संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 8 अप्रैल : वक्त इतना खराब आ रहा है कि कसाई का तरीका अब मैनेजमेंट में इस्तेमाल होगा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 8 अप्रैल : वक्त इतना खराब आ रहा है कि कसाई का तरीका अब मैनेजमेंट में इस्तेमाल होगा
08-Apr-2020

केंद्र और राज्य सरकारों ने अलग-अलग फैसले लेकर कड़ाई से कई फैसले लागू किए हैं। अभी मकान मालिकों से कह दिया गया है कि वे किराया मांगने जोर ना डालें। स्कूलों को कह दिया गया है कि वे फीस वसूली ना करें। बाजार के कई किस्म के छोटे-मोटे कर्ज पटाना लोग खुद भी बंद कर देंगे क्योंकि किसी के पास पटाने को कुछ है ही नहीं। लोग मोहल्ले की किराना दुकान का उधार तक नहीं चुका पाएंगे। आज हिंदुस्तान में सरकारी कर्मचारियों के अलावा कोई और भी महफूज बचे हैं ? लेकिन ऐसी हालत में लोगों का होगा क्या? जो लोग किराए पर जिंदा हैं, उनका क्या होगा? अधिकतर स्कूलें कर्मचारियों को तनख्वाह फीस के पैसों से ही देती हैं, वे तनख्वाह कहाँ से लाएंगी? फिर बिना पढ़ाई लोग बच्चों की फीस क्यों देंगे? बिना फीस तनख्वाह कैसे? बिना तनख्वाह टीचर्स का घर कैसे?

कोरोना की जैसी गोल फुटबॉल सरीखी तस्वीर बनाई गई है, वह उस गेंद की तरह ही लुढ़कते चल रहा है। मटरगश्ती शब्द का गोलमटोल मटर, गश्त करने के नाम पर जिस तरह महज चारों तरफ लुढ़क सकता है, वैसे ही कोरोना चारों तरफ लुढ़क रहा है और उसकी चपेट में इतने लोग इतनी किस्म से कुचल रहे हैं, कि सबके जख्मों को देखने में महीनों लग जायेंगे। मजदूर तो फिर भी एक जगह न तो दूसरी जगह मजदूरी कर लेंगे, लेकिन निजी नौकरियों में लगे सफेदपोश कहाँ जायेंगे? वे तो अपने आज के हुनर के काम के अलावा और कुछ जानते भी नहीं हैं, कोई बेहुनर-मजदूरी का काम कर नहीं सकते। ऐसे में आनी वाली मुसीबतें जिन लोगों को कुछ महीनों की लग रही हैं, वे अभी कोरोना की मार को समझ नहीं पा रहे हैं। बरसों तक लोगों को अपने खर्च में कटौती सोच लेनी चाहिए। जिनके पास आज खाली वक्त है और इंटरनेट है, उन्हें दुनिया की 1930 के दशक की मंदी के बारे में पढ़ लेना चाहिए जो कि दस बरस चली थी, औद्योगिक देशों में बेरोजगारी का वह बुरा हाल था कि एक पीढ़ी में जिंदा रहने के लिए बदन बेचना प्रचलित तौर-तरीका हो गया था। अमरीका में अच्छे-खासे नौकरीपेशा लोग कटोरा पकड़कर सरकारी खाने के लिए सड़क किनारे कतार में लगे रहते थे। और बेरोजगारी का मतलब नौकरी ना पाना नहीं था, नौकरी खोना था। 

दुनिया अगर बहुत बुरी मंदी में चली जाएगी, जो कि जाते दिख रही है, तो न सिर्फ गरीबों की मौत होगी, बल्कि उनसे बेहतर हालत वालों की और बुरी मौत होगी क्योंकि वे तो कम्प्यूटरों पर से उठकर कुदाली-फावड़ा भी नहीं पकड़ सकते। लोगों को आने वाला वक्त उतना ही बुरा मानकर खर्च की कटौती की सोचना चाहिए, दुसरे हुनर के बारे में सोचना चाहिए, अपने खुद के काम को बेहतर बनाने के बारे में सोचना चाहिए। कारोबारी के सामने जिंदा रहने की अपनी मजबूरी होगी, इसलिए वे अधिक से आधिक कर्मचारियों को निकलने के बारे में सोचेंगे, और ऐसे में सबसे काबिल लोगों की ही नौकरी बच सकती है। कल ही देश के एक सबसे बड़े मीडिया-हाउस की खबर आई है कि किस तरह उसका एक टीवी चैनल बंद किया जा रहा है, उसके आधे लोगों को दूसरे चैनल में भेजा जा रहा है, और आधे लोगों को निकला जा रहा है जिनमें 50 बरस से अधिक उम्र के लोग ही अधिक हैं। ऐसा हाल पूरे देश में मीडिया में तो होने ही वाला है, बाकी धंधों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं रहेगी। इसमें से जो बेहतर लोग नौकरी खोएंगे, उनको काम पर कम तनख्वाह पर रखकर लोग अपने कुछ पुराने महंगे पड़ रहे लोगों को काम से निकालेंगे। 

बात कहने और सुनने दोनों में बुरी लगेगी, लेकिन अब मालिक और मैनेजर दोनों ही काम वाले, बेहतर, अधिक उत्पादक, अधिक समर्पित कर्मचारियों को उसी तरह छांटेंगे, जिस तरह कसाई बकरे को टटोलकर देखते हैं कि कितना गोश्त निकल जाएगा! कसाई काटने के लिए अधिक गोश्त देखता है, मालिक-मैनेजर अधिक काम की क्षमता को उसी तरह टटोलेंगे, ना-काटने के लिए! इसलिए तमाम गैरसरकारी नौकरी वालों को अपने को बेहतर बनाने की फिक्र करनी चाहिए, या फिर भूखों  मरने के लिए तैयार रहना चाहिए।
-सुनील कुमार

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