संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अप्रैल : कोरोना के बाद की दुनिया बनाने में स्कूल-कॉलेज के बच्चों की भागीदारी तय हो
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 अप्रैल : कोरोना के बाद की दुनिया बनाने में स्कूल-कॉलेज के बच्चों की भागीदारी तय हो
12-Apr-2020

स्कूल-कॉलेज के बच्चों की एक बरस की ठीक से पढ़ाई नहीं हो पाए, इम्तिहान नहीं हो पाए, तो क्या करना चाहिए? आज हिंदुस्तान में तकरीबन हर प्रदेश इसी समस्या के सामने खड़ा हुआ है। कॉलेज के  कुछ इम्तिहानों के बारे में कुछ जानकारों का कहना है कि अगर इम्तिहान नहीं हुई तो उनको मिलने वाली डिग्री की कीमत कम रह जाएगी। अब सवाल यह है कि किस बाजार में डिग्री की कीमत कम रह जाएगी? अमरीका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, चीन सहित दर्जनों देशों का हाल तो हिंदुस्तान से अधिक खराब है, उनकी अपनी डिग्रियों के सामने भी यही दिक्कत है। अकेले हिंदुस्तान के कॉलेज तो बिना पढ़ाई के नहीं रह जाने वाले। 

स्कूलों के अधिकतर इम्तिहान तो टल ही गए हैं। इनसे किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। एक बरस में स्कूलों में शायद 200 दिनों की पढ़ाई का टारगेट रखा जाता है, जो शायद कहीं भी पूरा नहीं होता। कॉलेजों में 125 दिन सालाना पढ़ाई का टारगेट रहता है, और वह भी कभी पूरा नहीं होता। कॉलेजों के बारे में कहा जाता है कि उनमें 15 अगस्त से पहले क्लास शुरू नहीं होती, और 26 जनवरी के बाद चलती नहीं। झंडे से झंडे तक चलने वाली क्लासेज के 125 दिन पूरे होने की बात अमल में नहीं आती। इसलिए बहुत अधिक फिक्र करने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ी जरूरत है स्कूल-कॉलेज में क्लासरूम में बच्चों की भीड़ और धक्का-मुक्की की नौबत को टालने की। इसके लिए कुछ राज्यों ने जून तक के लिए स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए हैं, बाकी राज्यों को भी मई तक के लिए तो बंद कर ही देना चाहिए। देश की करीब एक चौथाई आबादी स्कूल-कॉलेज से कोरोना लेकर आएगी तो हफ्ते भर में ही पूरा देश खतरे में आ जाएगा। 

अब सवाल यह है कि पढ़ाई के हर्जाने को तो बाद में पूरा कर लिया जायेगा, अभी बच्चे क्या करें? आज देश के अधिकतर घरों में टीवी हैं, और कम से कम सरकारी दूरदर्शन जैसे दर्जनों टीवी चैनल मुफ्त में भी हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को टीवी पर सुबह से रात तक अलग-अलग क्लास के बच्चों के लिए पढाई का इंतजाम करना चाहिए। दूरदर्शन के बहुत से चैनल हैं, और उनमें क्षेत्रीय भाषों में भी पढ़ाई करवाई जा सकती है, और हिंदी-इंग्लिश में भी। हो सकता है कि चुनिंदा शिक्षक, अच्छे स्टूडियो से साफ-साफ बोलकर स्कूल से बेहतर भी पढ़ा सकें। इस पर तुरंत काम शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य अपने मोबाइल एप्लीकेशन बनाकर भी पढ़ाई शुरू कर चुके हैं, टीवी का इस्तेमाल भी जुड़ सकता है।

केंद्र और राज्य सरकारें, टीवी पर लोगों के सामान्य ज्ञान, व्यक्तित्व विकास, इंटरव्यू देने की तकनीक, स्पोकन इंग्लिश जैसी चीजों को भी शुरू कर सकती है, आज टीवी और इंटरनेट के साथ मोबाइल फोन हिंदुस्तान में दुनिया का सबसे बड़ा क्लासरूम बना सकते हैं। इस पर केंद्र सरकार को जानकारों से बात करके काम शुरू करना चाहिए, बिना देर किए। इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि दुनिया के विकसित देशों में सिर्फ क्लासरूम की पढ़ाई को सब कुछ नहीं माना जाता। योरप के विकसित देशों में तो स्कूल के बाद और कॉलेज के पहले एक साल बच्चे बिना पढ़ाई के रहते हैं, वे घूमते-फिरते हैं, जिंदगी की हकीकत को देखते-सीखते हैं। हिंदुस्तान में भी कुछ महीनों के बाद एक ऐसी नौबत सामने आने वाली है जब दसियों करोड़ लोग बेरोजगार रहेंगे, उनके सामने खाने की भी दिक्कत रहेगी, और ऐसे वक्त स्कूल की बड़ी कक्षाओं और कॉलेज के बच्चों को कुछ महीनों के लिए आबादी के ऐसे मुसीबतजदा तबके की मदद में लगाने की एक योजना भी बनानी चाहिए। एनसीसी या एनएसएस जैसे संगठनों से जुड़े छात्र-छात्राओं को साल में कुछ दिन ऐसा करना भी पड़ता है, और उन्हें अधिक संगठित, अधिक व्यवस्थित रूप से, बिना खतरे में पड़े ऐसे काम में लगाना उनकी पढ़ाई के मुकाबले अधिक काम का हो सकता है। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले हमने जबलपुर से अमरीका जाकर बसे एक ऐसे स्कूल बच्चे के बारे में छापा था जिसने वहां की अस्पताल में कुछ हफ्ते सेवा कार्य करके, मरीजों के स्ट्रेचर और व्हीलचेयर का भी काम करके राष्ट्रपति का प्रशंसापत्र पाया था। आज कोरोना के बाद के युग के पुनर्निर्माण में बच्चों की भागीदारी के बारे में देश-प्रदेश को सोचना चाहिए जिससे वे एक बेहतर नागरिक भी बनें, और क्लासरूम ही सब कुछ है, इस आतंक से भी बाहर निकलें।
-सुनील कुमार

अन्य खबरें

Comments