संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  27 अप्रैल : पंजाब डीजीपी को सलाम
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 27 अप्रैल : पंजाब डीजीपी को सलाम
27-Apr-2020

पंजाब डीजीपी को सलाम

पंजाब पुलिस के 80 हजार लोगों में से हर कोई आज हरजीत सिंह है। एएसआई हरजीत सिंह ने कुछ दिन पहले पटियाला में सड़क पर कफ्र्यूू पास पूछा तो एक निहंग ने तलवार से उनके दोनों हाथ काट दिए थे। चंडीगढ़ में पीजीआई के डॉक्टरों में बड़ी मेहनत और हुनर की सर्जरी से उनके दोनों हाथ जोड़ दिए। ऐसे बहादुर पुलिस अफसर का सम्मान करने के लिए, आज पंजाब में डीजीपी से लेकर सिपाही तक, हर किसी ने वर्दी पर अपनी नेमप्लेट पर हरजीत सिंह का नाम लगाया और उसे सम्मान दिया। डीजीपी दिनकर गुप्ता की यह पहल देश में याद रखी जाएगी, और इससे पंजाब पुलिस का सीना अपने मुखिया के नाम पर फख्र से तन जाएगा। 

न सिर्फ वर्दी वाली फोर्स में, बल्कि किसी भी जगह मुखिया अपने लोगों के साथ किस हद तक खड़े रहते हैं, यह बात बहुत मायने रखती है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहाँ नक्सल मोर्चे पर साल भर में 100 -200 जवान भी मारे जाते हैं, वहां हमको याद नहीं पड़ता कि पुलिस के मुखिया कभी किसी शहीद के घर गए हों। इतने शहीदों के अंतिम संस्कार में जा पाना तो किसी अफसर के लिए मुमकिन नहीं हो सकता, लेकिन किसी दौरे के वक्त भी कोई डीजीपी किसी शहीद के घर गए हों, ऐसा खबरों में तो कभी आया नहीं। प्रदेश के मंत्री-मुख्यमंत्री, और वर्दी वाले अफसर, इन सबका काम शहीद के शव को उसके घर रवाना करने के पहले सलामी देने के साथ ख़त्म हो जाता है। 

पंजाब पुलिस के मुखिया के लिए भी यह काफी हुआ होता कि वे एक बार हरजीत सिंह को अस्पताल में देख लेते, इनाम की घोषणा कर देते। लेकिन उन्होंने जो किया उससे पंजाब पुलिस के छोटे बड़े सभी लोगों के मन में एक नया हौसला आया होगा। मुखिया को इस नजरिये से सोचना चाहिए। एक बक्से के बाहर सोचना बहुत से लोगों को आता नहीं है। राजीव गाँधी जब प्रधान मंत्री थे तो वे अपने सुरक्षा कर्मचारियों-अधिकारीयों से दोस्ताना सम्बन्ध रखते थे। लोगों को याद होगा कि जब इंदिरा गाँधी को खुफिया एजेंसियों ने चौकन्ना किया था कि स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई की वजह से कोई सिख सुरक्षा कर्मचारी उनके लिए खतरा बन सकता है, तो उन्होंने किसी भी सिख को हटाने की बजाय जान दे देना बेहतर माना था। अपने साथ के लोगों को बचाने के लिए बहुत से बड़े नेता भी उनका ख़तरा अपने ऊपर लेने के लिए जाने जाते हैं, और अदालतों तक खड़े रहते हैं। कोई मुखिया अपने लोगों के साथ खड़े रहकर ही मुखिया रहने के हकदार हो सकते हैं, उनको मुसीबत में धकेलकर खुद बचकर नहीं। पुलिस हो, फौज हो, या कोई और संगठन, बड़प्पन वाले मुखिया का नाम ही इतिहास में दर्ज होता है। आज हम सरकार में बहुत से ऐसे आला अफसर देखते हैं जो मातहत को मुसीबत में छोड़कर खुद बच निकलने में महारत हासिल कर चुके हैं। ऐसे में पंजाब डीजीपी को सलाम।
-सुनील कुमार

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