संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  28 अप्रैल : यह तो अच्छा हुआ कि उसका नाम मुरारी था...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 28 अप्रैल : यह तो अच्छा हुआ कि उसका नाम मुरारी था...
28-Apr-2020

यह तो अच्छा हुआ कि 
उसका नाम मुरारी था... 

उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर से बुरी खबर आई है कि दो साधुओं को एक मंदिर में सोते हुए किसी ने धारदार हथियार से मार डाला। मौत तो बहुत बुरी थी, लेकिन उस बीच भी गनीमत यह है कि मारने वाला एक हिन्दू गिरफ्तार हुआ है जिससे दो दिन पहले साधुओं का सार्वजनिक झगड़ा हुआ था, और वह उन्हें धमकी देते हुए गया था। अभी-अभी महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं को उनके ड्राइवर सहित पीट-पीटकर मार डाला गया, देश के एक नफरतजीवी तबके ने दिल्ली में अपने अपने बड़े-बड़े नेताओं की अगुवाई में, और बाकी नफरतजीवियों ने अर्नब गोस्वामी नाम के टीवी-दंगाई की अगुवाई में उन साधुओं की हत्या की तोहमत पहले दिन मुस्लिमों की तरफ मोडऩे की कोशिश की, लेकिन पता चला कि मारने वाले तमाम लोग हिन्दू आदिवासी थे। आदिवासी अपने को हिन्दू नहीं मानते लेकिन जिस हिन्दू-हिस्से की बात हो रही है, वह उनको हिन्दू गिनता है। तो मुस्लिम उस भीड़त्या की तोहमत से बाहर हो गए, लेकिन आदिवासियों की नाम के साथ ईसाई जोडऩा आसान रहता है, इसलिए यह जोड़ा गया कि मारने वाले ईसाई हैं, और उनको बचाने में सोनिया गाँधी के करीबी लोग जुट गए हैं। फिर यह झूठ भी चौबीस घंटों से अधिक खड़े नहीं रह पाया, तो फिर अर्नब गोस्वामी का वीडियो खूब काम आया कि किस तरह सोनिया गाँधी ने अपनी सरकार के राज में हिन्दू साधुओं की ह्त्या के बाद खुशी से भरकर रोम रिपोर्ट भेजी है कि किस तरह हिन्दू साधू मारे गए। यह नफरत शायद देश में दंगा करवाने में बड़ी काम आती, लेकिन अब हिंदुस्तान में मुस्लिम, हिन्दू अर्थी उठाने में लगे हैं, अंतिम संस्कार कर रहे हैं, हिन्दू, मुस्लिमों को अपने घर में रख रहे हैं, उनकी जान बचा रहे हैं, खाना खिला रहे है, मुस्लिम कॉरोनामुक्त होने के बाद अपने खून का प्लाज़्मा दे रहे हैं। कुल-मिलाकर अभी दंगे के लायक माहौल अर्नब, और बेचेहरा नफरती, मिलकर भी नहीं बना पा रहे। इसलिए देश का सबसे संवेदनशील प्रदेश, उत्तर प्रदेश भी तनाव से बच गया, और साधुओं का हिन्दू हत्यारा पकड़ा गया। 

देश में धर्म को सर पर चढ़ा लिया गया है। और महज त्योहारों के लिए नहीं, नफरत, राजनीति, और डूबते हुए मीडिया-कारोबार को चलाने के लिए धार्मिक नफरत को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक प्रेम किसी को आसानी से नहीं जोड़ पाता लेकिन धार्मिक नफरत तुरंत ही इस देश के अर्नबों को एक कर देती है। देश की सबसे बड़ी अदालत का मिजाज हैरान करता है कि नफरत की आग की लपटें उगलते ड्रैगन पर सवार अर्नब गोस्वामी रात में सुप्रीम कोर्ट पहुँचता है, और अगले दिन राहत हासिल कर लेता है। नफरत की इन लपटों से देश में अगर दंगे हो गए होते तो? इस बहुत ही हकीकत के खतरे को भी देखने से सुप्रीम कोर्ट इंकार कर रहा है! अर्नब की बुनियाद ही नफरत से बनी है, जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने हैरतअंगेज अंदाज से अनदेखा कर दिया है। ऐसे में देश में नफरत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय भावना बन गयी है, और धार्मिक सद्भावना को जिंदा रखना आम लोगों की जिम्मेदारी हो गयी है। 

यह तो अच्छा हुआ कि साधुओं का चिमटा किसी हिन्दू ने ही चुरा लिया था, खुला झगड़ा भी हुआ था, धमकी भी हुई थी, और मुरारी नाम का वह नशेड़ी पकड़ा भी गया। नहीं तो जाने क्या होता। देश को एक बारूद के ढेर पर बिठाने की कोशिश हो रही है, कब तक वह उससे बच पायेगा यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है। आज कोरोना की दहशत से लोगों के मन में जो श्मशान वैराग्य आया है, उससे लोग नफरत से छुटकारा पा सकेंगे यह भी ठीक से समझ नहीं पड़ रहा है। लेकिन यह तय है कि तब्लीगियों के मज़हब से लेकर अर्नब के हिंदुत्व तक, धर्म ने लोगों को पागल कर रखा है। जब किसी लोकतंत्र पर, सरकार पर, अदालत पर, धर्म हावी हो जाता है, तो उसका क्या होता है इसकी एक उम्दा मिसाल बगल का पाकिस्तान है। जिंदगी पर, राजनीति पर, निजी मामलों से लेकर सड़कों तक, जब धर्म का इतना बोलबाला हो जाता है, तो फिर लोकतंत्र धार्मिक आतंक होकर रह जाता है। हिंदुस्तान को हिन्दू पाकिस्तान बनाने के लिए रात-दिन ओवरटाइम मेहनत करने वाले अरनबों की तालिबानियत इस देश की जम्हूरियत को खत्म तो शायद न कर पाए, लेकिन बर्बाद जरूर कर दे रही है। 
-सुनील कुमार

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