विचार / लेख

तस्लीमा की तीखी बातें और कोरोना का सच
तस्लीमा की तीखी बातें और कोरोना का सच
Date : 26-Mar-2020

रमण रावल 
बांग्लादेश की निर्वासित और विवादित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कोरोना के मद्देनजर जो बात कही है, उससे आप-हम सहमत/असहमत भले हों, विचारणीय जरूर है। उन्होंने कहा है कि देवता (उनका आशय सभी धर्मों के देवताओं से है) हैं तो कोरोना संकट से लोगों को उबारने मदद क्यों नहीं कर रहे? आस्तिक व नास्तिक दोनों अपने ढंग से इस पर पेश आ सकते हैं। ऐसा उन्होंने किसी एक धर्म के लिये ही नहीं बोला, बल्कि साफ तौर पर हिंदू, मुस्लिम, ईसाई सभी के लिये कहा है। यह मौका धर्म और उनके मानने वालों  के लिये किसी बहस और गैर जरूरी विवाद का नहीं है, लेकिन मेरा मानना है कि इस बहाने सही उनकी बातों पर चर्चा तो बनती है।
जैसे वे कहती हैं कि पोप अनेक  मौकों पर दावा करते हैं कि वे यीशू से सीधे बात कर सकते हैं तो इस समय वे कोरोना के उपचार क्यों नहीं पूछते। रोम और इटली तो जबरदस्त संक्रमित भी है तो यीशू के अनुयायियों को राहत मिलना चाहिये। वे मंदिर के पुजारियों से पूछती हैं कि अच्छे समय में वे भक्तों से चढ़ावा, दान लेते हैं तो इस समय जब भक्त पर जान का खतरा मंडरा रहा है, वे मंदिरों के पट बंद कर और अनेक जगह तो भगवान की मूर्तियों को भी मास्क पहनाकर गायब हो गये हैं, ऐसा क्यों?
वे मुल्ला-मौलवियों से भी सवाल करती हैं कि काबा-मक्का,मदीना सब दूर सन्नाटा क्यों है? क्यों नहीं अल्लाह अपने बंदों को कोरोना से बचा पा रहा है? वे यह भी कहती हैं कि डार्विन ने 160 साल पहले ही विकास के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए कह दिया था कि मनुष्य का मौजूदा स्वरूप बंदर से बना है और ईश्वर जैसा कुछ नहीं है, तब हम ईश्वर-ईश्वर की रट क्यों लगाये रहते हैं।
यहां मैं अपने आस्तिक या नास्तिक होने के सवाल को एक तरफ रखकर कहना चाहता हूं कि कोई भी देवता कभी-भी भक्त की मदद के लिये दौड़ा चला आता हो, ऐसा किसी धर्म ग्रंथ में नहीं है। कोई व्याख्याकार ऐसा दावा नहीं करता। कोई पंडा-पुजारी ऐसा करता है तो उसका ईमान और इसे मानने वाले का यकीन जाने। मूल बात यह है कि तस्लीमा ने अपने लेखन में हमेशा कठमुल्लापन को निशाना बनाया है। धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड की छीछालेदार की है। वे काफी हद तक सही होती  हैं। इसीलिये उन्होंने बेहद तार्किक तरीके से कोरोना को लेकर एक बार फिर धर्म के ठेकेदारों पर सवाल दागे हैं। मुझे नहीं लगता कि वे लोगों की धार्मिक आस्थाओं पर सवाल उठा रही होंगी।
अब मैं अपनी बात कहता हूं। दरअसल, इस समय जो दुनिया भर में हो रहा है, उसे देखते हुए धार्मिक संगठनों ने वाकई ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे लगे कि धर्म के पहरेदार, प्रतिनिधि, पुजारी, पोप, पंडे या मौलवी अपने-अपने ईष्ट से सीधे तौर पर ऐसी कोई प्रार्थना कर रहे हैं ,जो बताये कि वे लोगों के संकट से दुखी हैं और उपाय ढूंढ रहे हैं। ईश्वरीय मदद की बात को एक तरफ रख भी दें तो याद नही पड़ता कि धार्मिक संस्थाओं, मठो,मस्जिदों, चर्चों से पीडि़त लोगों की मदद के लिये खजाने का मुंह खोल दिया गया हो। लाखों-करोड़ों रूपये की सालाना आमदनी वाले संस्थान, करोड़ों-अरबों रुपये के सोने-चांदी व नकदी का भंडारण करने वाले धार्मिक संस्थानों ने दवा, राशन-पानी का इंतजाम अपने ऊपर ले लिया हो, ऐसी तो जानकारी नहीं है। क्या यह अपेक्षा नहीं की जाना चाहिये कि जो लोग सामान्य दिनों में, अपनी बेहतरी के समय में कभी गुप्त तो कभी प्रकट दान देने वाले अनुयायी, भक्त, बंदे आज छुपे-छुपे बैठे हैं तो उन्हें आत्मिक,आध्यात्मिक , भौतिक मदद की जाये?
कमोबेश हर मुल्क के धाार्मिक प्रतिष्ठान इस मामले में उदासीन रहे हैं। यदि कहीं से कुछ राहत आ रही है तो वे सामाजिक संस्थान हैं, जो जान की परवाह किये बिना भी आगे आये हैं। वैसे मेरा मानना है कि किसी भी प्राकृतिक या मानव जनित आपदा के वक्त भी ये धार्मिक संस्थान अपना बड़ा दिल नहीं दिखा पाते। अलबत्ता, सामाजिक संगठन, व्यापारिक-औद्योगिक घराने और व्यक्तिगत स्तर पर मदद का अंबार लग जाता है। आखिरकार ऐसा क्यों? क्या तमाम उपदेश-प्रवचन केवल सामान्य नागरिकों के लिये हैं? तमाम मिसालें एक अदना व्यक्ति ही पेश करे? समर्पण, सर्वजन हिताय, परोपकार, प्राणी मात्र की मदद,सृष्टि का हर प्राणी एक समान जैसी चिकनी-चुपड़ी बातें मंच के नीचे बैठे, पंडाल में हाथ जोड़े भक्ति में तल्लीन व्यक्ति के लिये ही है?
कोरोना संकट के बहाने उपजी इस बहस का स्वागत भले ही करने का साहस हम नहीं दिखा पायें, क्योंकि धर्म के मामले को संवेदनशील बताकर किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचना मानव स्वभाव है ही नहीं, तो भी इस पर पूर्वाग्रह के बिना चर्चा तो की ही जा सकती है। बहुत आसान है किसी दूसरे को दोषी ठहराना ,लेकिन जो अंगुली संगठित क्षेत्र की ओर जब भी उठती है तो उसे बगावत मान लेना भी तो उचित नहीं । मामला जब धर्म से जुड़ा हो तो अनाड़ी, धर्मांध लोगों को आसानी से भडक़ाकर तलवार,पत्थर थमा दिये जाते हैं। और कुछ नहीं तो धर्म के ये ठेकादर उन्हीं अनाड़ी और धर्मांध लोगों के भले के लिये ही आगे आने के जतन कर लें तो लोगों की आस्था धर्म के प्रति और बढ़ेगी ही।
यूं हम बात करें तो माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत के मुताबिक आबादी के बेतहाशा बढऩे पर प्रकृति ही संतुलन के उपाय आजमा लेती है। कोरोना वायरस का मसला मानवजनित होते हुए कुदरत के काम में अड़ंगा तो है ही। इसलिये माल्थस को याद रखना ही होगा। आयंदा भी कोशिश यह रहे कि कुदरत से छेडख़ानी न की जाये तो यह खुद पर मेहरबानी समान होगा। वैसे यह तो पक्का है कि जब तक दुनिया कायम है, तब तक धर्म, ईश्वर को मानने वाले भी बरकरार रहेंगे ही। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। धर्म या ईश्वर का अस्तित्व हमें गलत करने से रोकता है या डराकर रखता है तो इसमें गलत या नुकसान कुछ भी नहीं है, बल्कि ताज्जुब इस बात का है कि खुदा-ईश्वर-यीशू के होने के अहसास के बावजूद हम तमाम अनैतिक, कदाचरण वाले काम करने से परहेज नहीं कर रहे। दुनिया में आर्थिक से लेकर तो हर तरह के अपराध तक द्रूत गति से बढ़ रहे हैं। अपराधों के आकार-प्रकार ने समूची मानव जाति को हिलाकर रख दिया, फिर भी इसे अंजाम देने वाले किसी अंजाम से नहीं डर रहे । इसे क्या कहेंगे? क्या वे यह मानते हैं कि ईश्वर नहीं है? उन्हें धर्म, ईश्वर, कानून, समाज किसी का डर क्यों नहीं लगता? 

Related Post

Comments