संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 23 मार्च  ...बीती शाम हिन्दुस्तान के एक तबके ने बाकी दुनिया के नेताओं के लिए रश्क का सामान जुटाया
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 23 मार्च ...बीती शाम हिन्दुस्तान के एक तबके ने बाकी दुनिया के नेताओं के लिए रश्क का सामान जुटाया
Date : 23-Mar-2020

...बीती शाम हिन्दुस्तान के एक
तबके ने बाकी दुनिया के नेताओं
के लिए रश्क का सामान जुटाया

कल हिन्दुस्तान के अधिकतर इलाकों ने एक अभूतपूर्व एकजुटता दिखाई। पहले किसी जंग के मौके पर ऐसा होता था कि शाम को सायरन बजते ही सरहदी इलाकों में लोग बस्तियों में रौशनियां बंद कर देते थे ताकि दुश्मन फौज के हवाई जहाज उन रौशनियों को देखकर हमला न कर सकें। कल दिन की चमचमाती रौशनी में भी पूरे देश ने एक किस्म से घर में रहकर वक्त गुजारा, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनता-कर्फ्यू के आव्हान का साथ दिया। अब शाम पांच बजे जब मोदी के मुताबिक लोगों को थाली और ताली बजाकर, घंटी बजाकर घरों के दरवाजे से उन लोगों का एक प्रतीकात्मक धन्यवाद करना था जो कि कोरोना के इस खतरे के बीच भी जनता की जिंदगी बचाने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं, तो लोगों ने पांच-दस मिनट पहले से ही आवाजें शुरू कर दीं, और बहुत से लोगों ने पहले से यह संदेश फैलाना शुरू कर दिया था कि किस तरह थाली और घंटी की आवाज, शंखध्वनि, घंटे की आवाज से कोरोना वायरस मर जाएगा। लोगों ने इसके लिए नासा के वैज्ञानिकों के निष्कर्षों का हवाला भी देना शुरू कर दिया था जो कि हाल के बरसों में हिन्दुस्तानी अफवाहबाजों के पसंदीदा स्रोत हो गए हैं। बात यहां तक रहती तो भी ठीक था। लेकिन बात इससे बहुत आगे तक बढ़ी, और देश के बहुत से लोगों ने सड़कों पर जुलूस निकाले। उनके पास दीवाली के बचे हुए पटाखे भी थे, होली के बचे हुए रंग भी थे, हाथों में गणतंत्र दिवस के बचे हुए तिरंगे झंडे भी थे, और उनके दिलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपार विश्वास भी था कि मोदी कोरोना को दौड़ा-दौड़ाकर मारेगा। 

दुनिया के किसी भी नेता को नरेन्द्र मोदी जैसे नेता से रश्क ही हो सकता है कि उनके एक आव्हान पर 25-50 करोड़ लोग इस तरह से घंटा-घंटी, ताली-थाली बजाने लग गए, कहीं भारतमाता की जय के नारे लगे, तो कहीं मोदी की जय के। सभी नारों का विस्तार इसके बाद रात तक अनगिनत शहरों में निकले, अनगिनत जुलूसों में देखने मिला जिनमें लोग ठीक वही करते रहे जो न करने की मेडिकल सलाह देश की सरकारों ने, देश और दुनिया के डॉक्टरों ने, और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें दी थी। दिन भर घर में रहे और शाम को भीड़ बन गए। हासिल क्या हुआ? करोड़ों लोगों की रोजी खत्म हुई, लेकिन नारेबाजों को देश की जिंदाबाद करने का एक मौका मिला। लोगों ने पांच बजे के घंटा-घंटी के बाद उसी अंदाज में जश्न मनाया जैसे दशहरे के दिन रावण को जलाए जाने के तुरंत बाद मनाया जाता है, यह एक और बात है कि इस जश्न से एक सिर वाला कोरोना बढ़कर दस सिर वाला हो गया, और चूंकि वह दिखता नहीं है, इसलिए उसे जलाना भी मुमकिन नहीं है। कोरोना को जलाने का कोई दशहरा आने वाला नहीं है, कोई सोनपत्ती नहीं बांटी जा सकेगी, अगर आखिर में जाकर बांटने के लिए ऐसे लोग बचेंगे तो भी। 

प्रधानमंत्री ने देश भर के लोगों को घर में रहने को कहा, वह एक सही शासकीय फैसला था, जो कि हफ्तों पहले से दुनिया की कई सरकारें लेते आ रही थीं, और उसके सकारात्मक नतीजे डॉक्टरों ने दर्ज भी किए थे। प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों और दूसरे जनसेवकों के प्रति आभार व्यक्त करने को भी कहा और वह भी एक बहुत सही कदम था, लोगों को शुक्रगुजार होना आना चाहिए। लेकिन इस देश के लोगों की वैज्ञानिक चेतना पिछले कुछ बरसों में नेहरू से दुश्मनी निभाने के चक्कर में इस कदर तबाह हो गई है कि विज्ञान शब्द का वि लोगों को विरोध का वि लगने लगता है, विपक्ष का वि लगने लगता है। लोगों ने तर्कों से सोचना बंद कर दिया है, तथ्यों से सोचना बंद कर दिया है, और सत्य-तथ्य की जगह इस देश की मानसिकता में एक काल्पनिक इतिहास में जीने वाले आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद ने ले ली है। और अपने आपको विश्वगुरू मानने वाले लोगों का कोरोना भी क्या बिगाड़ लेगा, यह बीती शाम पांच बजे से लेकर रात तक सामने आया। जब दुनिया की हर मेडिकल चुनौती, या हर वैज्ञानिक चुनौती के मुकाबले हिन्दुस्तानियों के पास जिंदाबाद के कुछ नारे हैं, कुछ झंडे-डंडे हैं, तो फिर यह देश कोरोना से बचने की ताकत कहां रखता है? यह पूरा देश एक ऐसे दंभ में जी रहा है कि दुनिया का तमाम ज्ञान उसके पास था, दुनिया की सारी चिकित्सा गोबर और गोमूत्र में है, बाकी दुनिया ने हिन्दुस्तान के ज्ञान को लूटकर ही तरक्की की है। ऐसी सोच का भला क्या जवाब हो सकता है, ऐसी सोच का भला क्या इलाज हो सकता है? यह देश आज एक समूह-सम्मोहन का शिकार है, यह देश एक आत्मदंभ का शिकार है, यह देश धर्मान्धता का शिकार है, और यह देश एक ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है जो कि कभी न हुए इतिहास को हकीकत मानकर उसके भरोसे अपना वर्तमान जी रहा है, और अपना भविष्य बन जाने का भरोसा लिए हुए हैं। मनोचिकित्सकों के पास ऐसे मामले आते हैं जिनमें लोग काल्पनिक दोस्त देख लेते हैं, काल्पनिक दुश्मन देख लेते हैं, अपने बीते हुए वक्त के लिए अपनी कल्पनाओं पर सौ फीसदी भरोसा कर लेते हैं। ऐसे देश से अगर महज थाली-घंटी बजाने कहा जाए, तो वह वैज्ञानिक सलाह के खिलाफ सड़कों पर जुलूस निकाल रहा है, और उत्तर भारत के कुछ शहरों में तो पुलिस और प्रशासन के अफसरों ऐसे जुलूस की अगुवाई करते दिख रहे हैं जो कि कोरोना पर जीत की खुशी में निकाले गए थे। जिस देश को आज एक दहशत और आशंका में जीते हुए, जिंदगी की सबसे बड़ी सतर्कता से रहना चाहिए, वह घरों में बंद रहने के बजाय गाजे-बाजे और नाच-गाने वाले जुलूस निकाल रहा है। फिर ऐसे में गरीबों की रोजी जनता कफ्र्यू के नाम पर क्यों खत्म की गई? फेरीवाले, ठेलेवाले कल भूखे रहने के बजाय मजदूरी ही कमा लिए रहते। 

जब किसी देश से वैज्ञानिक सोच को निचोड़कर निकाल लिया जाता है, तो उसकी जनता में बचे हुए कूचे की तरह बेकाम हिस्सा ही बच जाता है। कल शाम से रात तक सड़कों पर कोरोना से नफरत नहीं, नेहरू की वैज्ञानिक सोच से नफरत नंगा-नाच कर रही थी, और जिन डॉक्टरों की तारीफ के लिए थाली-ताली का आयोजन किया गया था, उन्हीं डॉक्टरों की मौत का सामान ऐसे जुलूसों और नाच-गानों में जुटाया गया है। इस देश की जनता में से जो ऐसी प्रतिक्रिया वाली मुखर भीड़ है, वह भीड़ आधे-अधूरे आव्हान को नहीं समझती, वह ऐसे नारों के आगे-पीछे अपने शब्द जोड़ लेती है, वह अपने उन्माद को कोरोना पर जीत मान लेती है, और वह अपने झूठे दंभ से यह मान लेती है कि उनके नेता ने कोरोना को पटक-पटककर मारा है। यह मौका हिन्दुस्तान में समझदार लोगों के मलाल का है, उनकी निराशा और हताशा का है। और यह मौका बाकी दुनिया के नेताओं की ईष्र्या का भी है।
-सुनील कुमार

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