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केजरीवाल क्या मोदी का विकल्प नहीं, उन जैसे ही हैं?
केजरीवाल क्या मोदी का विकल्प नहीं, उन जैसे ही हैं?
Date : 13-Feb-2020

केजरीवाल क्या मोदी का विकल्प नहीं, उन जैसे ही हैं?
रजनीश कुमार

अंग्रेजी के पैट्रीअटिज़्म शब्द को हिन्दी में देशभक्ति कहा जाता है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार किसी एक देश से प्रेम, उसके हित और रक्षा को देशभक्ति कहा गया है। लेकिन उसी डिक्शनरी में ब्रिटिश लेखक सैमुअल जॉनसन का एक कोट (उद्धरण) भी है। डॉ जॉनसन देशभक्त को अराजक और बलवाई कहते थे। वो कहते थे कि देशभक्ति लंपटों की आखऱिी शरणस्थली होती है।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को राष्ट्रवाद के मसले पर घेरा तो उन्होंने खुद को कट्टर देशभक्त बताया। उन्होंने कई बार कहा कि बीजेपी उन्हें आतंकवादी कह रही है लेकिन वो कट्टर देशभक्त हैं। 11 फऱवरी को चुनावी नतीजे आए और आम आदमी पार्टी को जबरदस्त जीत मिली तो पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने पार्टी दफ्तर से अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अरविंद केजरीवाल को कट्टर देशभक्त बताया।
यह वैसा ही है जैसे कोई आशिक़ घोषणा करे कि वो कट्टर आशिक़ है लेकिन क्या आशिक़ी और कट्टरता एक साथ रह सकती है? बीएचयू के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर आशीष त्रिपाठी कहते हैं, प्रेम करने वाला कट्टर नहीं हो सकता। वो चाहे देश से प्रेम करे या अपनी प्रेमिका से। या तो वो कट्टर होगा या प्रेमी। कट्टरता में हिंसा, प्रतिशोध और संकीर्णता की प्रधानता होती है बल्कि इसमें स्वयंभू बनने की भी मंशा होती है।
नेहरू और गांधी की देशभक्ति और संघ के प्रमुख रहे गोलवलकर की देशभक्ति में फर्क था। गोलवलकर के राष्ट्रवाद को उनकी किताब बंच ऑफ थॉट्स में पढ़ें तो काफ़ी कुछ समझ में आता है। गोलवलकर की देशभक्ति में हिंदू तौर-तरीकों को लेकर श्रेष्ठता का भाव है। दूसरी तरफ गांधी और नेहरू की देशभक्ति में विविधता और खुलापन है। संकीर्णता नहीं है। केजरीवाल ख़ुद को कट्टर देशभक्त कहते हैं तो उनकी कट्टरता गांधी और नेहरू की देशभक्ति की लाइन से बिल्कुल अलग हो जाती है।
बीएचयू में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर आरपी पाठक कहते हैं कि इतालवी तानाशाह बेनितो मुसोलिनी भी खुद को कट्टर देशभक्त कहता था। प्रोफेसर पाठक कहते हैं, एक कट्टर देशभक्त और एक कट्टर हिन्दू में कोई फर्क नहीं है क्योंकि एक कट्टर देशभक्त एक कट्टर हिन्दू भी हो सकता है। एक कट्टर ब्राह्मण भी हो सकता है। यह कट्टरता रुकती नहीं है।
संकीर्णता, श्रेष्ठता का बोध और उसकी वजह से दूसरों को हेय और घृणास्पद समझना एक सहज मानसिक प्रक्रिया है। मसलन, कोई हिन्दी भाषी कहे कि वो कट्टर देशभक्त है तो ज़ाहिर है उसकी देशभक्ति में हिन्दी भाषा को लेकर भी कट्टरता होगी। वो हिन्दी भाषा के सामने तमिल, तेलुगू और मलयाली को कमतर आँकेगा। वो अपने खानपान और पहनावे को अपनी पहचान से जोड़कर देखेगा, और जो उसकी तरह नहीं खाते-पहनते-बोलते उन्हें वह दूसरा या पराया मानेगा। लेकिन आजादी की लड़ाई के समय अपने चरम पर पहुँची भारत की देशभक्ति की भावना इन संकीर्णताओं से ऊपर उठकर विकसित हुई है।
11 फरवरी की शाम अरविंद केजरीवाल भी जीत का जश्न मनाने अपने दफ़्तर में कार्यकर्ताओं के सामने आए तो भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारे लगाए। मानो वो बीजेपी और पीएम मोदी को बता रहे हों कि वो जश्न के माहौल में भी भारत माता की जय कहना नहीं भूलते। पीएम मोदी भी अपनी सभाओं और रैलियों में संबोधन की शुरुआत और अंत भारत माता की जय से ही करते हैं।
जेएनयू में स्कूल ऑफ सोशल साइंस के प्रोफेसर प्रवीण झा कहते हैं, अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी में फर्क करना बहुत मुश्किल काम है। दोनों की राजनीति देखिए तो ऐसा लगता है कि एक गहरे मोदी हैं और दूसरे थोड़े हल्के मोदी हैं। अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी की राजनीति के विकल्प कतई नहीं हो सकते। अरविंद में इतनी हिम्मत नहीं है कि वो बीजेपी की सांप्रदायिक और हिन्दू बहुसंख्यकवाद की राजनीति के खिलाफ खुलकर बोलें। दिल्ली विधानसभा चुनाव का पूरा कैम्पेन देख लीजिए। दरअसल, अरविंद केजरीवाल के साथ मोदी समर्थक मतदाता असहज महसूस नहीं करते हैं।
प्रवीण झा कहते हैं, दिल्ली का जनादेश मोदी की सांप्रदायिक नीतियों के खिलाफ नहीं है। अरविंद केजरीवाल पहले नेता थे जिन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया। अरविंद केजरीवाल ने सीएए और एनआरसी के खिलाफ चल रहे विरोध-प्रदर्शनों से खुद को दूर रखा। अरविंद ने शाहीन बाग को अपने चुनावी कैम्पेन से इतना दूर रखा कि मानो वो दिल्ली का इलाका ही नहीं है। इनकी देशभक्ति और राष्ट्रवाद बीजेपी के नैरेटिव के अलग नहीं है। अरविंद केजरीवाल ने कभी नहीं कहा कि उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ्ती को रिहा कर देना चाहिए। ये तो दूर की बात है। मैंने तो एक इंटरव्यू में उन्हें यह कहते हुए सुना कि दिल्ली पुलिस उनके नियंत्रण में होती तो शाहीन बाग़ दो घंटे में ख़ाली करवा देते। ऐसा व्यक्ति मोदी का विकल्प कैसे हो सकता है?
अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी की रणनीति को चुनौती नहीं दी। दिल्ली यूनिवर्सिटी में सोशल साइंस के प्रोफेसर सतीश देशपांडे कहते हैं कि केजरीवाल ने इस चुनावी कैम्पेन में बीजेपी की नफरत की राजनीति का विरोध नहीं किया। वो कहते हैं, केजरीवाल के पूरे कैम्पेन से यही संदेश गया कि उन्हें सांप्रदायिक राजनीति से समस्या नहीं है लेकिन वो इस बात को खुलकर नहीं कहेंगे।
सतीश देशपांडे कहते हैं, केजरीवाल चुनाव जीतने में माहिर हो गए हैं। लेकिन उन्हें तय करना होगा कि वो चुनाव जीतने की मशीन बनना चाहते हैं या देश की राजनीति में कोई निर्णायक भूमिका अदा करना चाहते हैं। 
 बीजेपी और मोदी की जो राजनीतिक प्रतिबद्धता है उसका मुक़ाबला केजरीवाल अपनी राजनीति से कर पाएँगे इस पर पूरा संदेह है। मोदी और बीजेपी को लेकर जो डर है क्या उसकी काट केजरीवाल हैं? सबसे बड़ा सवाल यही है। बिजली और पानी सस्ता मुहैया कराने का काम कोई भी राजनीतिक दल कर सकता है। बीजेपी भी कर सकती है। लेकिन क्या अभी देश का लोकतंत्र केवल बिजली-पानी की समस्या से जूझ रहा है? मोदी का विरोध करने वाले केजरीवाल की जीत से खुश हो सकते हैं लेकिन यह जीत फिर उसी डर में न बदल जाए।
राहुल गांधी ने अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी का संसद से सड़क तक विरोध किया लेकिन कांग्रेस को दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। यहाँ तक कि उसका वोट शेयर भी 2015 की तुलना में कम हो गया। जिस ओखला विधानसभा क्षेत्र के शाहीन बाग़ में सीएए का विरोध चल रहा है वहां कांग्रेस दूसरे नंबर पर भी नहीं आई। ऐसा तब है जब यहाँ मुस्लिम वोट निर्णायक स्थिति में हैं। आम आदमी पार्टी के अमानतुल्लाह खान 70 हजार से ज़्यादा मतों से जीते।
प्रोफेसर प्रवीण झा कहते हैं, अगर दिल्ली का जनादेश मोदी की नीतियों के ख़िलाफ़ होता तो जीत कांग्रेस की होती, न कि आम आदमी पार्टी की क्योंकि मोदी की नीतियों का मुखर विरोध राहुल गांधी ने किया है न कि अरविंद केजरीवाल ने। प्रोफेसर झा कहते हैं कि इस बात का डर है कि एक मोदी को हराने की जल्दबाजी में कहीं दूसरा मोदी न तैयार कर दें।
वो कहते हैं, मोदी और केजरीवाल में कई समानताएँ हैं। दोनों को पार्टी के भीतर और बाहर विरोधी बर्दाश्त नहीं हैं। बीजेपी के भीतर कोई मोदी से सवाल करने वाला नहीं है तो आम आदमी पार्टी के भीतर भी नहीं है। दोनों का चुनावी अभियान व्यक्तिनिष्ठ होता है। इनके लिए कैबिनेट और सदन से बड़ा उनका अपना मन होता है। हम मोदी पर सेक्युलरिजम को लेकर भरोसा नहीं कर सकते तो केजरीवाल के भरोसे भी नहीं छोड़ सकते।
अरविंद केजरीवाल 8 फरवरी को मतदान के दिन अपने माता-पिता से वोट डालने के पहले आशीर्वाद लेने गए तो उसका वीडियो बना सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इसी तरह पीएम मोदी भी अपनी माँ से मिलने अहमदाबाद जाते हैं तो टीवी पर लाइव दिखाया जाता है।
केजरीवाल सात फऱवरी को सीपी के हनुमान मंदिर गए और जाने के बाद लोगों को ट्वीट कर बताया कि हनुमानजी से उनकी बात हुई और हनुमानजी ने उनसे कहा कि वो अच्छा काम कर रहे हैं। (बीबीसी)

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