संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  25 अप्रैल : नमस्ते ट्रम्प, अपने अहमदाबाद में छलांग लगते कोरोना की खबर तो आप ले ही रहे होंगे?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 25 अप्रैल : नमस्ते ट्रम्प, अपने अहमदाबाद में छलांग लगते कोरोना की खबर तो आप ले ही रहे होंगे?
25-Apr-2020

नमस्ते ट्रम्प, अपने अहमदाबाद 
में छलांग लगते कोरोना की 
खबर तो आप ले ही रहे होंगे?

कोरोना दुनिया में छलांग लगाकर आगे बढ़ रहा है, जहां घट गया था, उस जापान में समंदर की लहर की तरह वह लौटकर आया, और वहां के प्रधानमंत्री को कहना पड़ा है कि महिलाएं सामान खरीदने सुपरमार्केट ना जाएँ क्योंकि वे अधिक बारीकी से देखकर, तुलना करके खरीदती हैं, आदमियों को भेजें जो कि तेजी से खरीदते हैं। बाजार से भीड़ को घटाने ऐसी तरकीबें सोचनी पड़ रही हैं। जिन लोगों को लग रहा है कि कोरोना खत्म होने को है उन्हें दुनिया के बड़े-बड़े कई विशेषज्ञों की भी सुनना चाहिए कि यह अभी साल-दो साल भी चल सकता है। अभी बहुत फिक्र की खबर है कि हिंदुस्तान के गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में कोरोना देश में सबसे तेज बढ़ रहा है। जब देश में पहला कोरोना मरीज मिल चुका था, उसके तीन हफ्ते बाद इसी शहर में 'नमस्ते ट्रम्प' हुआ था, ऐतिहासिक भीड़ जुटी थी, हजारों अमरीकी लोग भी आये थे, और शायद ही किसी की कोरोना जांच हुई थी। आज की खबर है कि इसी अहमदाबाद में हर 4 दिन में कोरोना पॉजिटिव दो गुने हो रहे हैं, पूरे गुजरात के मुकाबले इसी शहर में सबसे अधिक हैं। और वहां की भाजपा सरकार के म्युनिसिपल कमिश्नर ने कहा है कि अगर इसी रफ्तार से कोरोना पॉजिटिव बढ़े तो मई के आखिर तक अहमदाबाद में 8 लाख लोग कोरोनाग्रस्त हो सकते हैं। अब तक के करीब पौने 3 हजार कोरोनाग्रस्त में से आज सुबह तक सवा सौ से अधिक मारे जा चुके हैं। क्या अभी यह याद दिलाना गलत होगा कि राहुल गाँधी ने 12 फरवरी को कोरोना के खतरे के बारे में ट्वीट करके मीडिया के एक हिस्से में अपना मखौल बनवा लिया था, मीडिया के कुछ लोग उनकी खिल्ली उड़ाते हुए अतिसक्रिय हो गए थे। अब राहुल की ही बात सही साबित हुई है, और नमस्ते ट्रम्प के बाद के ये खतरनाक नतीजे अहमदाबाद को अमरीका बनाकर छोड़ रहे हैं। 

इस पर चर्चा जरूरी इसलिए है कि आज अलग-अलग हिन्दुस्तानी राज्य अपने-अपने हिसाब से कोरोना से लड़ रहे हैं, जिस उत्तर प्रदेश से सीएम योगी केरल को इलाज सिखा रहे थे, वह केरल देश में कोरोना-मोर्चे पर अव्वल कामयाब साबित हो रहा है। छत्तीसगढ़ ने खूब अच्छी तरह काबू किया है, लेकिन गुजरात अब तक ट्रम्प को ढो रहा है। इसी से सबक मिलता है कि नेता को एक वैज्ञानिक खतरे के वक्त तो अपने राजनीतिक फैसलों को अलग रखकर विशेषज्ञों को अपना काम करने देना चाहिए। नमस्ते ट्रम्प डोनाल्ड ट्रम्प का चुनाव अभियान तो था, लेकिन हिंदुस्तान से नमकीन ढोकला खाकर गए ट्रम्प ने हिंदुस्तान को धमकी देने में वक्त नहीं लगाया था। इसलिए मेडिकल खतरे के वक्त तो इस देश के नेता राजनीति, अपनी जिद, और अपने दम्भ दूर रखें तो ही उनकी आबादी बच पाएगी। 

आने वाले दिन अब तक की चुनौतियों से बहुत अधिक खराब होने के आसार हैं, और ऐसे में अगर लोग अपनी जिद से काम करते रहेंगे, तो डॉक्टर, मेडिकल वर्कर अपनी जान गंवाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएंगे। कुछ राज्यों ने राजस्थान के कोटा में पढ़ रहे अपने बच्चों को बसें भेजकर वापिस बुलवा लिया है, कुछ और राज्य तैयारी में हैं, छत्तीसगढ़ की बसें रास्ते पर हैं। इन बच्चों के लौटने के साथ ही राज्यों के सामने एक-एक पखवाड़े की चुनौतियां शुरू हो जाएंगी, और फिर यह सामाजिक तनाव तो है ही, कि गरीब मजदूर खुले आसमान तले छोड़ दिए गए हैं और कमरों में बसे संपन्न बच्चे कोचिंग से वापिस लाए जा रहे हैं। ये सारे सामाजिक सवाल राजनीतिक असुविधा बनकर खड़े होने वाले हैं, और दिक्कत यह भी आने वाली है कि प्रदेशों की सरहदों पर रोके गए गरीबों को वहां बियाबान में रोकने का अब क्या न्यायसंगत जवाब है? सामाजिक और राजनीतिक दबावों के चलते इस किस्म के और भी बहुत से तनाव सरकारी फैसलों पर पडऩे वाले हैं। कल ही छत्तीसगढ़ में एक गरीब ने चौराहे पर आत्मदाह की कोशिश की जिसे अपनी बची को झारखण्ड से लाने की इजाजत नहीं मिली थी। आज राहुल गाँधी की चेतावनी को अनदेखा करने वाले मोदी सवालों के घेरे में हैं, लेकिन जैसे-जैसे वक़्त गुजरेगा, और भी नेता सवालों के बीच होंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार परेशानी झेल ही रहे हैं, उनकी सरकार में भागीदार भाजपा बिहार के बच्चों को वापिस लाने को लेकर तनाव की मुद्रा में है ही। 

गुजरात की भयानक हालत से बात शुरू हुई थी, इसलिए उसी पर लौटना ठीक है, कोरोना के भयानक खतरे को नेताओं के मनमाने फैसलों पर छोडऩा भयानक होगा। हर नेता के नमस्ते ट्रम्प जैसे गलत फैसले हो सकते हैं, जिनकी कीमत आम जनता जान देकर चुकाएगी, 12 बरस की एक मजदूर बच्ची तेलंगाना से छत्तीसगढ़ के रास्ते दम तोड़ ही चुकी है, वह तानाशाह लॉकडाउन की शहीद रही। आगे नेताओं की मनमानी के चलते जाने क्या होगा, कितने और शहीद होंगे।
-सुनील कुमार

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