संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 अप्रैल : जिनको बचाने जा रहे, वे ही पथराव कर रहे ! सबसे कड़ी सजा मिले
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 16 अप्रैल : जिनको बचाने जा रहे, वे ही पथराव कर रहे ! सबसे कड़ी सजा मिले
16-Apr-2020

जिनको बचाने जा रहे,
वे ही पथराव कर रहे !
सबसे कड़ी सजा मिले 

उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद में कल जब सरकारी डॉक्टर और पुलिस के लोग एक मुस्लिम बस्ती में कोरोनाग्रस्त लोगों के करीबी लोगों को लेने गए तो उन पर जमकर पथराव हुआ। जाहिर तौर पर पथराव उन्हीं मुस्लिम बस्तियों के उन्हीं मुस्लिम लोगों ने किया। अभी कुछ दिन पहले एमपी के इंदौर में भी ऐसा ही हुआ था। देश भर में मुस्लिम ही कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित मिल रहे हैं, और उन्हीं के बीच के बाकी लोगों को खुद उन्हीं के भले के लिए भी जांच के दायरे में लाना ही पड़ा है। लेकिन मुस्लिमों का एक तबका ऐसा है जो आज भी मानकर चल रहा है कि मारना और बचाना ऊपरवाले के हाथ होता है, और मरने के लिए मस्जिद सबसे अच्छी जगह होती है। उनके इस भरोसे के साथ दिक्कत महज यह है कि दुनिया के पास ऐसा कोई टापू नहीं है जहाँ ले जाकर ऐसे आस्थावान लोगों को छोड़ा जा सके कि वे बचें तो कुछ बरस बाद वापिस लाए जाऐंगे। कोरोना जैसे खतरे के सामने दुनिया एक गांव ही रह गया है, और किसी एक धर्म के लोग, किसी देश के लोग जिद करके खुद तो खत्म हो सकते हैं, लेकिन वे साथ-साथ दूसरों को भी खत्म करके जाएंगे। इसलिए आज प्रदेशों को, देशों को अपने सबसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल करके जांच-इलाज का विरोध करने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए, साथ ही हमलावर लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई ठीक है, जरूरी है। 

हिंदुस्तान में मुस्लिमों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें से एक हिस्सा धर्म को न सिर्फ कानून से ऊपर मानकर चलता है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों से अपने को आजाद भी मानता है। यह उसी किस्म का हिस्सा है जैसे दूसरे धर्मों के कट्टर और धर्मांध लोगों के हैं, जो अपने धर्मों को कानून से ऊपर मानते हैं। दिल्ली में तब्लीगी जमात की बैठक, मरकज, से कोरोना फैलने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। कुछ धर्मांध मुल्लाओं के मुजरिमाना-पागलपन, और केंद्र सरकार की लापरवाही ने मिलकर दिल्ली में कोरोना का पोल्ट्री फॉर्म ही बना दिया। हजारों देशी-विदेशी लोग हफ्तों तक कोरोना का खतरा शुरू होने के बाद भी जमघट लगाए रहे, और केंद्र सरकार जो कि दिल्ली में पुलिस और खुफिया विभाग चलाती है, उसने इस जाहिल जमघट को तितिर-बितिर नहीं किया। दिल्ली की केजरीवाल सरकार की भी इसमें थोड़ी सी जिम्मेदारी बनती दिखती है कि उसके जिला प्रशासन ने वक्त रहते इस खतरे को नहीं आंका, और इस जमघट को खत्म नहीं करवाया। नतीजा यह निकला है कि आज देश में बाकी धर्मों के नफरती, हर मुस्लिम को  जमाती मान रहे हैं, उनके खिलाफ झूठ फैला रहे हैं, और इस भड़काई जा रही आग में पेट्रोल डालने का काम कुछ और मुस्लिम पत्थर चलाकर कर रहे हैं। देश में वैसे भी कोरोना के स्वागत में साम्प्रदायिकता कालीन की तरह बिछी हुई थी, उस पर कुछ मुल्लाओं ने अपनी धर्मान्धता और बिखेर दी। नतीजा यह हुआ कि तब्लीगी जमात ने देश के मुस्लिमों का इतना बड़ा नुकसान कर दिया, जितना कि  6 दिसंबर 1992 को भी नहीं हुआ था। रही-सही कसर अब वे मुस्लिम कर रहे हैं जो कि अपनी बस्ती में अपने लिए आए हुए डॉक्टरों और पुलिस वालों पर पथराव कर रहे हैं। ये पत्थर पत्थरयुग की सोच का नतीजा है जो कि अभी तक ज्यों की त्यों चली आ रही है। 

आज हिंदुस्तान में पत्थरबाज, जमाती, और जाहिल मुस्लिमों के तबके बाकी तमाम मुस्लिमों के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा ख़तरा खड़ा कर रहे हैं। यह मौका हिंदुस्तान में हर किसी के लिए यह भी सोचने का है कि लोकतंत्र के भीतर धर्म या मजहब, देश के कानून के साथ किस-किस किस्म के टकराव खड़े करते हैं। फिलहाल हिंसा करने वाले लोगों को सबसे कड़े कानूनों के तहत सबसे कड़ी सजा दिलवानी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी धर्म के लोगों को अराजक कबीलाई सोच की हिंसा करने की छूट नहीं दी जा सकती। मुस्लिमों के बीच से कुछ मुस्लिमों की तरफ से भी इस हिंसा का जमकर विरोध हो रहा है, सलमान खान का एक वीडियो भी सामने आया है जिसे सभी को देखने की जरूरत है। 
-सुनील कुमार

अन्य खबरें

Comments