संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  1 मई : वक्त कितना ही बुरा आए,  जूझने की सबसे अधिक  ताकत मजदूर की ही होगी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 1 मई : वक्त कितना ही बुरा आए, जूझने की सबसे अधिक ताकत मजदूर की ही होगी
01-May-2020

वक्त कितना ही बुरा आए, 
जूझने की सबसे अधिक 
ताकत मजदूर की ही होगी

पूरी एक सदी के बाद दुनिया में ऐसा मजदूर दिवस आया है जब अधिकतर देशों में मजदूर बेरोजगार बैठे हैं, और अगर वे बहुत खुदकिस्मत हैं तो ही वे अपने घर पर बैठे हैं, वरना हिन्दुस्तान जैसे देश में तो मजदूर सड़कों पर इतना लंबा पैदल सफर कर रहे हैं जितना कि उन्होंने 1947 में भारत-पाक विभाजन के दौर में भी नहीं किया था, और न ही 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से भारत में शरण लेने के बाद किया था। दोनोंं ही मौकों पर सरहद के बाद जल्द ही लोगों को रेलगाडिय़ां मिल गई थीं, या सड़क से चलने वाली किसी गाड़ी पर जगह मिल गई थी। आज ये दोनों ही हासिल नहीं हैं। आज सुबह तेलंगाना से झारखंड के बारह सौ मजदूरों को लेकर पहली ट्रेन निकली है, लेकिन यह ट्रेनों की शुरुआत शायद नहीं है, एक प्रयोग है। फिर भी मजदूर दिवस पर यह मजदूरों को एक तोहफा है कि उनमें तो बारह सौ को अपने प्रदेश जाने मिल रहा है, आगे का सफर अभी शुरू भी नहीं हुआ है।

20 मार्च को हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को जनता कफ्र्यू की घोषणा की थी, और 24 मार्च की रात पूरे देश में लॉकडाउन करके तमाम ट्रेनों को रद्द कर दिया गया था। इस वक्त देश में करोड़ों मजदूर दूसरे प्रदेशों में मजदूरी के लिए गए हुए थे, छोटे कारीगर और कारखाने-कारोबार के हुनरमंद मजदूर एकाएक रात 8 बजे बेरोजगार हो गए क्योंकि लाखों मालिक और ठेकेदार ऐसे थे जिन्होंने मजदूरों को बकाया पैसा भी नहीं दिया। न खाने को, न रहने को, न घर लौटने को। ऐसे में गिनती के बचे-खुचे पैसे लेकर, बच्चों को कंधे पर लाद, सामान को घरवाली को पकड़ाकर हिन्दुस्तानी मजदूर हजार-हजार किलोमीटर तक के पैदल सफर पर निकल गए थे जो कि आज 30-35 दिन बाद भी जारी है। अखबारों के दफ्तर उन खबरों और तस्वीरों से पट गए हैं जो कि देश भर में पैदल चल रहे मजदूरों की हैं, और पूरे देश में फंसे हुए मजदूरों की हैं, जो कि इतना लंबा पैदल सफर नहीं कर पा रहे हैं। कुल मिलाकर 20 मार्च से 24 मार्च तक का वक्त इतना था कि घरों से सफर शुरू करने वाले लोगों को रोक दिया जा सकता था, और दूसरे प्रदेशों में फंसने जा रहे मजदूरों को अपने प्रदेश रवाना किया जा सकता था। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और अगर आज उसकी तकलीफ पर बात भी न हो, तो फिर मजदूर दिवस कैसा? जिन मजदूरों की देह से पसीने की शक्ल में नमक बहता है, उनकी बाकी देह के साथ-साथ उनके पांवों के फफोलों के फूटने से भी नमक बहने लगा था। 

लेकिन बात महज दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे मजदूरों की नहीं थी। खुद अपने प्रदेश में काम करने वाले मजदूर घर बैठे भी खासे वक्त से बेरोजगारी झेल ही रहे थे, अब उन्हें रोजगार मिलने की गुंजाइश लॉकडाउन के साथ पूरी तरह खत्म हो गई। आज मजदूर दिवस पर तमाम मजदूरों के बारे में सोचना है जो कि इतने बरसों में मिट्टी खोदने से अधिक कुछ सीख चुके थे, उन सबका हुनर आज धरा रह गया है। अलग-अलग प्रदेशों में मशीनों पर और कारोबारों में काम करने का उनका तजुर्बा धरा रह गया है, और मेहनत की खाने वाले करोड़ों लोग आज राहत में मिलने वाले अनाज की कतार में खड़े हो गए हैं। कोरोना को लेकर यह नौबत कुछ हद तक तो आनी थी, लेकिन जिस तरह मजदूरों को बेघर, बेबस, बेरोजगार, और बेसहारा करके एकाएक छोड़ दिया गया था, यह पूरा पांच हफ्तों का वक्त उनके आत्मविश्वास को भी तोड़ देने वाला रहा, उनके आत्मसम्मान को भी चकनाचूर करने वाला था। 

आज मजदूर दिवस पर अगर देश के इस सबसे बड़े, दसियों करोड़ गिनती वाले तक के सदमे, उसके फफोलों, और उसकी जिंदगी पर छाए खतरे की भी बात न की जाएगी, तो फिर क्या किया जाएगा? मजदूरों का यह पूरा सिलसिला बहुत ही अनिश्चितता से भरा हुआ है। हम यह तो नहीं कहते कि कोरोना जैसे खतरे और इतनी बड़ी समस्या का किसी को पूर्वाभास रहा होगा, लेकिन यह बात तो तय है कि कम से कम कुछ हफ्ते पहले से इसका अहसास हो चुका था, और उसके बाद जिस तरह एक झटके में रेलगाडिय़ां बंद की गईं, और आज पांच हफ्ते बाद इस तरह प्रायोगिक तौर पर फिर चलाई गई है, इन दोनों के बीच का यह अरसा भारत के मजदूर इतिहास का अब तक का सबसे ही खराब दौर रहा है, और अगर भारत सरकार की कोई बेहतर योजना होती, या कि जैसा कि कई अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री कह रहे हैं, भारत की कोई योजना होती, तो बर्बादी इतनी अधिक नहीं होती, तकलीफ इतनी अधिक नहीं होती, और करोड़ों मजदूरों को इंसानों की तरह रहने का मौका मिला होता। 

हम इस पूरे मुसीबत के दौर में भी इन बातों को करना जरूरी इसलिए समझते हैं कि मुसीबत अभी कई और महीने चलने वाली है, और अगर आगे भी कोई योजना नहीं बनेगी, केन्द्र राज्यों को साथ लेकर काम नहीं करेगा, तो हो सकता है कि हिन्दुस्तानी मजदूरों को आज तक की सबसे बुरी त्रासदी अपनी पहले नंबर की जगह खो बैठे, और इससे और बुरी त्रासदी हिन्दुस्तान में दर्ज हो। आज का वक्त इतिहास से सबक लेने का नहीं है, आज का वक्त अपने बीते हुए हफ्ते और महीने से भी सबक लेने का है, और हिन्दुस्तान को इसकी जरूरत बहुत अधिक है, इसके प्रदेशों को इसकी जरूरत बहुत अधिक है। मजदूर दिवस पर हम बस इतना ही कह सकते हैं कि वक्त चाहे कितना ही बुरा आए, उससे जूझने की सबसे अधिक ताकत मजदूर की ही होगी। दुनिया के मजदूरों को लाल सलाम। 
-सुनील कुमार

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