संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 2 मई : मजदूरों की घरवापिसी से जुड़े मुद्दे, और तैयारियां...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 2 मई : मजदूरों की घरवापिसी से जुड़े मुद्दे, और तैयारियां...
02-May-2020

मजदूरों की घरवापिसी से जुड़े मुद्दे, और तैयारियां...

केन्द्र सरकार का लॉकडाऊन-3 शुरू होने को है, और इसी बीच रेलगाडिय़ां शुरू हो गई हैं जो कि मजदूरों को उनके अपने प्रदेश पहुंचाएंगी जहां वे घर पर रहकर आसपास कुछ काम कर सकेंगे, या फिर कोरोना के मरने और अर्थव्यवस्था के जिंदा होने का इंतजार कर सकेंगे। इन मजदूरों को उनके काम के प्रदेशों ने इस बुरी तरह निराश किया है कि जहां वे कारखानों और धंधों में काम करते थे, उनमें शायद ही किसी को उनके कानूनी हक मिल पाए, उनका बकाया मिल पाया, और चार घंटे के नोटिस वाले लॉकडाऊन के बाद उनको सिर छुपाने की जगह तो उन राज्यों ने, वहां के कारखानेदारों और कारोबारियों ने, वहां की सरकारों ने बिल्कुल ही नहीं दी, जबकि ऐसे हर कारोबारी शहर और प्रदेश में आज हजारों अधूरी बनी इमारतें पड़ी हैं जहां कोई काबिल सरकार आसानी से मजदूरों को वहां रूकने का एक विकल्प दे सकती थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि प्रवासी मजदूर किसी राज्य में वहां के स्थाई वोटर नहीं होते हैं, और उनकी कोई राजनीतिक उपयोगिता नहीं होती है। ऐसे करोड़ों मजदूर पैदल चलकर भी चार-पांच हफ्तों में अपने इलाके में पहुंच रहे हैं, रास्ते में दम तोड़ रहे हैं, और राह में सामाजिक मदद से मिलने वाले खाने के मोहताज होकर उन्होंने कल का मजदूर दिवस भी निकाल दिया।

अब जब रेलगाड़ी से लौटना एक हकीकत हो गई है, कल से अब तक कुछ रेलगाडिय़ां रवाना हुई हैं, तो हर राज्य अपने दसियों हजार मजदूर पाने जा रहा है। छत्तीसगढ़ शायद ऐसे लाख से अधिक मजदूर देखे जो कि बाहर बुरे हाल में हैं, और अब अगले कुछ हफ्तों में जो लौट सकते हैं, और जब बाहर किसी काम-धंधे का कोई ठिकाना नहीं, कोरोना का जानलेवा खतरा सामने खड़ा हुआ है, तो फिर उन्हें लौटना भी चाहिए। अपने गांव में कांधा देने वाले चार लोग तो नसीब होंगे। लेकिन यह नौबत राज्य सरकार पर एक अभूतपूर्व दबाव डालने वाली है। किसी एक प्रदेश में ट्रेन और बसों से अगर चारों तरफ की सरहदों पर हजारों लोग रोज पहुंचने लगेंगे, और आज वे शायद लुके-छिपे, अघोषित रूप से आ ही रहे हैं, तो ऐसी घोषित वापिसी की हालत में मजदूरों को जांच के बाद जरूरत रहने पर सरकारी इंतजाम में क्वॉरंटीन करना होगा, या फिर जैसा कि कल झारखंड ने किया है, बिना लक्षणों वाले मजदूरों को उनके घर भेजना होगा। सरकार के इंतजाम की अपनी सीमाएं हैं, और बिना लक्षण किसी को भर्ती रखने का एक मतलब यह भी होता है कि उसे मजदूरी कमाने के हक से दूर रखना। हमारी सलाह तो यह है कि जितने गरीब मजदूरों को सरकार को क्वॉरंटीन या आइसोलेशन में रखना पड़े, उन्हें उतने दिन की न्यूनतम मजदूरी भी देनी चाहिए ताकि उनका परिवार बाहर जिंदा रह सके। यह इंतजाम केन्द्र सरकार को अपनी किसी रोजगार योजना के तहत करना चाहिए। मनरेगा जैसी किसी योजना में क्वॉरंटीन के एक पखवाड़े की रोजी देना बाकी समाज की सेहत के मुकाबले कोई महंगी बात नहीं होगी। जिस तरह की आदर्श स्थिति घर के भीतर क्वॉरंटीन करने के लिए चाहिए, वह एक फीसदी मजदूरों को भी नसीब नहीं है, शायद किसी भी प्रवासी मजदूर के पास घर में ऐसा अलग कमरा नहीं होगा जैसा कि केन्द्र सरकार के होम-क्वॉरंटीन की शर्तों में कहा गया है। इसलिए प्रवासी मजदूरों की वापिसी या तो सरकार को कुछ खर्च देगी, या फिर समाज को कुछ खतरा देगी। हमारी सलाह एक पखवाड़े की मजदूरी देकर क्वॉरंटीन करने की है, लेकिन सरकारों की अपनी सीमाएं हैं। केन्द्र सरकार ने मोटेतौर पर कोरोना से निपटने का खर्च राज्यों पर डाल दिया है। यह बात बिल्कुल भी ठीक नहीं है, यह एक राष्ट्रीय आपदा है, घोषित महामारी है, और इसकी सारी लागत केन्द्र सरकार को उठानी चाहिए। हुआ तो यह है कि केन्द्र सरकार वाहवाही पाने के अंदाज में विदेशों से हिन्दुस्तानियों को तो अपने खर्च पर लेकर आई, और फिर अपने खर्च पर क्वॉरंटीन में भी रखा। लेकिन देश के भीतर के गरीब मजदूरों का पूरा बोझ राज्य सरकारों पर डाल दिया गया, और आज तो यह शर्मनाक खबर है कि केन्द्र सरकार मजदूरों का रेलभाड़ा राज्यों से वसूलने जा रही। हवाई जहाज से लोगों को लाते हुए क्या राज्यों से यह पूछा गया था कि उनके लोगों को विदेशों से लाने का खर्च वे उठाएंगे? सरकार को तुरंत ही यह शर्मनाक बात वापिस लेनी चाहिए, और इसके साथ-साथ राज्यों को उदारता से कोरोना की वजह से आया हुआ सारा खर्च देना चाहिए। लेकिन हुआ तो यह है कि प्रधानमंत्री के स्थाई राहत कोष से अलग एक ऐसा नया पीएम-केयर्स नाम का फंड बनाया गया है जिसमें दान देने के लिए कंपनियों को सीएसआर का पैसा देने की छूट दी गई है। लेकिन कंपनियां अपने राज्य में अपने मुख्यमंत्री राहत कोष में इस फंड का पैसा नहीं दे सकतीं। केन्द्र का यह फैसला बहुत ही अन्यायपूर्ण है, और पीएम-केयर्स एक ऐसा फंड है जो कि बिना पारदर्शिता का है, और जिसका ऑडिट सीएजी नहीं कर सकता। यह बहुत ही अटपटी और अनैतिक बात है, और इसे खत्म करना चाहिए। केन्द्र सरकार का अब तक का रूख दस-दस पन्नों की गाईडलाईन जारी करने का है जिसमें ऐसी तमाम बातें भी लिखी गई हैं जो कि राज्य के अधिकार क्षेत्र की हैं, राज्य की जिम्मेदारी हैं। ख्रैर, इससे परे राज्यों को भी तैयार रहना होगा कि बुरी हालत में रहकर लौटे हुए ये मजदूर अगर अपने साथ बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव लेकर आते हैं, तो क्या होगा? हमारा ख्याल है कि अधिकांश राज्यों पर हर पांच-दस हजार मजदूरों पर कुछ दर्जन कोरोना पॉजिटिव निकलने का एक खतरा आ सकता है, और इसके लिए राज्य के जांच और इलाज के ढांचे को पुख्ता करके रखना ठीक रहेगा।

- सुनील कुमार 

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