विचार / लेख

कोरोना के कारणों और उपचार पर वैज्ञानिक बहस होना चाहिए
कोरोना के कारणों और उपचार पर वैज्ञानिक बहस होना चाहिए
Date : 24-Mar-2020

सचिन कुमार जैन

इलेक्ट्रो मैग्नेटिक ऊर्जा, गीगा हर्ट्ज, टेरा हर्ट्ज ध्वनि तरंगे, मेम्ब्रेन, द्विपक्षीय ध्रुवीय क्षेत्र यानी स्रद्बश्चशद्यद्ग, वायरस का न्यूक्लियस, सूक्ष्म ध्वनि तरंगे  माइक्रोवेव थ्रेसहोल्ड एनर्जी, उच्च माइक्रोवेव तरंगे, वायरस के आउटर सेल यानी बाहरी कवर, माइक्रो वेव इलेक्ट्रो मेगेनेटिक किरणों...। कम से कम कोरोना ने भारत के लोगों को इन शब्दों का उपयोग करने का मौका दिया। यानी सियासी गुणाभाग के लिए भी विज्ञान के शब्दों का उपयोग जरूरी है। मैं मानता हूं कि यदि इतने शब्दों के अर्थ भी अपन समझ जाएं, तो भारत का मुस्तकबिल नये मुकाम पर पहुंच जाएगा। कोरोना के इलाज की खोज जारी है। इस वक्त जरूरत है कि इसके बारे में जानें और समझदारी से जानकारी का व्यवहार भी करें। हमारी श्रद्धा और विश्वास कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन यह कतई जरूरी नहीं कि सब उस विश्वास में विश्वास रखते हों। जब भी कुछ कृत्य करें।  तब यह भी सोचिए कि उसका मरीज़ों, आटिजम से पीडि़त व्यक्ति, पंछियों और छोटे छोटे पशुओं पर क्या असर पड़ रहा होगा? 
हमें स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के प्रति कृतज्ञता दिखानी ही चाहिए,  लेकिन शोर से नहीं, संगीत से। जरा यह भी सोचिए कि भारत में 28 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, 12 लाख आशा कार्यकर्ता हैं, जिन पर समुदाय को कोरोना के बारे में जागरूक करने की जिम्मेदारी है। इन्हें कुशल काम की न्यूनतम मज़दूरी के बराबर का मानदेय भी नहीं मिलता है।  कोरोना का संकट यह भी सिखा साबित कर रहा है कि हमें भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की नीति से तत्काल पीछे हटना चाहिए।  हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मज़बूत करना होगा। कोरोना किसी राजनेता का ब्रांडिंग अवसर नहीं बनना चाहिए। कोरोना के कारणों और उपचार पर वैज्ञानिक बहस होना चाहिए । 
आज जरूरत यह भी है कि जो 56 करोड़ लोग दैनिक आय पर निर्भर हैं, उनके बारे में विशेष ध्यान रखा जाए। फर्जी नासा और आई टी सेल द्वारा जारी जानकारियों को प्रसारित करके हम भारत और विश्व को बहुत गहरा नुक्सान पहुंचा रहे हैं। आप तक आने वाली फर्जी जानकारी को रोकना आपकी जिम्मेदारी है। फर्जी-फेक जानकारी प्रसारित करने के बाद आप उसे सही साबित करने की जद्दोजहद में जुट जाते हैं और समझ ही नहीं पाते हैं कि विभाजन और झुंड की राजनीति के प्रतिनिधि बन जा रहे हैं।
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