर्देश दिए थे। आज हिन्दुस्तान में जगह-जगह से ऐसी खबरें आती हैं कि छुट्टी पर लौटे किसी फौजी से सरकारी दफ्तरों में कैसी बदसलूकी की गई, या रिश्वत मांगी गई, या उसे सार्वजनिक जगह पर पुलिस ने किस तरह पीटा। जब परिवार से लंबे समय तक लोग दूर रहते हैं, तो उनके मन में ऐसी कई आशंकाएं भी घर कर जाती हैं, और उन्हें छुट्टी पाने की बेसब्री भी होती है। 

सुरक्षा बलों की दूर-दूर तक खतरे में लंबे वक्त तक की तैनाती उन्हें कई किस्म की मनोवैज्ञानिक दिक्कतों में भी उलझाती है, और यह बात भी ऐसी वारदातों के बाद कई बार सामने आई है। बहुत से ऐसे मामले हुए जिनमें जूनियर सुरक्षाकर्मी ने छुट्टी न मिलने पर अपने अफसर को गोली मार दी। लगातार हथियारों के साथ जीने, लगातार हथियारबंद, और विस्फोटकों के, खतरों के बीच जीने से भी सुरक्षा कर्मचारियों की सोच में एक अनचाही हिंसा आ जाती है, और उन्हें बहुत सी दिक्कतों का इलाज बंदूक की नली से निकलने वाला दिखने लगता है। फौज के सैनिक हों, या पैरामिलिट्री के सिपाही हों, ये जब समूह में कहीं सफर करते हैं, या एक साथ किसी हाट-बाजार जाते हैं, तो उस वक्त भी इनकी हिंसा की कई खबरें आती हैं। ऐसी तमाम बातों को देखें तो लगता है कि सुरक्षा कर्मचारियों को एक बड़े मानसिक परामर्श की सहूलियत हासिल होनी चाहिए, जो कि आज शायद नहीं है, या नहीं सरीखी है। यह बात बहुत बार उठती है कि परिवार से दूर रहने की वजह से तनाव, लगातार हथियारबंद संघर्ष की वजह से तनाव, परिवार की स्थानीय सरकारी-कानूनी दिक्कतों की वजह से तनाव को दूर करने के इंतजाम करने चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, पूरे देश में मनोचिकित्सक या मानसिक परामर्शदाता गिनती के हैं, और वे लाखों की आबादी पर एक उपलब्ध हैं। ऐसे में अधिक तनाव में जीते हुए सुरक्षा कर्मचारियों के लिए बेहतर सुविधा रहनी चाहिए, परामर्श की भी, और जीने-कमाने-खाने की भी। एक ऐसा इंतजाम भी रहना चाहिए कि सरकार की योजना की वजह से जिन लोगों को लगभग स्थाई रूप से परिवार से दूर रहना पड़ता है, उनके परिवार की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए ऐसे सुरक्षा बल कोई स्थानीय इंतजाम भी करें। भारत में पुलिस को ही बहुत बुरी नौबत में काम करना पड़ता है, और उनको हर हफ्ते की छुट्टी भी नहीं मिल पाती है। ऐसे में बाकी सुरक्षा बलों के कर्मचारियों की जरूरतों को समझने और उनकी दिक्कतों को सुलझाने की एक गंभीर कोशिश तुरंत होनी चाहिए क्योंकि जिंदगियां इतनी सस्ती नहीं हैं कि उन्हें काम की स्थितियों के तनाव में गंवाया जा सके।
-सुनील कुमार

Related Post

Comments