विचार / लेख

विदेशों में कोरोना के मरीज अस्पताल जा रहे हैं, पर भारत में कई वहां से भाग क्यों रहे हैं?
विदेशों में कोरोना के मरीज अस्पताल जा रहे हैं, पर भारत में कई वहां से भाग क्यों रहे हैं?
Date : 17-Mar-2020

शोएब दानियाल

पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से हो रही मौतों का आंकड़ा पांच हजार के करीब पहुंच गया है। सवा लाख से ज्यादा लोग इसकी चपेट में हैं। चीन से लेकर इटली तक तमाम देशों में लोग इस महामारी से निपटने के लिए अपनी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की शरण में हैं। लेकिन भारत में स्थिति उलट है। यहां कई लोगों को इस पर शक है कि सरकार उन्हें कोरोना वायरस से बचा सकती है। इसके चलते स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए हालात और जटिल हो चले हैं।

आगरा के एक उदाहरण से इसे समझा सकता है। बीते हफ्ते यहां से खबर आई कि एक महिला आइसोलेशन वार्ड से भाग गई है। इस महिला के पति में कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि हो गई थी। बाद में पता चला कि हाल ही में यूरोप से लौटी यह महिला सरकारी स्वास्थ्य कैंप में भर्ती नहीं होना चाहती थी। उसके घरवालों ने दावा किया कि इसकी वजह आगरा के एसएन द्विवेदी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड के गंदे टॉयलेट्स थे। अब इस महिला के ससुर पर महामारी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है जिसमें दो साल तक की जेल का प्रावधान है।

यह इस तरह का अकेला मामला नहीं है। नौ मार्च के कर्नाटक के मेंगलुरु में भी कोरोना वायरस का एक संदिग्ध सरकारी अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड से भाग निकला। उसकी दलील थी कि वह प्राइवेट अस्पताल में जाना चाहता है ताकि उसका इलाज बेहतर तरीके से हो सके। हरियाणा के मानेसर में भी कुछ मरीजों ने सेना द्वारा चलाए जा रहे एक केंद्र में बेहतर सुविधाओं की मांग करते हुए हंगामा किया। इसके चलते पुलिस बुलानी पड़ी।

आगरा जैसा ही एक मामला मुंबई में भी देखा गया। यहां अंकित गुप्ता नाम के एक शख्स ने शहर के कस्तूरबा अस्पताल में फैली गंदगी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। सरकार ने यहीं कोरोना वायरस के मरीजों के लिए आइशोलेशन वार्ड बनाया है और अंकित के एक दोस्त यहां पर निगरानी में हैं।

भारत में एक बड़ा वर्ग है जिसे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर जरा भी भरोसा नहीं है। लेकिन कोरोना वायरस का संकट इतना गंभीर है कि निजी स्वास्थ्य तंत्र के पास भी इससे उपजे हालात को संभालने की क्षमता नहीं है। तेलंगाना के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है जहां कोरोना वायरस की चपेट में आए एक शख्स की तब मौत हो गई जब एक के एक बाद एक प्राइवेट अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। हालात को लेकर अनिश्चितता के इस आलम का एक नतीजा यह भी है कि हो सकता है इलाज के लिए जगह-जगह भटकते इस मरीज से कई दूसरे लोगों को संक्रमण हो गया हो।

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों को कम भरोसा क्यों है इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था दुनिया की सबसे लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में शुमार होती है। हमारा देश जन स्वास्थ्य पर जीडीपी का महज 1.28 फीसदी खर्च करता है। अनुपात के हिसाब से देखें तो हम इस मामले में दुनिया के गरीब से गरीब देशों से भी पीछे हैं। विश्व बैंक के मुताबिक निम्न आय वर्ग में आने वाले ये देश भी अपनी जीडीपी का करीब 1.57 फीसदी अपनी जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं देने पर खर्च करते हैं। इसका नतीजा यह है कि स्वास्थ्य संकेतकों के हिसाब से बांग्लादेश, नेपाल और लाइबेरिया जैसे देश तक हमसे आगे हैं।

इस तरह की स्थिति सामान्य हालात में भी बुरी ही कही जा सकती है। लेकिन जब आपदा जैसे हालात हों, जैसे कि कोरोना वायरस के चलते इस समय हैं, तो यह महाविनाश का कारण बन सकती है। जिस तेजी से यह संक्रमण फैल रहा है उसमें सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को ही बड़े कदम उठाने की जरूरत होती है। निजी व्यवस्था बहुत हुआ तो सहायक की भूमिका निभा सकती है।

जानकार मानते हैं कि भारत की इस समस्या की वजह पैसे की कमी नहीं बल्कि सोच है। स्वास्थ्य मंत्रालय को सलाह देने वाले नेशनल हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेंटर के पूर्व निदेशक टी सुंदररमन कहते हैं, ‘आदर्श रूप में देखें तो सरकार अस्पतालों में जरूरत से ज्यादा व्यवस्था होनी चाहिए। मसलन वहां हमेशा कुछ ऐसे अतिरिक्त बेड और उपकरण होने चाहिए जो सामान्य हालात में इस्तेमाल हुए बिना ही रहें।’ उनके मुताबिक इस तरह की चीजें योजनाओं में शामिल होनी चाहिए ताकि संकट के समय जब ज्यादा संसाधनों की जरूरत हो तो ये काम आएं।

भारत इस मोर्चे पर हमेशा से पीछे रहा है। लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में तो स्थितियां और खराब हो चली हैं। टी सुंदररमन कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों के हाल में इस गिरावट को वर्तमान सरकार ने तेज ही किया है जिसने उनके बजट में कटौती की है और ये संकेत भी दिए हैं कि वह मुनाफे के लिए इन अस्पतालों को आउटसोर्स करने के लिए भी तैयार है।

जन स्वास्थ्य अभियान की संयुक्त राष्ट्रीय संयोजक सुलक्षणा नदीं मानती हैं कि यह उस विचारधारा का नतीजा है जो मानती है कि सरकार को स्वास्थ्य सुविधाएं खुद देने के बजाय इन्हें निजी संस्थाओं से खरीदना चाहिए। वे कहती हैं, ‘सरकारी अस्पतालों को बनाने और चलाने के बजाय सरकार आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर पैसा खर्च कर रही है जिनसे लोग निजी अस्पतालों से स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लें।’ वे आगे कहती हैं, ‘लेकिन यह योजना ही गड़बड़ है क्योंकि इसके केंद्र में मुनाफा है। इसके अलावा निजी स्वास्थ्य सुविधाएं शहरों में ही केंद्रित हैं तो सरकार की इस सोच का नुकसान ग्रामीण और आदिवासी आबादी को हो रहा है।’

सुलक्षणा नंदी मानती हैं कि बदहाल सरकारी स्वास्थ्य तंत्र ने कोरोना वायरस से निपटने के मोर्चे पर भारत की तैयारी को कमजोर किया है। उनके मुताबिक फिलहाल कुछ समय के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि सरकार नियम बनाए और निजी स्वास्थ्य तंत्र उनके हिसाब से चले। वे कहती हैं, ‘जिस तरह की आपातस्थिति कोरोना वायरस ने पैदा की है उसे देखते हुए मुनाफे का सिद्ंधात कुछ समय के लिए परे रखना होगा।’

हालांकि यह उपाय भी शायद ही काफी हो। टी सुंदररमन कहते हैं, ‘अगर किस्मत से यह संकट टल जाता है तो हम एक आपदा से बच जाएंगे। लेकिन जो हाल इटली में है वो अगर यहां हुआ तो संकट असाधारण हो सकता है।’

(सत्याग्रह)

 

Related Post

Comments