संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 अप्रैल : रौशनी की यह नुमाइश किस खतरे की कीमत पर हो रही ?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 अप्रैल : रौशनी की यह नुमाइश किस खतरे की कीमत पर हो रही ?
04-Apr-2020

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कल 5 अप्रैल की रात के लिए तय किया गया रौशनी का जलसा एक खतरा लेकर आया है। देश के बिजली सेक्टर के जानकारों का कहना है कि एकमुश्त अगर देश के लोग घरेलू बत्तियां बंद कर देंगे, तो करीब दस फीसदी खपत एकदम से गिर जाएगी, और फिर 9 मिनट बाद यह खपत एकदम से बढ़ भी जाएगी। इस उतार-चढ़ाव से देश की पॉवर ग्रिड पर इतने बड़े झटके लगेंगे कि देश अँधेरे में डूब सकता है। कल मोदी की घोषणा के बाद देश के बिजली मंत्री पॉवर सेक्टर के अफसरों के साथ बैठे, जिन्होंने फिक्र के बावजूद भरोसा दिलाया है कि वे इस उतर-चढ़ाव को झेल लेंगे, लेकिन कुछ का कहना है कि जनता से यह अपील जरूरी है कि वह सिर्फ रौशनी बंद करे, पंखे, या एसी चलते रहने दें, ताकि खपत एकदम से ना गिरे। कल दिल्ली में हुई इस बैठक से जाहिर है कि मोदी की मुनादी के पहले इस बारे में केंद्र सरकार के भीतर भी तकनीकी विशेषज्ञों से चर्चा नहीं हुई थी। खैर, यही तरीका नोटबंदी का था, यही तरीका देश में लॉकडाउन का था। इसलिए देश को अगले और चार बरस इसी किस्म से मुनादियों के सदमे और उनके नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए। 

फिलहाल फिक्र की बात यह है कि अगर पॉवर ग्रिड को नुकसान हुआ तो क्या होगा? क्या आज देश ऐसे प्रतीकात्मक प्रदर्शनों को खतरों की कीमत पर भी करने की हालत में है? क्या आज देश की, और खुद प्रधानमंत्री की भी यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि ऐसे खतरनाक, और निहायत गैरजरूरी, शगल में उलझें? देश भर में बिजली की बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, क्या ऐसे खतरनाक प्रदर्शन के पहले राज्यों से चर्चा की गई? देश के 130 करोड़ लोगों को एक साथ दिखाने के लिए यह नुमाइश की जा रही है, और देश के 30 राज्यों को भी साथ नहीं रखा जा रहा? यह सिलसिला खतरे के वक्त और खतरनाक हो जाता है, हो गया है। 

आज हिंदुस्तान की प्राथमिकता आत्मप्रचार से परे की ही होनी चाहिए। चाहे सरकारें हों, चाहे राजनीतिक दल हों। आज जब भूखों के लिए तैयार फूड पैकेट पर किसी नेता की तस्वीर छपती है, उन्हें बांटते हुए नेताओं की तस्वीरें छपतीं हैं, तो लगता है कि क्या प्रचार के बिना, मुसीबत की घडिय़ाँ भी इनसे कटे नहीं कटतीं? लखनऊ के एक शायर का लिखा कल ही हमारे पढऩे में आया है कि, 

'राशन थमा दिया उसे 
सेल्फी के साथ-साथ,
जो मर रहा था भूख से, 
गैरत से मर गया।।'

आज का वक्त अपने को भूलकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का है। आज हिंदुस्तान में करोड़ों डॉक्टर, नर्स, पुलिस, सफाई कर्मचारी, बिजली कर्मचारी, जेल और निराश्रित गृह कर्मचारी खतरे झेलकर भी अपना काम कर रहे हैं। उनके चेहरे ढंके हुए हैं। उनके घरवाले फिक्र में हैं। किसी भी तरह की नुमाइश उनका कोई फायदा करने वाली नहीं है। आज देश के करोड़ों मजदूर सड़कों में, दूसरे प्रदेशों में शरणार्थी बने हुए हैं, उनके दिलों पर शहरी घरों की रौशनियों को देखकर क्या गुजरेगी? क्या इन रौशनियों में उनके भूखे पेटों के लिए भी कुछ रहेगा? उनका कोई भी भला शोहरत के किसी शिगूफे से होने वाला नहीं है। इसलिए देश को खतरे में डालकर कोई निहायत गैरजरूरी हरकत ना ही की जाए तो ही बेहतर है।
-सुनील कुमार

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