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दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 जनवरी :  बाबा नागार्जुन पर लगी एक बड़ी तोहमत से उठे सवाल
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 जनवरी : बाबा नागार्जुन पर लगी एक बड़ी तोहमत से उठे सवाल
Date : 14-Jan-2020

सोशल मीडिया इन दिनों हिंदी के एक प्रमुख बुजुर्ग कवि बाबा नागार्जुन पर लगे एक ताजा आरोप से खौल रहा है। गुनगुन थानवी नाम की लेखिका ने अपना हादसा बयां किया है कि किस तरह जब वे सात बरस की थीं, और बाबा नागार्जुन उनके परिवार में एक मेहमान बनकर ठहरे थे, तो उन्होंने उनका यौन शोषण किया था। इस बात से लोग हक्का-बक्का हैं क्योंकि आपातकाल से लेकर उसके बाद के लंबे दौर तक नागार्जुन की जनता की जुबान में लिखी गईं कई कविताएं बड़ी इज्जत के साथ जनसंघर्ष का प्रतीक बनी हुई हैं, और नागार्जुन के व्यक्तित्व को हिंदी साहित्य में बड़े सम्मान से देखा जाता है। फेसबुक पर गुनगुन की पोस्ट के बाद बहुत से लोगों ने यह सोच भी सामने रखी है कि नागार्जुन जैसे महान लेखक ऐसा नहीं कर सकते, और ऐसी सोच को दूसरे लोगों ने झिड़की भी दी है कि किसी का बड़ा लेखक होना या महान होना उन्हें बलात्कारी होने से नहीं रोकता। कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि इतने वक्त के बाद ऐसा विवाद नहीं छेड़ा जाना चाहिए। 

लेकिन कुछ बरस पहले लोगों की प्रतिक्रिया इस पर यह आवाज उठाने वाली महिला के और खिलाफ रही होती, इन दिनों देश के बदले हुए माहौल में लोगों का कुछ बर्दाश्त भी दिखाई पड़ रहा है। अब लोग किसी लड़की या महिला की लगाई हुई तोहमत को एकदम से खारिज नहीं कर रहे हैं, और लोग यह मानते हैं कि एमजे अकबर या बाबा नागार्जुन जैसे लोग भी मातहत लोगों का, या आसपास के लोगों का यौन शोषण कर सकते हैं। अब देश और दुनिया की हवा कुछ बदली हुई है और लोग किसी लड़की या महिला को चुप रहने की नसीहत देने के बजाय उसकी उठाई आवाज को सुनते भी हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ दशक पहले जब पंजाब की एक महिला आईएएस ने वहां के सुपर कॉप कहे जाने वाले डीजीपी केपीएस गिल के खिलाफ देह शोषण का आरोप लगाया था, तो कुछ प्रमुख महिला पत्रकारों ने भी उसके खिलाफ लिखा था कि इस महिला को यह आरोप लगाने के पहले याद रखना था कि केपीएस गिल ने पंजाब में आतंक खत्म करने में कितना योगदान दिया था, और उसे याद रखते हुए उन्हें यह शिकायत नहीं करनी थी। आखिरी में अदालत से रिटायर्ड और बुजुर्ग गिल को इस मामले में सजा भी हुई थी।

दरअसल ऐसे मामलों में शिकायतों से किसी एक को सजा दिलवाने के बजाय एक दूसरा योगदान अधिक बड़ा होता है। जब अकबर के खिलाफ बात उठती है, तो नामीगिरामी मुखिया के ओहदों पर बैठे दूसरे लोगों को भी लगता है कि वे मातहत लोगों का देह शोषण नहीं कर सकते क्योंकि किसी दिन उनके खिलाफ भी मामला हो सकता है। यह चेतावनी किसी एक को मिली सजा के मुकाबले एक अधिक बड़ी बात रहती है, और गुनगुन थानवी का उठाया गया यह मामला इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण है कि परिवार में मेहमान बनकर ठहरे हुए लोग इस तरह घर के बच्चों का शोषण करने से पहले सौ बार सोचें। हम इस एक मामले को ऐसी शिकायतों के बाकी आम मामलों से अलग देखना नहीं चाहते, और जिन पर तोहमतें लगी हैं, वे बड़े हों या छोटे, चर्चित हों, या ताकतवर, उन्हें एक सरीखा इंसाफ मिलना चाहिए।
-सुनील कुमार

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