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बाबा नागार्जुन के यौन शोषण का शिकार  हुईं गुनगुन की पोस्ट से खलबली
बाबा नागार्जुन के यौन शोषण का शिकार हुईं गुनगुन की पोस्ट से खलबली
Date : 14-Jan-2020

सोशल मीडिया पर गुनगुन थानवी की बाबा नागार्जुन के नाग रूप वाली पोस्ट ने साहित्यकारों के खेमें में हलचल मचा रखी है। 7 वर्ष की उम्र में कवि बाबा नागार्जुन के यौन शोषण का शिकार हुईं गुनगुन थानवी अब 35 वर्ष की हैं। बाबा नागार्जुन को बेनकाब करती फेसबुक पर लिखी-वायरल हुई पोस्ट में उन्होंने लिखा है-

कुछ रोज पहले की बात है एक दोस्त को मैं नेरूदा की कविता सुना रही थी। कविता के जवाब में दोस्त भी कविता सुनाने लगा। उसने सुंदर सी कविता पढ़ी। वो कविता पिता के मन में बसी ममता को दर्शाती थी। सरल और सहज थी। ख़त्म होते ही मेरा दोस्त बोला- कविता नागार्जुन की है। नागार्जुन का नाम सुनकर मैं फिर से डर गई थी। जहां बैठी थी वहीं बैठे रह गई।

कितनी बार नागार्जुन कभी उनका जन्मदिन, मरण दिन, नए साल पर, कभी चर्चाओं में कभी किताबों में और हां फ़ेसबुक पर तो रोज ही चले आते हैं। हमारे देश के नागार्जुन बाबा  जब भी मैं ये नाम सुनती हूं तो मेरी सारी इंद्रियां जैसे सुप्त अवस्था में चली जाती हैं। मेरे भीतर सिर्फ क्रोध रह जाता है।

लोग कहते हैं कि बच्चों के साथ दुष्कर्म करने वाले लोग बीमार होते हैं मानसिक रूप से। सवाल आज ये हैं क्या हमारे देश के इतने बड़े कवि नागार्जुन भी बीमार थे? मुझे नहीं लगता कि वो बीमार थे। मेरी समझ से अगर कोई पूछे तो वो तो बहुत शातिर थे ना।

बाबा को मेरे पापा घर ले आए थे। पापा उन्हें बहुत प्यार और सम्मान देते और मेरी मम्मी उनके नकली अनुशासन का पूरी गंभीरता से पालन करती रहीं। इस व्यक्ति ने हमारे घर में कफ्र्यू लगा दिया था। गलती मेरे मां-पापा की। जो ऐसे मुफ़्तख़ोर को अपने घर में रखकर उसकी सेवा करते रहे। वो बड़े आदमी थे, पर क्या इंसान बड़ा आदमी ऐसे ही बनता है?  रेप करने वाले लोग तो शायद बहुत मामूली होते हैं और देखिए बड़े लोग आप ही के घर में घुसकर आप ही का खाकर आप ही पर रौब जमाकर आप ही की बेटियों को खा जाते हैं।

मैं पैतीस की हो गई हूं। वो जब हमारे घर आए तब शायद सात साल की थी। पर आज भी मैं अच्छे से वर्णन कर सकती हूँ उस घटना का। मुझे उस दिन और उन क्षणों का भय याद है और ये भी बहुत अच्छे से याद है किस सौम्य भाव से से बाबा अपना काम कर रहे थे। चेहरे पर एक तटस्थ भाव लिए हुए।  बलात्कार दुष्कर्म तो हमारे देश में आम बात है। जिन्होंने निर्भया को मार डाला या हैदराबाद की वेटनरी डॉक्टर को जला डाला। क्या वो सब नागार्जुन थे। शायद वो अनपढ़ और अशिक्षित थे ना?

पर नागार्जुन आप सबके प्रिय बाबा तो बहुत बड़े आदमी थे। देश के इतने बड़े कवि भी इस तरीक़े से गर्त में गिर सकते हैं। एक ऐसा व्यक्ति है जिसके साथ जुडऩे के लिए शायद भारत देश की कई महिलाएं सहर्ष राजी होती जाती। महिलाओं के साथ उनके संबंध कैसे थे मुझे नहीं मालूम। मैं जानना भी नहीं चाहती।  परंतु वो मेरे साथ क्या कर रहे थे? 7 साल की बच्ची के साथ? बहुत बड़े आदमी थे। शायद इंसान ऐसे ही बनता है बड़ा वरना मामूली लोग रेप करते हैं पकड़े जाते हैं, मार दिए जाते हैं और बड़े लोग आपके ही घर में घुसकर आप की ही रोटियां खाकर आपकी ही बेटियों को खा जाते हैं।

रमेश थानवी और उर्मिला दोनों ने भरोसा किया था और ये बड़ा आदमी उन्हीं की बच्ची को जि़ंदगी भर का डर भेंट में देकर चला गया। डर मेरे जीवन का एक बड़ा भाव है।  न जाने में किन-किन चीज़ों से डरती हूं, ना जाने कौन-कौन लोग मुझे डरा जाते हैं। शायद कोई सुनना पसंद नहीं करेगा और न ही कोई पूछना पसंद करेगा कि ये डर कैसा है। मैं रोज़ इस डर से झगड़ती हूँ ,कब-कब और कैसे-कैसे बेवजह डर जाती हूँ इसका मेरे पास हिसाब भी नहीं।

डर के चलते मैंने कितने पुरुषों के साथ रिश्ते खऱाब किए हैं इसकी गिनती भी नहीं। भीतर जो काला धुआं पसरा रहता है वो बाहर का बहुत कुछ निगल जाता है। जिससे प्रेम करने लगती हूं उसे कह सकूं ये संभव ही नहीं। इतना पररखती रहती हूं पुरुषों को न जाने कितने लोगों का धैर्य का बांध टूट चुका है। भरोसा किसी पुरुष पर आज भी भी शायद ही करती हूं।  कोई भी एक सीमा को लांघ कर भीतर के प्रवेश द्वार तक नहीं पहुंच पाया। महिला मित्र ज़रूर एक स्पेशल ह्यह्लड्डह्लह्वह्य लिए हैं मेरे जीवन में। मुझे बड़ा नहीं बनना और हर बड़े से मुझे बू आती है।

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