विशेष रिपोर्ट

बैकुंठपुर, पुरूषों के कार्य क्षेत्र में कदम रख रहीं महिलाएं
बैकुंठपुर, पुरूषों के कार्य क्षेत्र में कदम रख रहीं महिलाएं
Date : 07-Mar-2020

पुरूषों के कार्य क्षेत्र में कदम रख रहीं महिलाएं
चंद्रकांत पारगी
बैकुंठपुर, 7 मार्च
। कोरिया जिले में बिना सरकारी मदद के महिलाएं पुरूषों के क्षेत्र में मजबूती से कदम रख रही हंै। वे ना सिर्फ अपना घर चला रही हैं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई के साथ समाज को नई दिशा देने का काम कर रही हैं। 'छत्तीसगढ़' ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ऐसी कुछ महिलाओं के कार्यों को देखा और उनसे बातचीत की, जिसमें जीवन के तमाम उतार चढ़ाव के बावजूद भी ये महिलाएं आगे बढ़कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रही हैं।

राजमिस्त्री ऐसी की पुरूष देखते रह जाएं
कोरिया जिलामुख्यालय बैकुंठपुर से लगभग 35 किमी दूर ग्राम सैदा की कौशल्या राजमिस्त्री हैं, निजी मकान निर्माण में लगी कौशल्या का काम करने का अंदाज पुरूषों से एकदम जुदा है। मकान निर्माण में उसके द्वारा किया गया प्लास्तर देख निर्माण करा रहे मालिक भी हैरान हैं। ईंट जुड़ाई के काम में महारत है। फटाफट दीवार खड़ी करना और एक इंच भी उपर नीचे नहीं। एक ओर राजमिस्त्री के प्रशिक्षण में जिलाप्रशासन ने बीते 4 साल में 5 करोड़ रू विभिन्न संस्थाओं में खर्च कर दिए।वहीं कौशल्या ने इसका कहीं कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। बस देख-देख कर पूरा काम सीख ली और फिर जब घर पर विपत्ति आई तो हाथ में करनी लिए वो काम करने निकल पड़ी। बीते 7 साल से वो राजमिस्त्री का काम कर रहीं हैं। रोजाना 35 किमी दूर सैदा से बैकुंठपुर आना और फिर शाम 6  बजे यहां से अपने घर जाना। 
इस काम के संबंध में कौशल्या बताती हैं कि 7 साल पहले उनके पति लकवाग्रस्त हो गए, जिसके बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनके उपर आ गई। उनके तीन छोटे-छोटे बच्चे थे, जिसके बाद बच्चों की पढ़ाई और उनके पालन पोषण को लेकर बड़ी समस्या खड़ी हो गई। खेती इनती नहीं है कि घर का गुजारा हो सकता था, जिसके बाद उन्होंने राजमिस्त्री के काम में हाथ आजमाया। पहले कई परेशानियां आई, कोई उन्हें काम पर रखना पसंद नहीं करता था। पहले तो साफ इंकार कर दिया करता था, परन्तु जब वो उनका काम देखता तो फिर उन्हीं से काम करवाता। अब वो परफेक्ट राजमिस्त्री बन चुकी हैं, प्रतिदिन उन्हें 4 सौ रूपए के हिसाब से मजदूरी मिलती है। 

बैकुंठपुर के महलपारा के एक निजी घर के निर्माण में लगी कौशल्या का काम देख काम करा रहे भूपेन्द्र सिंह हैरान हैंै। वे बताते हैं कि उनके घर के निर्माण में कौशल्या ने ही पूरा काम किया, इसे कोई काम बताना नहीं पड़ता है और काम करने में पुरूषों के तमाम नाटक से दूर है। इसका काम, ना कोई गुटखा खाने जाना और ना ही मोबाइल पर गाना सुनते काम करना, काम पर सबसे पहले समय पर आती है और पूरे समय काम करती है।

पेंटिग ने बदली जीवन की तस्वीर
बचपन से पेंटिंग का शौक ससुराल में भी उसका साथ नहीं छोड़ा। उसके इस काम को देख सास-ससुर के साथ देवर ने भी पूरा प्रोत्साहन दिया। उनके काम को देख मितानिनों ने बैकुंठपुर की 15 ग्राम पंचायत में स्वास्थ्य दीवाल लिखने का काम सौंप दिया। फिर क्या सुबह से अलग-अलग ग्राम पंचायतों में जाना और दिनभर में एक दीवार का लेखन कर शाम को घर लौट जाना। दीवार हो या कागज बैकुंठपुर तहसील के सरभोका के मुक्यिारपारा की पूनम राजवाड़े का हाथ एकदम सधा हुआ चलता है। इसके अलावा घर पर ही सिलाई का काम भी करती है, गांव भर की महिलाओं के कपड़े सिलकर अपना घर चला रही हैं। 

बिना किसी सरकारी मदद के इस महिला ने अपना एक मुकाम हासिल किया है। पुरूषों के क्षेत्र में अपनी दखल बनाने वाली पूनम राजवाड़े बताती हैं कि मुझे बचपन से पेंटिंग का शौक रहा। शादी के बाद भी घर में सास ससुर का पूरा साथ मिला। महिलाओं की बैठक में जाती तो वहां कुछ ना कुछ लिखने को मिल जाता। जिसे देख मितानिनों ने स्वास्थ्य दीवाल लिखने के लिए मुझे कहा, एक दीवाल लिखने के बाद मुझे 15 ग्राम पंचायतों की दीवाल लिखने का काम मिला। मैं इस काम से बेहद खुश हूं, मेरे काम को देखकर कई लोग पेंटिंग करवाने के लिए आते हैं। इससे मुझे कुछ मेहनताना मिलने लगा है इससे अपने घर की जरूरतों को पूरा कर रही हूं। उनकी सास का कहना है कि ये जब हमारे घर शादी के बाद आई तभी से इसके पेंटिग का शौक देखकर हम लोगों ने इसका उत्साह बढ़ाया। ये पेटिंग करने जाती है तो हम लोगों को अच्छा लगता है, इससे कुछ आमदनी भी होने लगी है। वहीं देवर श्री राजवाड़े का कहना है गांव में रहकर इतना बढिय़ा पेेंटिंग करती देखकर अच्छा लगता है, इसे देखकर अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा मिलेगी।

पार्किंग काम महिलाओं के हाथ
यदि आप जिला अस्पताल में वाहन लेकर आते हंै तो आपकी सबसे पहले मुलाकात पार्किंग संभाल रही महिलाओं से होगी। एक महिला मुख्य गेट पर तो दूसरी पार्किंग स्थल पर, तीसरी जिला अस्पतल के पीछे की ओर और चौथी महिला बड़े वाहनों को आने जाने की देखरेख में नजर आएगी।

जिलामुख्यालय बैकुंठपुर से 15 किमी दूर फूलपुर की 4 आदिवासी महिलाओं ने जिला अस्पताल की पार्किंग व्यवस्था संभाल रखी है। बीते एक साल से इस काम पर लगी चारों महिलाएं गाड़ी पार्क करने वाले लोगों को समझाती है और उनसे 12 घंटे के लिए रसीद काट कर उनकी गाड़ी की सुरक्षा भी करती हैं। जिससे पार्किंग को लेकर आए दिन होने वाले विवाद का खात्मा हो गया है। महिलाओं द्वारा पैसे मांगने को वाहन चालक विरोध नहीं कर पाते हैं।

पार्किंग के काम में लगी राधा बताती है कि जब यह कार्य शुरू किए तो घर से लेकर हर कहीं हम लोगों का विरोध हुआ, परन्तु हम लोगों ने हार नहीं मानी, लोग पार्किग में पैसा नहीं देते थे, उन्हें काफी समझाना पड़ा, पर अब सबकुछ ठीक होता जा रहा है। घर में पति के साथ कई कई दिन तक झगडा होता था, वो ऐसे काम के लिए तैयार नहीं थे, दूसरी ओर पति भी बेराजगार और हम भी। घर के खर्च को चलाने की चुनौती थी। वहीं संगीता का कहना है कि उसे इस काम में उसकी सहेली राधा लेकर आई, पार्किग का काम संभालने में पहले तो कई परेशानी हुई, लोगों को बहुत समझाना पड़ता है, कई लोग ऐसे आते हंै जिनके पास पैसा होता भी नहीं है, कई बार बड़े लोगों का दबाव भी आता है। पर अब इस काम को अच्छे ढंग से हम लोग कर रहे हैं। वहीं सोनकुंवर बताती है कि 45 सौ रूपए महिना मिलता है। जो लोग जिला अस्पताल के बाहर वाहन लगाते हैं जिससे यातायात प्रभावित होता है, उन्हें अंदर गाड़ी लगाने के लिए कहा जाता है, तब जाकर पार्किंग व्यवस्थित हो पाई है।

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