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स्वेटर बुुनना, शाहीनबाग जनांदोलन और औरतें
स्वेटर बुुनना, शाहीनबाग जनांदोलन और औरतें
Date : 13-Feb-2020

स्वेटर बुुनना, शाहीनबाग जनांदोलन और औरतें

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
शाहीन बाग में औरतें जनांदोलन कर रही हैं, वे खाली नहीं बैठी हैं जो स्वेटर बुनें। आंदोलन में भाग लेना अपने आपमें बड़ा काम है,यह किसी पूरक काम की तरह नहीं है। सवाल यह है औरतों को ही स्वेटर बुनने की सलाह क्यों दी गई ? असल में इस सलाह में असगर वजाहत का पुंसवाद अभिव्यक्त हुआ जो सबसे घटिया चीज है।
शाहीन बाग के आंदोलन में औरत-मर्द और युवा सभी शामिल हैं। बेहतर यह होता कि असगर वजाहत साहब अपनी तथाकथित नेक सलाह न देते। वे सीखें इन औरतों से, इन औरतों ने किसी भी लेखक या अन्य किसी से यह नहीं कहा कि वे क्या करें।नजरिए के लिहाज से वजाहत साहब शानदार लोकतांत्रिक लेखक हैं,लेकिन शाहीन बाग आंदोलन के महत्व को जानते हुए भी उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया के जरिएउसे छोटा करने की कोशिश की है। उनके बयान को सोशल मीडिया में गंभीरता से लिया गया है। तमाम रंगत के लोग उनके बयान की आलोचना कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी टिप्पणी हटाना जरूरी नहीं समझा। इसका मतलब है वे अपने बयान पर गंभीर हैं और यह सुचिंतित-सुनियोजित पुंसवादी बयान है। संयोग से असगर वजाहत जनवादी लेखक संध के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। कम से कम जलेसं को एक बयान जारी करके उनके बयान से अपने को अलग करना चाहिए। अब शाहीन बाग आंदोलन के उस पहलू को देखें जो अविवेचित है और लेखकों की समझ के परे है।
पहली बात यह कि शाहीन बाग की औरतें किसी सामान्य मसले पर आंदोलन नहीं कर रही हैं और उनकी इस आंदोलन में व्यापक शिरकत को किसी बने-बनाए स्टीरियोटाईप से नहीं समझा जा सकता। सीएए-एनआरसी के विरोध का संबंध भारत के नागरिकों के अस्तित्व के बुनियादी अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है।इस आंदोलन में जो औरतें शामिल हैं ,वे पूरे परिवार के साथ शामिल हो रही हैं। इनमें अधिकांश मुसलिम औरतें हैं। वजाहत साहब की मुश्किल यह है कि वे अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि मुसलिम औरतें क्यों मैदान में आकर डटी हुई हैं।मुसलिम औरतों की व्यापक शिरकत ने मुसलिम फेंडामेंटलिस्टों,वाम फंडामेंटलिस्टों और हिन्दू फंडामेंटलिस्टों के अब तक के मुसलिम समाज के बारे में बनाए गए सभी कल्पित आख्यानों के धुर्रे उडाकर रख दिए हैं। ये तीनों ही नजरिए अपने -अपने तरीकों से मुसलिम समाज को इस्लामिक फंडामेंटलिस्टों के गुलाम के रूप में देखते और चित्रित करते रहे हैं।
यह एक सच्चाई है कि विभिन्न राजनीतिकदल समय-समय पर मुसलिम फंडामेंटलिस्टों के दवाब में आकर काम करते रहे हैं। यह पहला मौका है जब सीएए-एनआरसी आदि के सवाल पर मुसलिम फंडामेंटलिस्ट क्षितिज से गायब हैं और उनकी जगह मुसलमानों के लिबरल समाज ने अगुवाई में आंदोलन का झंडा थाम लिया है। यह भारत के लिए ही नहीं सारी दुनिया के मुसलमानों के लिए एकदम नया संदेश है।
भारत में मुसलिम औरतें लोकतंत्र के विस्तार और विकास के लिए लड़ रही हैं, बुर्के के बाहर आकर संघर्ष कर रही हैं। भारत में संयोग से मुसलिम समुदाय के लोगों की संख्या तकरीबन अमेरिका की आबादी के बराबर है। यह पहला आंदोलन है जहां प्रचार पर कम और जनता की शिरकत पर अधिक जोर है। दूसरी बात यह कि इस आंदोलन का चरित्र बहुत ही व्यापक है। यह दलीय राजनीति की घेराबंदी को तोड़ता है। इस आंदोलन ने औरतों की राजनीतिक शिरकत के नए मुहावरे को जन्म दिया है।
शाहीन बाग मे सिर्फ आंदोलन ही नहीं चल रहा, बल्कि औरतों के बच्चों की सर्जनात्मक शिक्षा के भी कई कार्यक्रम चल रहे हैं जिनमें सैंकड़ों बच्चों को लोग सिखा-पढ़ा रहे हैं। यह मात्र नारेबाजी और भाषणबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्य,नाटक,कविता,फिल्म,वीडियो आदि सृजन के बेहतरीन रूप भी सामने आए हैं।इस आंदोलन की खूबी है कि इसने सारे देश में सीएए-एनआरसी के विरोध को आंदोलन की शक्ल और मानक दिए हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला आंदोलन है जिससे जुड़कर देश के विभिन्न शहरों-कस्बों और महानगरों में प्रतिवाद हो रहे हैं।
शाहीन बाग आज जनांदोलन का शानदार प्रतीक है। पीएम भी परेशान हैं और बार बार इस पर हमले कर रहे हैं। मीडिया का एक तबका अभी तक इस आंदोलन की मुखालफत में लगा है। दिलचस्प बात यह है विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता इस आंदोलन में जाकर भाषण दे आए हैं लेकिन आज तक वे सीएए-एनआरसी के खिलाफ अपने राजनीतिक दल को भी हरकत में नहीं ला पाए हैं। इन निकम्मे दलों में माकपा-कांग्रेस-आप आदि सभी शामिल हैं। सवाल यह है विपक्षी दल अपने मंचों से सीएए -एनआरसी के खिलाफ आंदोलन संगठित करने में अब तक असफल क्यों रहे हैं ,उनके स्वतंत्र आंदोलन और पहलकदमी कहां गुम हो गयी है। यदि सभी राजनीतिकदल खुलकर इस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरें तो सारेदेश का माहौल ही बदल जाए। इस कमी के बावजूद शाहीन बाग आंदोलन निडर भाव से सही ढ़ंग से चल रहा है। इस बीच में असगर वजाहत के बयान को लेकर दिग्रभमित होने की जरूरत नहीं है। वे लेखक हैं और उनके बयान का कोई वजन नहीं है। हां ,अफसोस की बात है वे जलेसं के अध्यक्ष हैं। इस नाते वे यहां चूक कर गए हैं। वरना लेखको के इस तरह के आंदोलन विरोधी बयान को आम जनता गंभीरता से नहीं लेती।
शाहीन बाग की औरतें जब आंदोलन कर रही हैं तो इस दौरान वे अपने घर के सारे काम सिलटाकर आती हैं।वे मात्र बैठी नहीं हैं। उनके पास दूसरी और भी आंदोलन की जिम्मेदारियां हैं ,हर औरत कोई न कोई जिम्मेदारी निभा रही है।इससे भी बड़ी बात यह कि औरतों को लेखकों और मर्दों की नेक सलाह नहीं चाहिए। शाहीन बाग की औरतें तय करेंगी वे क्या करें , वे स्वेटर बुनें या इंकलाब जिंदाबाद कहें। मैं नहीं समझता इंकलाब जिंदाबाद बोलने से राष्ट्र कमजोर होता है।बल्कि हकीकत यह है इंकलाब बोलने से ,लोकतांत्रिक नारे लगाने से राष्ट्र और समाज दोनों मजबूत होते हैं। राष्ट्र कमजोर तब होता है जब जनता लोकतांत्रिक नारे भूल जाती है और मात्र लोकतंत्र की उपभोक्ता बनकर रह जाती है। शाहीन बाग की औरतें लोकतंत्र की उपभोक्ता नहीं हैं वे कोई माल बनाने की मशीन नहीं हैं कि स्वेटर बुनें, वे समाज को नए सिरे से बना रही हैं।समाज रचना का काम असाधारण काम है।हमें इस काम में शाहीन बाग की औरतों की हर तरह से मदद करनी चाहिए।हमें औरतें की पहल,मन,इच्छा का सम्मान करना चाहिए उनकी स्वतंत्रता और आंदोलनधर्मिता और स्वायत्तता को स्वीकार करना चाहिए।

हंगामा है क्यूँ बरपा?
मैंने देखा है स्त्रियों को टीवी देखते समय स्वेटर बुनते हुए, मैंने देखा है स्त्रियों को विवाहों के महिला संगीत के दौरान स्वेटर बुनते हुए, मैंने देखा है स्त्रियों को ट्रेन और बस की यात्रा के दौरान स्वेटर बुनते हुए, मैंने देहरादून में एक धरना-प्रदर्शन पर बैठी हुई स्त्रियों को भी स्वेटर बुनते हुए देखा है, मैंने देखा है उन्हें गैस पर दूध उबलने के इंतजार के पलों में भी स्वेटर बुनते हुए, मैंने उन्हें सिनेमा हॉल के अंधेरे में फिल्म देखते हुए भी स्वेटर बुनते देखा है, मैंने देखा स्कूलों के स्टाफ रूम में और सर्दियों में स्कूल के मैदान में धूप सेंकते हुए, यहां तक कि क्लास में पढ़ाते हुए भी स्वेटर बुनते देखा है, शाहीन बाग की महिलाओं को सलाह देते वक्त असगर वजाहत की मंशा चाहे जो भी रही हो मगर मुझे यह खाली समय के सदुपयोग के लिए चरखा कातने की गांधी जी की सलाह जैसा लगता है।
रेडीमेड के जमाने में हाथ के बुने हुए स्वेटर, दस्ताने, टोपी और जुराबों का चलन जरा कम हो गया है वरना असगऱ साहब को यह सलाह देनी की जरूरत ही न पड़ती।  हर रोज धरना स्थल पर 30-40 स्वेटर, दस्ताने, टोपी वगैरह तो ऐसे ही तैयार हो जाया करते।
-साध्वी मीनू जैन

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