विचार / लेख

क्या राष्ट्रवाद उतना ही जरूरी या खतरनाक है जितना हमें बताया जा रहा है?
क्या राष्ट्रवाद उतना ही जरूरी या खतरनाक है जितना हमें बताया जा रहा है?
Date : 23-Feb-2020

ओम तिवारी

राष्ट्रवाद है क्या? क्या वजह है कि इस पर जानकारों की सोच बंटी हुई है? भारत की बात करें तो हालात ऐसे हैं कि राष्ट्रवाद की चर्चा छेड़ते ही बातचीत विवाद का रूप ले लेती है। एक तरफ लोग राष्ट्रवाद को देशभक्ति से जोड़ कर देखते हैं और खुद को राष्ट्रवादी कहलाने में गौरव का अहसास करते हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो राष्ट्रवाद के नाम से ही खार खाते हैं। वे इसे हिटलर-मुसोलिनी की विचारधारा कहते हैं।
नई बहस आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान से पैदा हुई। झारखंड की राजधानी में संघ कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने राष्ट्रवाद शब्द के इस्तेमाल से बचने का जिक्र किया। वे यूनाइटेड किंगडम में संघ के किसी कार्यकर्ता से बातचीत को याद कर रहे थे जिसने उन्हें सलाह दी थी- ‘आप नेशनलिज्म शब्द का इस्तेमाल मत कीजिए। नेशन चलेगा, नैशनल कहेंगे चलेगा, नेशनैलटी भी चलेगा, लेकिन नैशनलिज्म मत कहो क्योंकि इसका मतलब होता है हिटलर, नाजीवाद, फासीवाद।’
मोहन भागवत के इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कोई इसे भाजपा के लिए आरएसएस की नसीहत बता रहा है। तो कोई इसे राष्ट्रवाद पर कटाक्ष करने वालों पर तंज बता रहा है।
पहले उनका तर्क समझते हैं जो इसे भाजपा को संघ की सलाह मानते हैं। इनके मुताबिक भागवत एक घटना के जरिए बीजेपी से स्पष्ट कर रहे हैं कि अब पार्टी को राष्ट्रवाद से आगे की रणनीति तैयार करनी होगी। क्योंकि राष्ट्रवाद का नारा अब अपना असर खो रहा है। एक के बाद एक चुनावों से यही साबित हो रहा है। जो मंत्र मोदी को दोबारा सत्ता में लाने में सार्थक साबित हुआ वह अब बेअसर होता जा रहा है।
हरियाणा में चुनाव के बाद सत्ता गठबंधन के सहारे चल रही है, तो महाराष्ट्र में सबसे पुराना गठबंधन टूट गया और सत्ता हाथ से निकल गई, उधर झारखंड में ऐसी करारी हार का सामना करना पड़ा जिससे उबरना आसान नहीं होगा। दिल्ली में पार्टी के पास सिर्फ राष्ट्रवाद की नैया बची थी लेकिन विरोधी आम आदमी पार्टी की लहर के सामने वह किनारे नहीं लग सकी।
मोहन भागवत के बयान का दूसरा तर्क रखने वाले लोग उनके भाषण को पूरा सुनने की सलाह दे रहे हैं। उनके मुताबिक आरएसएस चीफ बता रहे हैं कैसे वक्त के साथ शब्दों के मायने बदल जाते हैं। राष्ट्रवाद भी ऐसा ही एक शब्द है जो आज के माहौल में नाजीवाद और फासीवाद का पर्यायवाची बन गया है। इसे अब हिटलर और मुसोलिनी से जोड़ कर देखा जाने लगा है। इस पक्ष के मुताबिक भागवत विपक्ष पर हमला बोल रहे हैं जो बीजेपी की विचारधारा होने की वजह से इस भावना के खिलाफ माहौल बना रहा है। वह बार-बार खुल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना हिटलर और नाजी से करता है। खुद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ऐसा कर चुके हैं।
राष्ट्रवाद पर बहस कोई नई बात नहीं है। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन मानते थे कि ‘राष्ट्रवाद एक बचकानी चीज है और मानव जाति के लिए यह खसरा बीमारी जैसी है।’ वहीं प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल कहते थे ‘राष्ट्रवाद इंसान को कीड़े-मकोड़ों की तरह वर्गीकृत करने की एक आदत है जिसमें पूरे यकीन से लाखों-करोड़ों लोगों को अच्छा या बुरा चिन्हित कर दिया जाता है।’
तो क्या राष्ट्रवाद मानव जाति के लिए एक बुरी चीज है और इस विचारधारा से जितनी दूरी रखी जाए उतना ही बेहतर है?
इसका जवाब न और हां दोनों में मिल सकता है। खुद जॉर्ज ऑरवेल ही राष्ट्रवाद को दो श्रेणियों में रखते थे। मोटे तौर पर वे इसे सकारात्मक और नकारात्मक राष्ट्रवाद कहते थे। सकारात्मक राष्ट्रवाद का मतलब होता है अपने देश के लिए प्यार, उसे आगे बढ़ाने की भावना। नकारात्मक राष्ट्रवाद किसी दूसरे देश या समूह के खिलाफ घृणा से संचालित होता है।
जाहिर है अपने देश के प्रति प्रेम की भावना गलत नहीं हो सकती है। इतिहास गवाह है कि कैसे राष्ट्रवाद की भावना ने जापान का कायाकल्प कर दिया। फिलीपींस के आंदोलन की शुरुआत राष्ट्रवाद से ही हुई। अफीम युद्ध के बाद बुरी तरह टूट चुके चीन के लिए भी राष्ट्रवाद ने मरहम का काम किया। पिछले दो सौ साल के इतिहास में ऐसी कई मिसालें मिलती हैं जब राष्ट्रवाद ने देश के लोगों को एक साथ लाने और उन्हें जोडऩे का काम किया। अगर इस तरह की भावना नहीं होती तो कई देश शायद आज भी उपनिवेशवाद के युग में ही जी रहे होते।
लेकिन कहने वाले कह सकते हैं कि अगर यह भावना नहीं होती तो उपनिवेशवाद ही नहीं होता। किसी भी दूसरे समाजिक आंदोलन या विचारधारा की तरह राष्ट्रवाद भी खतरनाक हथियार बन सकता है। जर्मनी और इटली इसकी सबसे बड़ी मिसालें हैं। यहां से हिटलर और मुसोलिनी ने नाजीवाद और फासीवाद को जन्म दिया। हिटलर के सत्ता में आने की बड़ी वजह थी जर्मनी की जर्जर आर्थिक हालत। उसने राष्ट्रवाद  का सहारा लेकर पहले देश के अंदर अपने विरोधियों को खत्म किया फिर उसके नाम पर ही सरहद के बाहर कदम रखा। नाजी मानते थे कि वे सबसे ऊंची नस्ल हैं। नतीजा कितना खौफनाक निकला, पूरी दुनिया जानती है। राष्ट्रवाद की आड़ में मनमानी का यह फॉर्मूला आज भी आजमाया जा रहा है। आरोप लगते हैं कि तुर्की, रूस, ब्राजील, फिलीपींस, ऑस्ट्रिया जैसे कई देशों में नेता राष्ट्रलाद के नाम पर देश को गुमराह कर रहे हैं। जानकार मानते हैं ऐसे देशों में स्थिति अभी भले हिटलर और मुसोलिनी के समय जैसी भयावह नहीं दिखती। लेकिन सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए राष्ट्रवाद की भावना का इस्तेमाल आने वाले समय में बेहद खतरनाक रूप ले सकता है।
जाहिर है कुछ तानाशाहों-हुक्मरानों की वजह से राष्ट्रवाद बदनाम हुआ है। लेकिन क्या इससे कोई विचारधारा गलत हो जाती है? कभी समाजवाद काफी प्रचलित था। अभी परिस्थितियां राष्ट्रवाद के अनुकूल हैं। इनके चलते राष्ट्रवाद के रास्ते कम समय में ज्यादा लोगों को संगठित किया जा सकता है। नकारात्मक राष्ट्रवाद ऐसा और भी तेज़ी से कर सकता है।
भारत में भाजपा खुद को राष्ट्रवादी पार्टी मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘इंडिया फस्र्ट’ की बात करते हैं। ‘न्यू इंडिया’ की बात करते हैं। यही वजह है देश की जनता ने दोबारा प्रचंड ताकत देकर उन्हें सत्ता की चाबी सौंपी। कोई शक नहीं सकारात्मक राष्ट्रवाद से देश आगे बढ़ता है। पूरे देश की जनता साथ खड़ी हो तो राष्ट्र विकास के रास्ते पर चल पड़ता है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी का राष्ट्रवाद नकारात्मक है। एक समूह के खिलाफ है। नागरिकता संशोधन कानून और एनसीआर के खिलाफ देश भर में जारी प्रदर्शनों ने उसे नया हथियार दे दिया है। भाजपा इसे भोंथरा कर सकती है। यह साबित करके कि ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ सिर्फ नारा नहीं है। बल्कि सकारात्मक राष्ट्रवाद का सिद्धांत है। (सत्याग्रह)

 

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